निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४१८ ) १२ अ० १ पा०, १ खं०
अर्थः-मध्यस्थान के देवताओं का विशेष वचनों और लिङ्गों के द्वारा व्याख्यान हो चुका, अब उसी समाम्नाय के अनुक्रम के अनुसार द्युस्थान [उत्तम स्थान] के देवताओं का व्याख्यान करना चाहिये, इस लिये विशेष रूप से पुनः अधिकार वचन कहते हैं-, “अथातो द्युस्थाना देवताः” अब यहां से द्युस्थान के देवताओं का व्याख्यान किया जावेगा । उनमें 'अश्विन्' प्रथमागामी (पहिले आने योग्य) हैं। 'अश्विनौ' [१] [अश्विन्] क्यों हैं? 'यद् व्यश्नुवातेसर्वम्' जिससे कि- वे सब को व्यापन करते हैं, उनमें एक रस (जल) से, और दूसरा (एक) ज्योति या प्रकाश से । अश्वों (घोड़ों) से वे 'अश्विन्' हैं- वे घोड़े वाले होने से 'अश्विन्' हैं । यह और्णवाभ आचार्य मानता है । (यह व्या- ख्यान ऐतिहासिक पक्ष में घटता है ।) “तत्०” सो कौन अश्विन् हैं ? 'द्यावापृथिवी हैं- द्युलोक और पृथिवी लोक हैं' ऐसा कोई मानते हैं । 'अहोरात्र हैं- दिन और रात्रि हैं' ऐसा कोई आचार्य मानते हैं ।' 'सूर्य चन्द्रमा हैं -ऐसा कोई आचार्य मानते हैं ।' 'पुण्य कर्म के करने वाले राजा हैं- ऐसा ऐतिहासिक मानते हैं।' “तयोः०” उन (अश्विनों)का काल अर्द्धरात्र(आधीरात) से पीछे है, ज्योति से फाड़ा जाता हुआ अंधेरा- जिस समय