भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1249

ऽ हिन्दी निरुक्त ( ४८७ ) १२ अ० १ पा० ११ खं० ऽ अधि देवता रूप रश्मियों ने त्वष्टा की पुत्री सरण्यू को घोड़ी बनाकर, कि- इससे अश्विनों का जन्म होगा, समझ कर लोक हित के लिये अमर देवी को (सरण्यू को) छिपा दिया, और उसे उत्तर (कुरु) देश में पहुंचा दिया । और फिर उस (सरण्यू) की छाया से वैसी ही दूसरी स्त्री बनाकर, उसे वि- वस्वान् को देदिया । जो उसको अश्वा (घोड़ी) रूप था, उससे सरण्यूने विवस्वान् के वीर्यसे दो अश्विन पुत्र जने और उन्हें उत्तर देश में पोषण किया । और जो उसको सरण्यू रूप था, उससे दो मिथुन (यम और यमी) उत्पन्न किये, [ इसीसे यम वैवस्वत और यमी वैवस्वती कही जाती है ] तथा उन्हें छोड़ कर स्वयम् नष्ट होगई ॥ “तदभिवादिनी०” इस अर्थको कहने वाली यह ऋचा है-जिस प्रकार त्वष्टाकी पुत्री सरण्यू विवस्वान् से व्याही गई और नष्ट होगई, इस अर्थको यह आगेकी ऋचा कहती है १०॥ ( खं० ११ ) निरु०- “त्वष्टा दुहित्रे वहतुं कृणोतीदं विश्व- भुवनं समेति । यमस्य माता पर्युह्यमाना महो जाया विवस्वतो ननाश ॥” [ऋ० सं० ८, ६, १३, १] । त्वष्टा दुहितुः वहनं करोति, इदं विश्वं भुवनं समेति, इमानि च सर्वाणि भूतानि अभिसमाग- च्छन्ति यमस्य माता पर्युह्यमाना महतो जाया विवस्वतो ननाश, रात्रिः आदित्यस्य आदित्यो- दये अन्तर्धीयते ॥११॥ इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य प्रथमः पादः ।१२,[१]।