निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४६४ ) ११ अ० ४ पा० १६ ख० हुई इला 'प्रभृथस्य' [प्रभृतस्य] इकट्ठे किये हुये 'आयौः' गमन स्वभाव जल के [समूह से] 'नः' हमें "सिषक्तु" सींचे । किस प्रयोजन के लिये ? "ऊर्जव्यस्य पुष्टेः" अन्न की पुष्टि के लिये ॥ “अभ्रूण्वाना प्रभृथस्य आयौः” [आयौः अयमस्य मनुष्यस्य मनुष्यस्य ज्योतिषो वा उदकस्य वा [अथवा मनुष्य मनुष्य को ढांपने वाली या ज्योति को ढांपनेवाली या जल को ढांपने वाली इला हमें सींचे [अन्नस्य पुष्टे अन्न की पुष्टि के हेतु ॥ रोदसी [३६] क्या ? रुद्र की पत्नी (भार्या) । “तस्याः०” उस [रोदसी] कीयह ऋचा है ॥१५[४६]॥ व्याख्या । मन्त्र में “उर्वशी वा” ऐसा पाठ दो वार आया है । उनमें एक बार इला और उर्वशी में अभेद बुद्धि से इलाका ही उर्वशी नामान्तर कहा गया है, और दूसरी वार उन दोनों में भेद बुद्धि करके उर्वशी को इला की उपमा बनादी है, यह वक्ता वेद भगवान की इच्छा या कल्पना है ॥१५(४६) ॥ ( खं० १६ ) निरु०" रथन्त्व मारुतं वयं श्रवस्युमा हुवामहे आ यस्मिन् तस्थौ सुरणानि बिभ्रती सचा मरुत्सु रोदसी ॥ ” ( ऋ० सं० ४३, २०, ३ ) ॥ रथं क्षिप्रं मारुतं मेघं वयं श्रवणीयम् आह्वया- महे, आ यस्मिन् तस्थौ सुरमणीयानि उदकानि