निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें० हिन्दी निरुक्त ( ४७३ ) १२अ० १पा० ४खं० से कहा जाता है- "इह-इह जाता" ( इह च (मध्यस्थाने) इह च ( द्युस्थाने ) जातौ ) यहां मध्य स्थान में और यहां द्युस्थान में 'जाता' ( जातौ ) उत्पन्न हुए हुए तुम दोनों 'अरेपसा' ( पापेन अलिप्यमानया ) पाप से न लिपती हुई ( पापरहित ) 'तन्वा' शरीर से—अपने संकल्प के अनुसार ग्रहण किये हुए देह से 'स्वैः' अपने 'नामभिः' नामों से— जो दूसरे के आश्रय के बिना अपनी स्तुति के निमित्त से हैं 'समवावशीताम्' ( संस्तूयेते = संस्तूयेथे ) स्तुति किये जाते हो और वाम्' तुम दोनों में 'अन्यः' एक 'जिष्णुः' नित्य ही जय लाभ करने वाला 'सुमखस्य' ( सुमहतौ बलस्य ) सुन्दर महान् बलका 'सूरिः' ( ईरयिता ) प्रेरणा करने वाला है ( मध्यमः ) इससे मध्यम ( वायु या इन्द्र ) है । क्योंकि— ऐसे गुण वाला मध्यम से अन्य नहीं है । 'अन्यः' और एक 'सुभगः' सुन्दर धन वाला 'दिवः' द्युलोक का 'पुत्रः' पुत्र 'उहे' ( उह्यते वायुना ) वायुके द्वारा वहन किया जाता है— चलाया जाता है या लेजाया जाता है, वह (आदित्यः) आ- दित्य है। क्योंकि—वह सूर्य से अन्य नहीं हो सकता । इस प्रकार वहां परभी ये दोनों अश्विन मध्यम उत्तम देवरूप हैं। “तयोः०” उन दोनों ( अश्विनों ) की यह और ऋचा है । [ वह क्यों ? ये दोनों देवते साथ स्तुति वाले समान काल वाले और समान कर्म वाले हैं, यह कहा है, उसके दिखाने के अर्थ यह ऋचा है । ] ॥३॥ ( खं० ४ ) निरु०—“प्रातर्युजा विबोधयाश्विना वेह गच्छ.