सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1247, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1247

हिन्दी निरुक्त ( ४८५ ) १२अ० १पा० १०खं० तद् आसीद् अजहाद् द्वौ मिथुनौ सरण्यू, ‘मध्य- मं च माध्यमिकां च वाचम्’ इति नैरुक्ताः । ‘यमं च यमीं च’ इति ऐतिहासिकाः ॥ तत्र इतिहासम् आचक्षते- त्वाष्ट्री सरण्यूः विवस्वतः आदित्याद् यमौ मिथुनौ जनयाञ्चकार, सा सवर्णाम् अन्यां प्रतिनिधिधाय आश्वरूपं कृत्वा प्रदुद्राव, स विवस्वान् आदित्य आश्वमेव रूपं कृत्वा ताम् अनुसृत्य संबभूव, ततः अश्विनौ जज्ञाते सवर्णायां मनुः । तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति ॥१०॥ - अर्थः- “अपागूहन्०” इस ऋचा का देवश्रवस् ऋषि है । “अपागूहन् अमृत्तां मर्त्येभ्यः” आदित्य की रश्मि यों ने वृषाकपायी के रूप में अमर उषाको मनुष्यों के लिये उत्पन्न किया । “कृत्वी सवर्णाम् अददुः विवस्वते” उसे सवर्णा बनाकर- सूर्य के समान रूप वाली वा सरण्यू बना कर विवस्वान् [सूर्य] के लिये देदी (देदिया) “उत अश्विनौ अभरत्” और उषाने अश्विनोंको स्तुतियों से पोषण किया, क्यों कि - वह अश्विनों की स्तुतिका समय है अथवा सरण्यूने अश्विनों को हविः से भरण (पालन) किया, क्यों कि- वह उनके याग (यज्ञ) का समय है।