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भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1248, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1248

हिन्दी निरुक्त (४८६) १२ अ० १ पा० १० खं० “यत् तत् आसीत् अजहात्” उषा या सरण्यू का जो रूप था, उसे छोड़ा। “द्वौ मिथुनौ सरण्यूः” सरण्यू ने दोनों मिथुनों को (मध्यम ज्योति और मध्यम लोककी वाक् को) छोड़ा। क्योंकि- जब सरण्यू आदित्य के मण्डल में प्रवेश कर जाती है, तब आदित्य के उदय होते ही मध्यम का और माध्यमिक वाक् का काल विच्छिन्न हो जाता है- कट जाता है, यही उनका त्याग है। यह नैरुक्त आचार्य मानते हैं। “यमं च यमीं च इति ऐतिहासिकाः” ‘यम और यमी रूप मिथुन को छोड़ा’ ऐसा ऐतिहासिक लोग मानते हैं। “तत्र०” उस में ऐसा इतिहास कहते हैं।- त्वष्टा की बेटी सरण्यू ने विवस्वान् आदित्य से यम (जोड़ले) मिथुन उत्पन्न किये, वह अपने सरीखी दूसरी स्त्री को अपने स्थान में छोड़ कर घोड़ी का रूप बना कर भगी, और वह विवस्वान् आदित्य भी घोड़े का ही रूप बना कर उस के पीछे चल कर उससे मिला। उस से दो अश्विन् देवता उत्पन्न हुए और जो सवर्णा स्त्री, जिसे सरण्यू अपना दूसरा रूप बना कर छोड़ गई थी, उस में मनु उत्पन्न हुआ [इसी को वैवस्वत (विवस्वान् का पुत्र) मनु कहते हैं]॥ व्याख्या । ऐतिहासिक पक्ष में “अपागूहन्०” मन्त्र का अर्थ- उनके मतमें रश्मियों के दो रूप हैं, एक भौतिक जिसे हम देखते हैं और दूसरा प्राणाधि देवता रूप। प्राणों के