भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1231

हिन्दी निरुक्त ( ४६६ ) १२ अ० १ पा० १ ख० अन्धेरे को फाड़ता हुआ प्रकाश उसमें मिलने लगता है, या जब तक मिलता रहता है, वह काल सूर्योदय से पहिले २ अश्विनों का है । “तमोभागोहि मध्यमः” उस प्रकाश और अन्धकार के मेल में अन्धेरे का भाग मध्यम देव है ।— “ज्योतिर्भागः आदित्यः” और प्रकाश भाग आदित्य (उत्तम देव) है। (यह नैरुक्त मत है) ॥ "तयोः०" उन दोनों (अश्विनों) की यह ऋचा है ॥१॥ व्याख्या । “द्युस्थाना देवताः ” यद्यपि नैरुक्तों के मत में द्युस्थान का एक ही आदित्य देवता है, इससे 'देवता' पद में एक वचन ही चाहिए, तथापि याज्ञिकों के मत में बहुत देवता हैं, उनके मत में यह बहुवचन चरितार्थ हो जाता है । द्युस्थान के देवताओं का भेद । यद्यपि स्वरूप से सभी द्युस्थान के देवता एक जैसे हैं, तथापि भिन्न २ काल के सम्बन्ध से वे न्यारे २ समझे जाते हैं । तदनुसार अश्विनों का अन्य द्युस्थान के देवताओं से भेद बताने के लिये प्रथम व्याख्येय अश्विनों का “तयोः कालः०” इस पङ्क्ति से काल बता- या है। इसी प्रकार अन्य २ देवताओं के व्याख्यानों में भी उनके काल का अनुसन्धान रखना चाहिए । दोनों अश्विन भिन्न २ लोक के 'अश्विन्' नाम के दो जोड़ले जैसे देवता हैं, जहां कहीं भी इनका नाम आता है, द्विवचन से ही आता है, इसी से इनका अर्चन एक साथ