निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४७४ ) १२अ० ५पा० १ खं० ताम् । अस्य सोमस्य पीतये ॥” (ऋ०सं० १, २, ४, १) प्रातर्योगिनौ विबोधय अश्विनौ-आगच्छताम् अस्य सोमस्य पानाय ॥ तयोः एषा अपरा भवति ॥४॥ अर्थः- “प्रातर्युजा०” इस ऋचाका मेधातिथि ऋषि और प्रातरनुवाक में विनियोग है । हे (स्तोतः) स्तुति करने वाले ! ऋत्विज् ! 'प्रातर्युजा' (प्रातर्योगिनौ) प्रातःकाल मिलने वाले-प्रातःकाल में हविः से और स्तुति से संयुक्त होने वाले 'अश्विनौ' अश्विन् देवों को 'विबोधय' जगा-सुन्दर स्पष्ट स्तुतियों से (अस्मदर्थम्) हमारे लिये जना । और तुमसे जनाये हुए वे दोनों 'इह' इस हमारे कर्म में 'आ-गच्छताम्' आवें । किस लिये 'अस्य' इस 'सोमस्य' सोम के 'पीतये' (पानाय) पीने के लिये ॥ “तयोः०” उन (अश्विनों) की यह और ऋचा है। (यह किस लिये है? इन अश्विनों की अन्य कालमें इज्या (पूजा) है ही नहीं, यदि कोई करे भी, तो वह अनिर्ज्या (अपूजा) या व्यर्थ पूजा ही है, और इनका संस्तव या सहस्तुति ही है, किन्तु पृथक् नहीं, यह अगली ऋचासे भली प्रकार दिखा- या जाता है) ॥४॥ (खं० ५) निरु०-“प्रातर्यजध्वमश्विना हिनोत न सायमस्ति देवया अजुष्टम् । उतान्यो अस्मद्यजते विचावः