निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४७२ ) १२ अ० १ पा०, ३ खं० ॥ “तयोः०” उन दोनों समान काल वालों समान कर्म वालों प्रायः एक साथ स्तुति वाले अश्विनों की पृथक् स्तुति की यह आधी ऋचा है ।- “वासात्यो अन्य०” अर्थात्— 'अन्यः' ( एकः ) एक 'वासात्यः' रात्रि को पुत्र है 'अन्यः' एक “तव उषःपुत्रः” तुझ उषा का पुत्र है । यह ॥ “तयो रेषा०” उन ( अश्विनों ) की यह और ऋचा है ॥ २ ॥ ( खं० ३ ) निरु०- इहेह जाता समवावशीतामरेपसा तन्वा३ नामभिः स्वैः । जिष्णुर्वामन्यः सुमखस्य सूरि र्दिवो अन्यः सुभगः पुत्र ऊहे ॥” (ऋ०सं० २, ४, २५, ४ ) । इह च इह च जातौ संस्तूयेते पापेन अलिप्य- मानया तन्वा नामभिश्च स्वैः जिष्णुर्वामन्यः सुमहतो बलस्य ईरयिता मध्यमः , दिवः अन्यः सुभगः पुत्रः ऊह्यते आदित्यः । तयोः एषा अपरा भवति ॥३॥ अर्थ—“इहेह जाता०” इस ऋचा का अगस्त्य ऋषि और प्रातरनुवाक और आश्विन में विनियोग है । ( हे अश्विनौ ! युवाम् ऊह्येथे ) हे अश्विनो ! तुम दोनों