भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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क्योंकि इसके अर्थ से यह बात प्रतीत होती है। इसी प्रकार "प्रोहाणोति प्रोहति" यह ब्राह्मण, द्रोणकलशके प्रोहण कर्ममें "प्रोहाणि" इस मन्त्रको विनियोग करता है। और मन्त्र भी स्पष्ट रूपसे प्रोहणक्रियाको बता रहा है। इससे लिङ्ग सम्पन्न मन्त्रोंके विधानके कारण हम देखते हैं कि--मन्त्र अनर्थक हैं। उपर्युक्त युक्तिसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि--ब्राह्मण विनियोजक (प्रेरक) होनेसे अर्थवान् है और मन्त्र विनियोज्य (प्रेर्य्य) होनेसे अनर्थक। यदि कोई ऐसी कल्पना करे कि-- ब्राह्मण ही अनर्थक क्यों न हो, मन्त्र अपने अर्थ के सामर्थ्यसे ही विनियुक्त होता ? इसका उत्तर यह है कि ब्राह्मण केवल मन्त्रका ही विनियोग नहीं करता अपितु देश, काल, कर्त्ता और दक्षिणा आदि अन्य कर्मोंके अङ्गोंको भी बताता है, वे सब कहांसे जाने जावेंगे। अतः ब्राह्मणकी अनर्थकता नहीं हो सकती। यदि बलात् ब्राह्मणकी अनर्थकता मान भी लें तो वेदके एक देश रूप मन्त्रकी अत्यन्त ही अनर्थकता होगी। इसके अतिरिक्त यह भी है कि-यदि ब्राह्मणकी अनर्थकता मानें तो यह प्रश्न हो सकता है कि-ब्राह्मण फिर किस लिये है, जो विधि और कर्मको स्तुतिको नहीं करता ? किन्तु यदि मन्त्र- पर यह प्रश्न किया जाय कि यदि उसका कुछ अर्थ नहीं तो वह किस लिये है, तो उसका उत्तर यह दिया जा सकता है, उसका कर्मोंमें विनियोग होता है। अर्थात् ब्राह्मणका विधिके विना अन्य कोई प्रयोजन न रहनेसे उसको अर्थवान् मानना ही पड़ेगा और मन्त्रका अर्थ स्वीकार न भी किया जावे तो कोई हानि नहीं, इसलिये ब्राह्मण अर्थवान् और मन्त्र अनर्थक है यह सिद्ध हुआ । (३) मन्त्रोकी अनर्थकतामें यह भी कारण है कि-उनके जो