निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४८५ ) १२अ० १पा० १०खं० तद् आसीद् अजहाद् द्वौ मिथुनौ सरण्यू, ‘मध्य- मं च माध्यमिकां च वाचम्’ इति नैरुक्ताः । ‘यमं च यमीं च’ इति ऐतिहासिकाः ॥ तत्र इतिहासम् आचक्षते- त्वाष्ट्री सरण्यूः विवस्वतः आदित्याद् यमौ मिथुनौ जनयाञ्चकार, सा सवर्णाम् अन्यां प्रतिनिधिधाय आश्वरूपं कृत्वा प्रदुद्राव, स विवस्वान् आदित्य आश्वमेव रूपं कृत्वा ताम् अनुसृत्य संबभूव, ततः अश्विनौ जज्ञाते सवर्णायां मनुः । तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति ॥१०॥ - अर्थः- “अपागूहन्०” इस ऋचा का देवश्रवस् ऋषि है । “अपागूहन् अमृत्तां मर्त्येभ्यः” आदित्य की रश्मि यों ने वृषाकपायी के रूप में अमर उषाको मनुष्यों के लिये उत्पन्न किया । “कृत्वी सवर्णाम् अददुः विवस्वते” उसे सवर्णा बनाकर- सूर्य के समान रूप वाली वा सरण्यू बना कर विवस्वान् [सूर्य] के लिये देदी (देदिया) “उत अश्विनौ अभरत्” और उषाने अश्विनोंको स्तुतियों से पोषण किया, क्यों कि - वह अश्विनों की स्तुतिका समय है अथवा सरण्यूने अश्विनों को हविः से भरण (पालन) किया, क्यों कि- वह उनके याग (यज्ञ) का समय है।