भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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१२६ अ० १ पा० ५ ख० १ । नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार लोकमें “आहर पात्रम्” ‘लेआ, पात्र’ ऐसा भी कहते हैं, और “पात्रमाहर” ‘पात्रको लेआ’ ऐसा भी। वेदमें “अग्न आयाहि” के स्थानमें ‘आयाह्यग्ने’ ऐसा नहीं कह सकते। प्रयोजन यह कि—जब अर्थ के लिये शब्द बोले जाते हैं, तो वह जिस प्रकार सिद्ध हो, वैसे ही वैसे शब्द बोले जा सकते हैं, शब्दोंके क्रम तथा विशेषको नियत करनेका कोई प्रयोजन नहीं। जब कि—मन्त्रोंमें उक्त दोनों बातें नहीं हैं तो अर्थवाले शब्दोंके विरुद्ध स्थितिके कारण वे अनर्थक ही कहे जा सकते हैं। (२) ब्राह्मण या विधि वाक्यसे जिन कर्मोंमें मन्त्र विनियोग किये जाते हैं स्वयम् उन कर्मोंको बोधन करनेकी शक्ति रखनेके कारण वे अपनेको उन कर्मोंमें विनियोग कर सकते हैं, तथापि मन्त्र ब्राह्मण वाक्यके द्वारा ही कर्मोंमें विनियुक्त होते हैं यदि ये मन्त्र अर्थवान् होते तो ब्राह्मण वाक्य इनका विनियोग नहीं करता। भाव यह है कि—जो अपने कर्त्तव्यको आप जानता है, उसे शिक्षककी आवश्यकता नहीं होती, सुतराम् मूढके लिये दूसरे विद्वान् प्रेरककी अपेक्षा होती है, इसी रीतिसे मन्त्र अर्थशून्य होनेसे मूढ़के समान है इसीसे वह दूसरे अर्थवान् ब्राह्मण शासक वाक्यके द्वारा कर्मोंमें विनियुक्त किया जाता है। जैसे— “उरुप्रथस्वेति प्रथयति” (श० ब्रा० १, १, ६, ८) इस ब्राह्मणका यह अर्थ है, कि “उरु प्रथस्व” इस मन्त्रसे (पुरोडाशका) प्रथन करे। अर्थात् इस विधिवाक्यने ‘उरुप्रथस्व” (य० वा० स० १, २२) इस यजुःको पुरोडाशके प्रथन कर्ममें विनियोग किया, तथा यह मन्त्र भी— “हे पुरोडाश ! तू फैल” अपने इस अर्थसे पुरोडाशके प्रथन कर्ममें सामर्थ्य रखता है,