भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1227

हिन्दी निरुक्त ( ४१५ ) ११अ० ४पा० १६खं० बिभ्रती सचा मरुद्भिः सह रोदसी रोदसी ॥ १६ ( ५० ) ॥ इति एकादशाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥११,४ ॥ अर्थः- " रथन्नु मारुतं०" इस ऋचा का श्यावाश्व ऋषि और अग्निसारुत में विनियोग है । " वयं ( तं ) रथं ( क्षिप्रं ) मारुतं (मरुत्सहितं) श्रवस्युं (श्रवणीयं) मेघम् आहुवामहे (आह्वया- महे) " हम उस शीघ्रगामी मरुतों सहित श्रवण करने योग्य मेघ को बुलाते हैं । "यस्मिन् सुरणानि [ सुरमणी- यानि उदकानि] बिभ्रती मरुत्सु [मरुद्भिः] सचा (सह) रोदसी आतस्थौ " जिसमेघरूप रथ में सुन्दर रमणीय जलों को धारण करती हुई मरुतों के सहित रोदसी या रुद्रकी पत्नी बैठती थी या बैठती है । 'रोदसी' शब्द का पुनः पाठ अध्याय की समाप्ति की सूचना के अर्थ है ॥ १६ ( ५० ) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते एकादशाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥११,४॥ निरुक्त के एकादश अध्याय का खण्ड सूत्र- (१ म पा०- ) श्येनः ( १ ) आदाय ( २ ) स्वादिष्ठया ( ३ ) सोमम् ( ४ ) यत्वा (५) नवोनवः ( ६ ) परंमृत्यवो (७) त्वेषमित्या ( ८ ) प्रबोमहे ( ६ ) उदुज्ज्योतिः ( १० ) धोता (११) सोमस्य ( १२ ) [ २ य पा०—] अथातो मध्यस्थाना देवगणाः [ १३ ] आविद्युन्मद्भिः [ १४ ] आरुद्रासः ( १५ )