निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'हिन्दी' निरुक्त ( ४७१ ) १२ अ० १ पा० २ खं० [ खं० २ ] निरु०- "वसातिषु स्म चरथोऽसितौ पेत्वा- विव। कदेदमश्विना युव मभि देवाँ अगच्छतम्॥" इति सा निगदव्याख्याता ॥ तयोः समानकालयोः समानकर्मणोः संस्तुत- प्राययोः असंस्तवेन एषोऽर्द्धर्चो भवति- "नासात्यो अन्य उच्यत उषः पुत्रस्तवान्यः" इति । तयोः एषा अपरा भवति- ॥ २ ॥ अर्थः-"वसातिषुस्म-"ऋषि को देवता के दर्शन की दृष्टि प्राप्तहुई, रात्रि भाग के बीते, दिनकी उगाली (सन्धि) हुई, ऋषि सहसा ही (एकदम ही) अश्विन देवों को देखकर कहता है। हे 'अश्विनौ।' हे अश्विन देबो ! 'युवाम्' तुम दोनों 'असितौ' काले 'पेत्वौ-इव' मेघों के समान 'वसातिषु' (रात्रिषु) रात्रियों में चरथ'(स्म) विचरते हो-आप के काले २ होने से रात्रिमें मैं आपको न देख सका, अब इस उषाकाल में किसी प्रकार देख सकाहूं, इसी से कहता हूँ- 'अश्विना' (अश्विनौ !) हे अश्विन् देवो ! 'कदा' कब 'इदम्' (अस्मत्कर्म प्रति) इस हमारे कर्म के प्रति (ये देवा आगता) जो देवता आए हैं, उनके प्रति 'युवम्' (युवाम्) तुम दोनों 'अभिगच्छतम्' आए ? ॥ . यह, सो ऋचा पाठ से ही व्याख्या की गई है।