निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपूर्वः पूर्वो यजमानो वनीयान् ॥” (ऋ० सं० ४, ४, १८, २) ॥ प्रातः यजध्वम् अश्विनौ प्रहिणुत न सायम् अस्ति देवेज्या अजुष्टम् एतद् अपि अन्यो अस्मद् यजते विचावः पूर्वः पूर्वो यजमानो वनीयान् वनयितृतमः । तयोः कालः सूर्योदयपर्यन्तः, तस्मिन् अन्या देवता ओप्यन्ते ॥ ‘उषाः’ वष्टेः कान्तिकर्मणः । उच्छतेः-इतरा मध्यमिका । तस्या एषा भवति-॥५॥ अर्थ :-“प्रातर्यजध्वम्०” इस ऋचा का अत्रि ऋषि और प्रातरनुवाक में विनियोग है । हे (स्तोतारः !) स्तुति करने वालो तुम से कहा जाता है-(यूयम्) तुम सब ‘अश्विना’ (अश्विनौ) अश्विनों को ‘प्रातर्यजध्वम्’ प्रातःकाल ही यजन करो, [इसीसे कहता हूँ] ‘हिनोत’ (प्रहिणुत) बहुतायत से उनके प्रति स्तुतियों और हवियों को पहुँचाओ । [मैं क्यों कहता हूँ प्रातःकाल यजन करो ? ] “न सायम् अस्ति देवया” (देवेज्या) इन दो देवताओं की सायंकाल में इज्या (पूजा) नहीं है। ‘अजुष्टम्’ (अनासेवितम्) यदि किसी प्रकार हो भी जावे, तो वह उनका अजुष्ट = अस्वीकृत है-सायंकाल में किये हुये यजनको वे देवता स्वीकार नहीं करते । ‘उत’ (एतदपि) और यह