भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1246, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1246

हिन्दी निरुक्त ( ४८४ ) १२ अ० १ पा० १० खंड० ‘प्रियम्’ (इष्टम्) वाञ्छित ‘काञ्चित्करम्’ (सुखाद्यकरम्) सुखकी वृद्धि को करने वाले ‘हविः’ (उदकम्) जल को (कुरुष्व) कर । किस लिये ? (विश्वस्मात्) सबसे ‘उत्तरः’ ऊँचा ‘इन्द्रः’ (आ- दित्यः) जो आदित्य देव है । (उसके अर्थ) उस आदित्य को हम यह कहते हैं ॥ ‘स्नुषा’ ( पुत्रवधू ) क्यों ? ‘साधुसादिनी’ सुन्दर कर्म में में बैठती है— श्वशुर के सन्तान रूप सुन्दर अर्थ में उसके अङ्गभाव को प्राप्त होती है—उसकी सम्पत्ति के एक भाग में स्थित होती है। अथवा साधुसानिनी होती है—शुभ सन्तान को भले प्रकार भजती है । अथवा सुन्दर अपत्य ‘सन्तान’ को सनती है = प्राप्त होती है, इससे स्नुषा है । ‘उक्षने’ कैसे ? वृद्धि अर्थ में ‘उक्ष’ (भ्वा०प०) धातु से है ‘सरण्यूः’ (५) क्यों ? सरण गमन करने से । वही उषा जब सूर्य के प्रति अधिभाग से ‘अभेद से’ गई हुई होती है, तब वह सरण (गमन) से ‘सरण्यू’ कहाती है । “तस्याः०” उस (सरण्यू) की यह ऋचा होती है ॥६॥ ( खं० १० ) निरु०- “ अपागूहन्नमृतां मर्त्येभ्यः कृत्वी सवर्णा मददु विवस्वते । उताश्विना बभरद्यत्तदा सीदजहादु द्वा मिथुना सरण्यूः ॥ ” ( ऋ० सं० ७, ६, २३, २ ) ॥ अपि अगूहन् अमृतां मर्त्येभ्यः, कृत्वी सवर्णा- म् अददुः विवस्वते’ अपि अश्विनौ अभरद्, यत्

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