भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1224

ससार सीं परावतः ॥” (ऋ० सं० २, ६, ३१,१) ॥ एतद् अस्या अन आशते सुसम्पिष्टम् इतरदिव विपाशि विमुक्तपाशि ससार उषाः परावतःप्रेरित- वतः परागताद् वा । ‘इला’ व्याख्याता । तस्या एषा भवति ॥१४ (४८) ॥ अर्थः-“एतदस्याः०” इस ऋचा में सृष्टि के पश्चात् पृथ्वी पर पड़े हुये जलको देख कर ऋषि उसमें विदीर्ण पड़े हुये मेघ की बुद्धिकरके उसी की ओर निर्देश करता हुआ कहता है- ‘एतद्’ यह ‘अस्याः’ (उषसः) इस उषा का ‘अनः’ (मेघा- ख्यम् ) मेघ रूप शकट ‘सुसम्पिष्टम्’ वायु से भली प्रकार चूर्ण किया हुआ ‘आशये’ (आशेते) पृथ्वी पर फैलकर पड़ा है, (इतरद् इव विपाशि = विमुक्तपाशि) जैसे दूसरा मनुष्य का गाड़ा जिसके सब बन्धन टूटगये हों, पड़ा हो’ ‘परावतः’ (प्रेरितवतः) जिस प्रेरित किये गए या प्रेरित हुए हुएसे [परा- गताद् वा] अथवा दूर से भी दूर गए हुये से ‘उषाः’ उषा ‘ससार’ निकल भगी ॥ ‘इला’ [३५] शब्द की व्याख्या होचुकी । “तस्याः०” उस (इला) की यह ऋचा है ॥१४(४८)॥ ( खं० १५ ) निरु०-“अभि न इला यूथस्य माता स्मन्नदी”