निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1205, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४४३ ) ११अ० ३पा० १३खं०
“यमी यमं चकमे तां प्रत्याचचक्ष”- इति आ- ख्यानम् ॥ १३ (३४) ॥ इति एकादशे तृतीयः पादः ॥ ११, ३ ॥ “अन्यमूहूष्वित्त्वम्०” यमी ने अपने भाई यमपर कामना की थी, और यम ने उसका इस ऋचा के द्वारा प्रत्याख्यान या उसकी प्रार्थना को अस्वीकार किया था । ‘यमि !’ हे यमि ! ‘अन्यम् ऊ षु’ ( अन्यम् एव ) दूसरे को ही ‘त्वम्’ तू ( परिष्वजस्व ) मैथुन के अभिप्राय से आ- लिङ्गन कर या लिपट । कैसे ? “लिबुजा इव वृक्षम् ” जैसे बेल किसी पास वाले वृक्ष से लिपटती है । “अन्यः उ” (अन्यः एव ) दूसरा ही ‘त्वाम्’ तुझे ‘परिष्वजाते’ (परि- ष्वङ्क्ष्यते ) आलिङ्गन करेगा- जिस के तू इस अभिप्राय से लिपटाने योग्य हो । “तस्य वा त्वं मनः इच्छा (इच्छ)” अथवा उसके तू मनको प्रवेश करने की इच्छा कर, “स वा तव” अथवा वह तेरे मनको प्रवेश करने की इच्छा करे । “अधा कृणुष्व संविदम् सुभद्राम्” [ अधा अनेन कुरुष्व संविदं सुभद्राम् ] अनन्तर इस प्रकार से एकचित्तता को प्राप्त हुए उस पति के साथ तू सुभद्र = दोनों लोकों को न बिगाड़ने वाली संविद् = मैथुन आदि की चर्चा ( सन्धि ) को कर ॥ यमी ने यम को पतिभाव से चाहा और यमने उसको