भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1223

५ हिन्दी निरुक्त ( ४६१ ) ११अ० ४पा० १४क० तस्या एषा अपरा भवति - ॥ १३ (४७) ॥ अर्थः- "अपोषा अनसः०" इस ऋचाका और अगली ऋचा का वामदेव ऋषि है। 'उषाः' उषा 'सम्पिष्टात्' विदारण किये हुए 'अनसः' (मेघात्) मेघसे 'अप-सरत्' (अपासपत्) हटगई। क्यों ? 'बिभ्युषी' (बिभ्यती) डरती हुई। अर्थात् जब वायु मेघों को हनन करता है, उस समय, उसमें रहने वाली उषा 'यह मुझे भी मारेगा' इस ख्याल से डर कर उस से हटजाती है। कब "नियत् सीं शिश्रथद् 'वृषा" 'यत्' (यदा) जब ['सीम्'अनर्थक] 'वृषा' (वर्षिता मध्यमः)वृष्टि करनेवाला वायु मध्यम देव 'निशिश्रथत्' (निरशिश्रथत्) हनन करता है ॥ "अपिवा०" अथवा 'अनसः' यह उपमा अर्थ में हो सकता है 'अनसः इव' (शकटाद् इव)। जिस प्रकार कोई शाक- टिक (गडवाला) किसी लुटेरे आदि से गाड़ी तोड़ी जाने पर उससे निकल भागे,वैसे ही उषा वायुके द्वारा मेघके चूर्णित किये जाने पर उससे भय करती हुई निकल पड़ती है । 'अनः' क्या ? शकट (गाड़ा) क्यों ? इसमें चीवर (पिञ्जर) आनद्ध (बंधा हुआ) होता है। अथवा जीवन अर्थ में 'अन' (अदा०प०) धातु से है। क्योंकि इसको जीविकार्थी उप- जीवन करते हैं। मेघ भी 'अनस्' है, इसी धातु से। "तस्याः०" उस (उषाः)की यह और ऋचा है-॥१३(४७)॥ (खं० १४) निरु०-'एतदस्या अनः शये सुसम्पिष्टं विपाश्या.