भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1232, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1232

हिन्दी निरुक्त ( ४७० ) १२अ० १पा० १खं० एक मन्त्र से ही होता है, किन्तु ये दोनों भिन्न-२ लोक के देवता हैं। इनमें एक अन्धकार रूप है और एक प्रकाशरूप । जो अन्धकार रूप है, वह मध्यम लोक का और जो प्रकाशरूप है, वह उत्तम लोक का है । उत्तम लोक के देवताओं में व्याख्यान क्यों ? यद्यपि इन में एक देवता मध्यम लोक का है इससे इस [ अश्विन ] की व्याख्या मध्यम देवताओं में चाहिए, और एक उत्तम लोक का है, इससे उत्तम लोक के देवताओं में (जैसे कि-यहां है) चाहिए अथवा मध्यम (तमोरूप) का मध्यमों में और उत्तम (प्रकाशरूप] का उत्तमों में व्याख्यान होना चाहिये ? तथापि इनकी स्तुति सर्वत्र एक साथ ही आती है, किन्तु एक २ की नहीं इससे इनका ऐसा निगम नहीं दिया जा सकता जो एक देवता को वर्णन करे, इस से इन की व्याख्या एक ही लोक के देवताओं में होसकती है, और तथापि उत्तम लोक के देवताओं ही में उचित है। क्योंकि- उत्तम लोक का जो देवता प्रकाशरूप है, वही अपने प्रकाश रूप से वर्द्धमान है, और दूसरा जो तमोरूप है, वह सूर्योदय की ओर जितना चलता है अपने तमोरूप से क्षीण होता जाता है, प्रयोजन ? उत्तम देवता की बलवत्ता के कारण उसके अधि- कार में व्याख्या प्राप्त होती है, इस से यहाँ व्याख्या की गई है ॥ आचार्य का मत । यास्क का मत यह है कि-ये 'अश्विन्' नाम से मध्यम उत्तम देवता हैं। जिसके समर्थन के लिये यह उदाहरण देते हैं- ॥१॥