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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

क्योंकि इसके अर्थ से यह बात प्रतीत होती है। इसी प्रकार "प्रोहाणोति प्रोहति" यह ब्राह्मण, द्रोणकलशके प्रोहण कर्ममें "प्रोहाणि" इस मन्त्रको विनियोग करता है। और मन्त्र भी स्पष्ट रूपसे प्रोहणक्रियाको बता रहा है। इससे लिङ्ग सम्पन्न मन्त्रोंके विधानके कारण हम देखते हैं कि--मन्त्र अनर्थक हैं। उपर्युक्त युक्तिसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि--ब्राह्मण विनियोजक (प्रेरक) होनेसे अर्थवान् है और मन्त्र विनियोज्य (प्रेर्य्य) होनेसे अनर्थक। यदि कोई ऐसी कल्पना करे कि-- ब्राह्मण ही अनर्थक क्यों न हो, मन्त्र अपने अर्थ के सामर्थ्यसे ही विनियुक्त होता ? इसका उत्तर यह है कि ब्राह्मण केवल मन्त्रका ही विनियोग नहीं करता अपितु देश, काल, कर्त्ता और दक्षिणा आदि अन्य कर्मोंके अङ्गोंको भी बताता है, वे सब कहांसे जाने जावेंगे। अतः ब्राह्मणकी अनर्थकता नहीं हो सकती। यदि बलात् ब्राह्मणकी अनर्थकता मान भी लें तो वेदके एक देश रूप मन्त्रकी अत्यन्त ही अनर्थकता होगी। इसके अतिरिक्त यह भी है कि-यदि ब्राह्मणकी अनर्थकता मानें तो यह प्रश्न हो सकता है कि-ब्राह्मण फिर किस लिये है, जो विधि और कर्मको स्तुतिको नहीं करता ? किन्तु यदि मन्त्र- पर यह प्रश्न किया जाय कि यदि उसका कुछ अर्थ नहीं तो वह किस लिये है, तो उसका उत्तर यह दिया जा सकता है, उसका कर्मोंमें विनियोग होता है। अर्थात् ब्राह्मणका विधिके विना अन्य कोई प्रयोजन न रहनेसे उसको अर्थवान् मानना ही पड़ेगा और मन्त्रका अर्थ स्वीकार न भी किया जावे तो कोई हानि नहीं, इसलिये ब्राह्मण अर्थवान् और मन्त्र अनर्थक है यह सिद्ध हुआ । (३) मन्त्रोकी अनर्थकतामें यह भी कारण है कि-उनके जो

३२८ अ० १ पा० ५ ख० १ ।

  • अर्थ हैं, वे किसी युक्तिसे संगत नहीं होते। अर्थात् मन्त्रोंमे जैसा अर्थ लब्ध होता है कि- यह इनमें अर्थ होगा, वह घटता नहीं। जैसे- “ओषधेत्रायस्व” ( य० वा० सं० ४, १, ६, १५) 'हे ओषधे तू इस यजमानकी रक्षा कर।' अग्निष्टोम यज्ञमें यजमानके क्षौर कर्मके आरम्भमें उसके शिरपर कुशका अङ्कुर या पत्ता लगाया जाता है कि पहिले छुरा शिरपर न टिककर उसी पर टिके, उस तृणके धरनेका यह मन्त्र है। किन्तु इस मन्त्रके अर्थको स्वीकार करें तो यह प्रश्न होगा कि-जब ओषधि अपनी ही रक्षा नहीं कर सकती तो यजमानकी क्या करेगी ?” तथा दूसरा मन्त्र छुरेके चलानेके लिये हैं- “स्वधिते मैन≍हि≍सीः” ( य० वा० सं० ४, १-६, १५) इसका अर्थ है-हे क्षुर ! पैनीधारवाले ! तू इस यजमान की हिंसा न करना। अब देखते हैं, तो-जो छुरेसे स्वयम् यजमान के बालोंको काट रहा है, वही छुरेसे न काटनेको प्रार्थना कर रहा है। कौन ऐसा है जो ऐसा कह कर, ऐसा करेगा ? लोकमें जितने ऐसे वाक्य होते हैं, वे सब उन्मत्त लोगोंके जैसे अनर्थक ही माने जाते हैं। इस लिये ये मन्त्र वाक्य भी अनर्थक ही हैं। ४-मन्त्रोंकी अनर्थकतामें और हेतु यह है कि-एक मन्त्रके अर्थको दूसरे मन्त्रका अर्थ निषेध करता या मिथ्या ठहराता है। जैसे कि- “एक एव रुद्रोऽवतस्थे न द्वितीयः” “असं- ख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा अधिभूम्याम् ( य० वा० सं० १६, ५४) “अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे” (ऋ० सं० ८, ७, २१, २) “शतं सेना अजयत्साकमिन्द्रः” (ऋ०

हिन्दी निरुक्त । ४२६ सं० ८, ५, २२, १ ) ये उदाहरण हैं। एक मन्त्रमें कहा गया है कि—'संग्राममें शत्रुओंको मारनेवाला एक ही रुद्र उठा हुआ था, कोई दूसरा न था' दूसरे मन्त्रमें कहा है कि—'पृथिवी पर असंख्य रुद्र हैं' यहां दोनों मन्त्रोंका परस्पर यह विरोध है कि—'एक है तो असंख्य कैसे' ? और 'असंख्य हैं, तो एक कैसे ?' तथा एक मन्त्रमें कहा है कि—'इन्द्र अशत्रु था' एवम् दूसरे मन्त्रमें कहा है कि—'उसने एक साथ ही शत्रुओंकी सैकड़ों सेना- ओंको जीता।' यहां भी यह प्रश्न हो सकता है कि—यदि उसके कोई शत्रु न था, तो उसने शत्रुओंकी सेनाओंको नहीं जीता' और 'यदि शत्रुओंकी बहुत सेनाओंको जीता, तो वह अशत्रु न था।' लोकमें उन्मत्त आदिकोंके ऐसे वाक्य अनर्थक समझे जाते हैं। इसीसे वे भी अनर्थक हैं। ५—मन्त्रोंकी अनर्थकतामें और हेतु यह है कि—अध्वर्यु (ऋत्विज् विशेष) जानते हुए होता को प्रैष (प्रेरणा) करता है कि— “अग्नये समिध्यमानायानुब्रूहि” 'जलते हुए अग्निके लिये तू अनुवचनकर' किन्तु यह प्रैष निष्प्रयोजन है, क्योंकि—विधिमें विद्वान् हो होता लिया है, इस लिये वह स्वयम् जानता है कि— 'इस अवधि या समयमें मुझे यह अनुष्ठान करना चाहिये' अतः जाननेवालेको ऐसा प्रेषण अनर्थक ही होता है, फलित यह कि- 'जैसे यह अनर्थक है वैसे ही और मन्त्र भी अनर्थक होगे। - ६—कई ऐसे मन्त्र है, जो एक ही वस्तुको कभी कुछ और कभी कुछ कहते.हैं, अर्थात् जिन जिन वस्तुओंके रूपमें एक वस्तुकों बताया जाता है, वे प्रत्यक्षमें सदा ही परस्पर भिन्न हैं, जैसे— १७

१३० अ० १ पा० ४ ख० १ । "अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्ष म दिति र्माता स पिता स पुत्रः । विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदिति जातमदितिर्जनित्वम् ॥ (ऋ० सं० १, ६, १६, ५) इस मन्त्रमें 'जो ही अदिति द्युलोक (३ द्युलोक) है वही मध्यम लोक (अन्तरिक्ष) है। एवम् वही माता, पिता, तथा पुत्र है।' ऐसी ऐसी बहुत बातें परस्पर विरुद्ध कही हुई हैं, यदि ऐसे मन्त्रोंको अर्थवान् जाना जावे तो उनका उपपादन करना अशक्य हो जायगा, इसलिये उनका अनर्थक मानना ही ठीक है। ७—इस लिये भी मन्त्र अनर्थक कहे जा सकते हैं, कि—उनमें ऐसे शब्द भी आते हैं, कि—जिनका स्पष्ट रीतिसे कोई अर्थ ही प्रतीत नहीं होता। जैसे—"अम्यक्, यादृश्मिन्, जारयायि, काणुका" इत्यादि। क्योंकि—मन्त्रोंमें इनका कुछ स्पष्ट अर्थ जाना नहीं जा सकता। ऐसी कल्पना भी नहीं हो सकती कि— “मन्त्रोंमें कुछ शब्द अनर्थक हैं, और कुछ अर्थवान्”। क्योंकि— इसमे अर्द्धावशेष रह जायगा, इस लिये सारे ही अनर्थक हैं यह मानना अच्छा है। परिसमाप्तः पूर्वपक्षः । मन्त्रोंकी सार्थकताकी स्थापना । १—यास्क—"मन्त्र अर्थवान् ही हैं" किन्तु कौत्सके कथना- नुसार अनर्थक नहीं। क्योंकि—लोक और वेदमें समान ही शब्द हैं, अर्थात् जो 'गो' शब्द लोकमें स्वर-संस्कार युक्त है, वही मन्त्रोंमे भी है, ऐसी अवस्था में 'वही शब्द लोकमें अर्थवान् रहे और मन्त्रोंमें अनर्थक'—इसमें कोई विशेष हेतु नही है। जब

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कि—'विशेष हेतु नहीं है' तो शब्दोंकी समानतासे मन्त्र अर्थवान् हीं हैं । २—कौत्सने कहा है कि—"लोकमें शब्दोंको अनियमसे प्रयोग करनेके कारण शब्द अर्थवान् हैं" और वेदमें शब्दोंके प्रयोगके नियम होनेके कारण मन्त्र अनर्थक हैं"—यह अयुक्त है । क्योंकि—लोकमें 'जो दो शब्द हैं' उनके पौर्वापर्यका परिवर्त्तन नहीं हो सकता । ३—ब्राह्मण ग्रन्थ भी स्पष्ट रूपसे मन्त्रोंकी अर्थवत्ताको कह रहा है कि— “एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं यद्रूपसमृद्धं यत्कर्मक्रिय- माणमृग्यजुर्वाऽभिवदति” इति च । [ब्राह्मणम्] 'यह यज्ञकर्मका समृद्ध है, वह क्या ? जो रूप समृद्ध या मन्त्रलिङ्गोंसे कहा गया हों, अर्थात् किये जाते हुए कर्मको ऋचा अथवा यजू रूप मन्त्र अनुवाद करता हो । अब देखें कि—यदि मन्त्र अनर्थक हैं, तो कैसे कर्मको अनु- वाद करेंगे ? यदि अनुवाद नहीं करते तो कर्मका समर्थन कैसे करेंगे ? सर्वथा इस ब्राह्मण वाक्यसे मन्त्रोंकी अर्थवत्ता स्पष्ट उक्त होती है । ब्राह्मणको अनर्थकता स्वीकार करके तुम इस प्रमाणको निष्फल कर सकते हो, किन्तु तुम्हारा यह साध्य नहीं, क्योंकि—तुम पहिले ही ब्राह्मणको “ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना विधीयन्ते” इस वाक्यसे अर्थवान् स्वीकार कर चुके हो । इससे यह दिखाया जा चुका कि—मन्त्र अर्थवान् हैं । “इहैव स्त॑ मा वियौष्टं॒ विश्वमायु॒र्व्यश्नुतस् । क्रीळ॑न्तौ पु॒त्रैर्नप्तृ॑भि॒र्मोद॑मानौ स्वे गृ॒हे”

१३२ अ० १ पा० ५ ख० १ । सूर्य ऋषि । अनुष्टुप् छन्दः । विवाहमें विनियोग ॥ इसी अपने घरमें तुम दोनों स्त्री-पुरुष मोद या हर्षयुक्त हो। तुम कभी वियुक्त न हो। बेटे और पोतोंके साथ क्रीड़ा करते हुए, पूर्ण आयुको भोगों। यह आशीर्वाद है। विवाह कर्मका समस्त प्रयोजन इस मंत्रमें स्पष्ट वर्णन किया है। (पूर्वपक्षका खण्डन) सिद्धान्तीने मन्त्रोंकी अर्थवत्ताको स्थापना कर दी, अब पर पक्षमें जो हेतु हैं, उनका खण्डन करते हैं। १—मन्त्रोंकी अनर्थकतामें पहिला हेतु यह दिया है कि—उनमें शब्द तथा उनका क्रम नियत रहता है, हम कहते हैं कि—अर्थवाले लौकिक शब्दोंमें भी ऐसा देखा गया है, जैसे कि—"इन्द्राग्नी” "पितापुत्रौ”। जबकि—लौकिक शब्दोंमें भी नियत प्रयोग होते हुए कोई शब्द अर्थवान् है, तो मन्त्रोंको अनर्थकताके लिये वही हेतु अनैकान्तिक अथवा व्यभिचारी है। इससे मन्त्र अर्थवान् ही हैं। २—दूसरा हेतु यह कि--‘ब्राह्मणसे रूपसम्पन्न या अर्थके बोधक होते हुए भी मन्त्र विधान किये जाते हैं’ ठीक नहीं। क्योंकि- उसका यह प्रयोजन नहीं कि—'मन्त्र अपने स्वरूपसे अपनेको ही विधान करनेमें समर्थ है, इस लिये उसको ब्राह्मण विधान करता है,’ बल्कि—मन्त्रके कहे हुए अर्थको ही, उसकी विस्तारसे प्रशंसा या अनुमोदन करनेकी इच्छासे अनुवाद करता है। अर्थात् लोक, एकवार, संक्षेप तथा बिना प्रशंसाके कहे हुए अर्थको ग्रहण नहीं करता, इसीसे मन्त्र जिस अर्थको एकवार संक्षेपसे प्रशंसाके बिना कहा जाता है, उसीको ब्राह्मण दुबारा विस्तारसे प्रशंसा पूर्वक कह देता है, और यह भी है कि—जबतक कोई बात कही हुई न हो, अचानक उसकी प्रशंसा नहीं होसकती, इसलिये जिस अर्थकी

हिन्दी निरुक्त । १३३ ब्राह्मण प्रशंसा करे, वह अर्थ पहिले किसोका कहा हुआ होना चाहिये, किन्तु ऐसी आकांक्षाको सहजन्मा मन्त्रके अतिरिक्त और कौन पूरीकर सकता है। फल यह निकला कि—'मन्त्र अर्थवान् होकर भी ब्राह्मणसे विहित होता है, इससे वह अनर्थक नहीं होना चाहिये, प्रत्युत ब्राह्मणकी अर्थवत्ताके लिये उसे अर्थवान् होनेकी बड़ी आवश्यकता है। इस निर्णयके अनुसार कौत्सके मतमें, 'जो ब्राह्मणका अर्थवत्ता मन्त्रको अनर्थक बनाती थी,स्वयम् वही अब मन्त्रकीअर्थवत्ताके अनर्थक बनाती थी, स्वयम् वही अब मन्त्रकी अर्थवत्ताके बिना अपने ठहरनेका कोई आधार नहीं पाती। इस प्रकार ब्राह्मणकी अर्थवत्ताकी सहचरी बनकर मन्त्रकी अर्थवत्ता निर्विशङ्क विराजती है। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणकी अर्थवत्ता यो भी है कि—किसी किसी प्रकरणमें समानलिङ्ग अनेक मन्त्र होते है,जो सब समानरूपसे एकही कर्मको बोधन करते हैं, इससे या तो वे सभी कबूतरोंके समान एकदम उस कर्ममें आवें, या उनका विकल्प हो ? वैसे स्थलमें किसी अभिमत एक मन्त्रका नियम कर देता है कि—इस कर्ममें यही मन्त्र लिया जाय। इस प्रकार ब्राह्मणकी स्वतन्त्र आवश्यकता है, उसके कारण मन्त्र अनर्थक नहीं हो सकते। इससे सिद्ध हुआ कि—"मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही अर्थवान् हैं। ३—जोकि--यह कहा कि—"ओषधे त्रायस्वैनम्” “स्वधिते मै॒नं॒ हिं॑सीः” इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ उत्पन्न नहीं होता इस लिये मन्त्र अनर्थक है' ? ठीक नहीं है। क्योंकि—जहां केश या वृक्ष आदिके छेदनमें यह मन्त्र विनियुक्त है, वहां इस मन्त्रके द्वारा ओषधिके अधिदेवताको स्तुति की जाती है और उसीसे जजमान और वृक्ष आदिकोंके प्राणकी प्रार्थना है। जिससे कि—देवताकी

१३४ अ० १ पा० ५ सू० १ । कृपा से निर्विघ्न पीड़ारहित संस्कृत होकर वे यज्ञकर्ममें विनियुक्त हों। इसलिये मंत्रोंके अर्थोंमें कोई अनुपपत्ति नहीं है। ४-जोकि—यह कहा कि—हिंसा करता हुआ भी कहता है कि—“स्वधिते मैन ्र ति ्र सीः” इसपर कहना यह है कि-वेद- वाक्यसे यह अहिंसा प्रतीत होगी। प्रश्न होता है कि—प्रत्यक्षमें छेदन कर्म हिंसा है वह कैसे अहिंसा होसकती हैं ? सुनो;—‘यह अहिंसा है’ और यह हिंसा’ यह आगमसे प्रतीत होता है। और सम्पूर्ण आगमोंमें वेद ही प्रतिष्ठित आगम है, क्योंकि—सब अंग वेदसे ही निकले हैं। इसलिये वेदमें जिस छेदनादि क्रियाका विधान है, वह हिंसा नहीं कही जासकती। इन सबका यह अभिप्राय है कि—वेदवाक्य, जो धर्मका प्रथम बतानेवाला है, उसीसे हिंसा और अहिंसाका पता चलेगा, जिसको वह हिंसा कहे वह हिंसा है,और जिसको अहिंसा कहे,वह अहिंसा। जबकि—हिंसा-अहिंसाका निर्णता वेदही छेदनादि क्रियाका विधान करता है तो उसको हिंसा नहीं समझना चाहिये। जैसे कि कहा है,— “या वेदविहिता हिंसा न सा हिंसा प्रकीर्त्तिता” अर्थ—‘जो हिंसा वेदमें विहित है वह हिंसा नहीं है।’ क्योंकि— वैदिक आगम सारे ही जगत्के किसी एक उत्तम कल्याणके लिये उद्यत हुआ है, वह कैसे किसी प्राणीके अनिष्टके लिये विधान करता, इसलिये उसने जो कुछ किसी प्राणीके लिये छेदनादि कहा है, वह उसकी उत्तम गतिके लिये ही है। किञ्च ओषधि, वनस्पति, पशु, मृग, पक्षी, तथा सरीसृप सब, यज्ञमें भले प्रकार उपयुक्त होकर उत्कर्ष को प्राप्त होते हैं। वह उनकी हिंसा नहीं, लाभ है।

हिन्दी निरुक्त। १३५ हम समझते हैं कि-ठीक यही अभिप्राय निम्न लिखित मार्क- ण्डेयपुराणके सप्तशती स्तोत्रमें भी दिखाया है । "एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम् । संग्राम मृत्यु मधि- गम्य दिवं प्रयान्तु मत्वेतिनून महिमान्विति- हंसि देवि !" (४,१८) । अर्थ:-"हे देवि ! संसारमें अशान्तिके उत्पन्न करनेवाले इन राक्षसोंको तुम समदर्शिनी होकर भी इसलिये मारती हो कि- 'इनके मरनेसे सब जगत् सुखी हो, तथा ये (दैत्य) नरकमें जानेके लिये बहुत कालतक पाप करें, इसकी अपेक्षा संग्राममें मृत्युको प्राप्त होकर, स्वर्गमें जावें, अच्छा होगा ।” अर्थात् भगवती उनके अनिष्टके लिये नहीं प्रत्युत उनके अभ्युदयके लक्ष्यसे उनका वध करती है इसी तात्पर्यके साथमें भगवान् वेद भी वृक्षादिकोंकी हिंसाका विधान करता है। इस रीतिसे मंत्रोंमें ऐसा कोई अर्थ नहीं जो अनुपपन्न हो, अतः मंत्र अर्थवान् हैं। (५) परस्पर विरुद्ध अर्थके उदाहरणसे भी मंत्रोंकी अन- र्थकता नहीं है, क्योंकि-यह बात दैवतकाण्ड (७, १, ४) में स्पष्ट कही जायगी कि-'देवता महाभाग्यके योगसे एक भी अनेक होजाती है और अनेक होती हुई एक । इस कारण एक रुद्र अनेक रूप होसकतो और अनेक एक, इसलिये मंत्रोंमें कोई ऐसा विरोध न होनेसे मंत्र अर्थवान् हैं । (६) इन्द्रके शत्रुरहित होने और उसके सैकड़ों शत्रुसेनाओंके जीतनेका प्रश्न भी युक्त नहीं, क्योंकि-लोकमें भी “असपत्नोऽयं ब्राह्मणः” 'यह ब्राह्मण शत्रु रहित है' “अनमित्रोऽयं राजा” 'यह

अ० १ पा० ५ ख० १ ।

राजा वैरीशून्य है' इत्यादि व्यवहार प्रसिद्ध हैं। किन्तु लोकमें कोई शत्रुरहित नहीं है। जैसाकि—कहा है— मुनेरपि वनस्थस्य स्वाति कर्माणि कुर्वतः । उत्पद्यन्ते त्रयः पक्षा मित्रोदासीन शत्रवः । अर्थ—मुनि जो वनमें रहकर केवल अपने कर्मोंको करता है, उसके भी मित्र उदासीन और शत्रु ये तीन पक्ष उत्पन्न होजाते हैं। तथापि किसीको कोई स्वल्पशत्रु देखकर ऐसा कह देता है कि- ‘वह अशत्रु है’ इसी प्रकार जब इन्द्रने किसी बड़े भारी मेघका हनन किया, उस समय अन्यमेघोंकी असारता जानकर कह दिया कि-- हे इन्द्र ! अब तू अशत्रु होगया, जैसा कि--किसीके भारी शत्रुके नष्ट होजानेपर क्षुद्र शत्रुओंके रहते हुए भी उसे अशत्रु कहा जावे, उसीके समान इंद्रकी अशत्रुता भी होसकती है। यद्यपि देवताओंके कोई शत्रु नहीं होते, बल्कि—वे विभुस्व- तंत्र तथा महिमावाले होते हैं तथापि सैकड़ों सेनाओंके जीतनेकी स्तुति कल्पनामात्र है। क्योंकि—आगे कहेंगे कि-“जल और ज्योतिः के योगसे वर्षण कर्म होता है” वहां उपमाके लिये युद्धका वर्णन होता है” (नै० का० २, ५, २) । इसलिये हे कौत्स ! तुम्हे यह ठीक नहीं दिखाई देता, निरुक्तके जाननेवालोंसे देवता तत्वको समझो, उसीसे तुम मन्त्रोंके अर्थोंको विरोध रहित जान सकोगे। इस प्रकार (जैसाकि—तुम करते हो) वाक्यके तत्वके न जाननेवालेसे मन्त्रार्थ अवगाहन नहीं किया जा सकता। क्योंकि—वेदके पदार्थ गम्भीर हैं। कैसे जानोंगे ? वेदार्थके विचारमें भ्रान्त वादियोंने ही अपनी बुद्धिके लाघवके प्रकट करने के लिये सर्व-वर्णा साधारण दर्शनोंको प्रतिपादन किया है, उन्हींके चक्रमें तुम भी कहीं पड़ गये हो। अतः तुमने जो कहा है

कि—“विप्रतिषिद्धार्थ होनेसे मन्त्र अनर्थक हैं” यह तुम्हारा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि 'ये मन्त्र विप्रतिषिद्धार्थ नहीं हैं, किन्तु मन्द शिक्षाके कारण तुम्हारी बुद्धिका ही यह दोष है, इसलिये “मन्त्र अर्थवान् हैं”। जानते हुएकी प्रेरणाका प्रश्न भी अयुक्त है, क्योंकि लौकिक अर्थवाले शब्दोंमें भी यही स्वभाव देखा गया है। जानते हुए गुरुको अभिवादन करते हुए शिष्य अपना गोत्र कहते हैं, तथा जानते हुए वर आदिको मधुपर्क देता हुआ तीनवार “मधुपर्को मधुपर्को मधुपर्कः” ऐसा कहता है। इस तरह जैसे अर्थवान् शब्दोंमें भी विहित अर्थके प्रकाश करनेके लिये शब्द प्रयोग होता है, वैसे ही वेदमें भी “अग्नये समिध्यमानायानुब्रूहि” इत्यादि मन्त्र जानते हुए भी होता आदिके लिये कहे जाते हैं। इसलिये मन्त्र अर्थ- वान् हैं। ६—जोकि—“अदितिः सर्वम्” इसमें यह आक्षेप किया कि— विभिन्न वस्तुओंको एक वस्तुमें देखना मन्त्रोंकी अनर्थकताको सिद्ध करता है। यह भी ठीक नहीं है। क्योकि—शब्दकी प्रवृत्ति दो प्रकारकी होती है, एक मुख्यार्थ और दूसरी गौणी। इससे यह स्वारस्य निकला कि—जहां मुख्य अर्थ असम्भव हो वहां गौण अर्थ स्वीकार करना। जैसे किसीने किसीके बहुत उपकार किये हैं और वह उस उपकारीसे कहे कि—'तू ही मेरी माता और तू ही पिता है' उसी प्रकार इसको भी देखना चाहिए। जिस प्रकार लौकिक अर्थवाले शब्दोंमें भी देखा गया है कि—“जिसे पानी मिल गया उसे सभी रस प्राप्त हो गये” उसी प्रकार यहां भी अदितिकी सर्वरूपता किसी तरह कही गई है। इससे जोकि—तुमसे यह कहा कि—'मन्त्रोंमें परस्पर विरुद्ध बहुत कुछ कहा हुआ है? यह १८

-अयुक्त है, क्योंकि—मन्त्रोंमें सब उपपन्न होता है। तिससे 'मन्त्र अर्थवन् हैं' यह सिद्ध हुआ । ७—फिर यह कहा कि—मन्त्रोंमें बहुत ऐसे शब्द हैं जिनका कुछ अर्थ स्पष्ट नहीं होता, जैसे अम्यक् इत्यादि। यह भी ठीक नहीं। क्योंकि—"यह स्थाणु (खूँठ) का अपराध नहीं कि उसे अन्धा न देखे" "किन्तु वह पुरुषका अपराध है" अर्थात् पुरुषका ही वह अपराध है कि—वह नेत्ररहित है। इसी प्रकार यहां भी मन्त्रोंका कोई अपराध नहीं है, कि—आप अशिक्षित होनेसे अर्थोंको न जाने। किन्तु वह आपका अपराध है, हे सज्जन ! आप सब अपने अपराधोंको मन्त्रोंमें अथवा हमारेमें लगाना चाहते हो' वास्तवमें तुम्हें कुछ प्रज्ञा नहीं है। जिस प्रकार लौकिक शिल्पकलादिकोंमें कोई पुरुष शिक्षित होकर अन्य पुरुषोंकी अपेक्षा उन क्रियाओंमें वह विशेष हो जाता है, उसी प्रकार यहां पर भी मन्त्रार्थकी शिक्षासे कोई पुरुष अन्य पुरुषोंसे विशेष हो जाता है। ऐसी स्थितिमें कोई पुरुष स्पष्ट मन्त्रोंका भी निर्वचन नहीं कर सकते और कोई गूढ़ मन्त्रोंके भी अर्थोंको स्पष्ट करनेमें समर्थ होते हैं। यही बात "उतत्वः” (ऋ० सं० ८, २, २३, ४) इस ऋचामें कही गई है। इसी प्रकार वेद-शास्त्रके आद्यन्तके जाननेवाले ब्राह्मण जो कि— साक्षात्कृतधर्मा नहीं हैं, उनमें जो अधिक विद्वान् होता है, वही श्रेष्ठ होता है। जो ब्राह्मण मन्त्रोंके अर्थोंका विज्ञाता होता है, वही प्रशंसनीय होता है किन्तु अन्य जो मन्दबुद्धि एवम् अशिक्षित पुरुष नहीं। क्योंकि—बहुश्रुत पुरुष अनेक विषयोंवाले मन्त्रार्थमें कहीं भी रुकता नहीं, उसको कोई अर्थ भी गुप्त नहीं है। इस कारण हे कौत्स ! तुम विस्तारसे सुनो ! उससे तुम मन्त्रार्थोंको जानोगे। जैसाकि—तुमने पहिले कहा है कि—'मन्त्र अविस्पष्टार्थ हैं" वे अविस्पष्टार्थ नहीं हैं, और उनको स्पष्ट करके हम व्याख्यान

हिन्दी निरुक्त । १३३ भी करेंगे। यह संमोह तुम्हारी मतिको घुमाता है। इससे 'मन्त्र अर्थवान् हैं" यह सिद्ध हुआ । और इससे यह शास्त्र भी मन्त्रोंके अर्थ के जनानेके लिये सार्थक हो हैं, इससे शास्त्रका आरम्भ भी सिद्ध हुआ । इस कारण वहां तुमने यह कहा कि—‘यदि मन्त्रार्थ- के जाननेके लिये यह शास्त्र आरम्भ किया जाता है तो अनर्थक है' यह अयुक्त है । इस रीतिसे वादीके हेतुओंका निराकरण हो जाने पर अपने पक्षकी सिद्धिमें हेतु उठे और मन्त्रगणकी सार्थकता तथा उसके लिये इस शास्त्रको प्रयोजनवत्ता सिद्ध हुई । ॥ समाप्तः पञ्चमः पादः ॥ षष्ठः पाद । (खं० १ ) अथापि इमन्तरेण पदविभागो न विद्यते । “अवसाय पद्वते रुद्र मृल”-इति । पद्वत् अवसं गावः पथ्यदनम् । अते र्गत्यर्थस्य असौ नाम करणः । तस्मात् न अवगृह्णन्ति । “अवसायाश्वान्”- इति । स्यतिः उपसृष्टः विमोचने, तस्मात् अव- गृह्णान्ति । ‘दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम” इति । पञ्चम्यर्थ प्रेक्षा वा षष्ठ्यर्थप्रेक्षा वा, आः कारा- न्तम् । “परो निर्ऋत्या आचष्ट्व”-इति । चतुर्थ्यर्थ प्रेक्षा, ऐकारान्तम् । “परः संनिकर्षः संहिता” । पद प्रकृतिः संहिता । पद प्रकृतीनि सर्वचरणानां

१५० अ० १ पा० ६ ख० १ ।

पार्षदानि । अथापि यज्ञेदैवतेन बहवः प्रदेशा भवन्ति । तत् एतेन उपेक्षितव्यम् । ते चेद् ब्रूयु 'लिङ्गज्ञा अत्र स्मः' इति । "इन्द्रं न त्वा शवसा देवता वायुम्पृणन्ति" – इति । वायुलिङ्गञ्च इन्द्र- लिङ्गञ्च आग्नेये मन्त्रे । "अग्निरिव मन्यो त्विषितः सहस्वः"-इति । तथा अग्निर्मान्यवे मन्त्रे त्विषितः- ज्वलितः । 'त्विषिः'-इत्यपि-अस्य दीप्तिर्नाम भव- ति । अथापि ज्ञान प्रशंसा भवति, अज्ञान निन्दा च ॥ १ ॥ अनुवाद । और भी इस ( निरुक्त ) के बिना पद विभाग ( पाठ ) नहीं है, या हो सकता है । [ ज से– ] "अवसायं पद्धते रुद्र मृळः" [ ऋ० सं० ८, ८, २७, १ ] हे रुद्र ! पैरवाले अवस या अन्नके लिये सुखरूप हो । पद्धत् = पैरवाला, अवस = खाद्य, गोरूप, –जो पाथेय या पथिभोजन है । गत्यर्थक 'अव' धातुसे यह ( अवस ) नाम बनता है । इससे इसमें अवग्रह नहीं करते । "अवसायाश्वान्" [ १, ७, १८, १ ] हे इन्द्र! घोड़ोंको [ रथसे ] अलग करके । यहां 'षो' ( सा ) अन्तर्कमणि, धातु 'अव' उपसर्गके साथ विमोचन या छोड़ देने अर्थ में है । इससे यहां 'अव' और 'सा' का विभाग दिखानेके लिये अवग्रह या रुककर पाठ करते हैं । "दूतो निर्ऋत्या"... [ ऋ० सं० ८, ८, २३, १ ] हे देवगण ! निर्ऋतिका या निर्ऋति से ( कपोत ) दूत इस ( घरमें ) आया । यहां [ निर्ऋत्याः पदमें ] पञ्चमीके अर्थका ग्रहण अथवा षष्ठीके अर्थका ग्रहण होता है।

हिन्दी निरुक्त । १४१

'आः' कार अन्तम है। परा निर्ऋत्या आचक्ष्व" [ऋ० सं० ८, ८, २४, १] हे व्याधे ! तू अलग जा, निर्ऋति या मृत्युके लिये कह । यहां चतुर्थीके अर्थका ग्रहण है। [ निर्ऋत्यै ] ऐ कार अन्तमें है । वर्षोंका अत्यन्त सामीप्य संहिता होती है। पदोंकी प्रकृति या कारण संहिता है। अथवा पद रूप प्रकृतिसे संहिता (विकृति) है। सब शाखान्तरोंके प्रातिशाख्य या शिक्षा ग्रन्थ पदोंको ही संहितामें प्रकृति बताते हैं ।

और भी [प्रयोजन], यज्ञ कर्मके होते हुए देवताका लिङ्ग मन्त्रके बहुत स्थानोंमें प्रतीत होता है, जो कि इस निरुक्तसे ही निश्चय होने योग्य है। यदि वे [ याज्ञिक लोग ] कहें,-कि-हम लिङ्गके जाननेवाले हैं। [तो-] "इन्द्रं न त्वाः [ऋ० सं० ४, ५, ६, २] हे अग्ने ! तुझे देवता इन्द्रके समान और वायुके समान मानते हैं। इस अग्निके मन्त्रमें वायुका लिङ्ग और इन्द्रका लिङ्ग (बोधक) है। "अग्निरिव०" [ ऋ० सं० ८, ३, १६, २ ] हे मन्यो ! अग्निके समान दीप्तियुक्त होता हुआ सहन करनेवाला हो। वैसे ही यहां मन्युके मन्त्रमें अग्निका लिङ्ग है । 'त्विषित' नाम ज्वलितका है । 'त्विषि'- इसका भी दीप्ति नाम होता है।

और भी [निरुक्तका प्रयोजन।] वेदमैं भा ञ्ज्ञानको प्रशंसा होती है, और अञ्ज्ञानकी निन्दा ॥ १ ॥-

विशेष-मूलमें 'त्विषि रित्यप्यस्य दीप्तिर्नाम भवति' इसके स्थानमें 'त्विषि रित्यपि देप्तेर्नाम भवति' -ऐसा युक्त पाठ प्रतीत होता है। कारण 'त्विषि' यह भी दीप्तिका नाम है, यद्यपि दीप्ति नामोंमें पढा हुआ नहीं। ऐसे अथसे ही प्रकरणकी सिद्धि होती है।

अ० १ पा० ६ ख० १ । व्याख्या । शास्त्रके आरम्भके प्रयोजनका अधिकार या प्रकरण चला आता है, उसीमें दूसरा प्रयोजन यह कहा गया था कि—“इस निरुक्त शास्त्रके बिना मन्त्रोंमें अर्थका निश्चय नहीं हो सकता”। इसके विरुद्ध कौत्सने बहुत हेतुओंसे मन्त्रोंकी अनर्थकताका उपादन किया और आचार्यने उनके हेतुओंका खण्डन करके मन्त्रोंकी अर्थवत्ताका स्थापन किया। इस रीतिसे शास्त्रारम्भके प्रयोजन दिखानेका यह अभिप्राय है कि—शिष्यको बुद्धि किसो शब्दार्थके निर्णायक न्यायोंके परस्पर विरोधस्थलमें संकटमें न गिरकर सुखसे निर्णय कर ले। उसके अतिरिक्त इस शास्त्रके आरम्भका और प्रयोजन यह भी है कि—“इस शास्त्रके बिना मन्त्रोंमें पदविभागका परि ज्ञान भी नहीं हो सकता है” कि—‘इस प्रकारसे पद कहने चाहिये’ क्योंकि—अर्थके अधीन ही पद अवस्थित होते हैं। और अर्थका ज्ञान इस शास्त्रके बिना नहीं हो सकता। इससे सिद्ध हुआ कि—‘मन्त्रोंमें पदोंके विभागकी प्रसिद्धि भी इसी शास्त्रसे है’। “पदविभाग सब शाखाओंमें प्रसिद्ध है, इसलिये इसकी सत्ताको कोई किसी अवस्था में अस्वीकार नहीं कर सकता, और इसका (पदविभागका) मन्त्रोंकी अर्थवत्ताके बिना कोई प्रयोजन नहीं, तथा उस मन्त्रार्थका परिज्ञान निरुक्त शास्त्रके अधीन है, इसलिये पदविभागकी सार्थकताके लिये मन्त्र अर्थवान् हैं”—और उसके कारण निरुक्त शास्त्र अर्थवान् या सप्रयोजन है—ऐसा कोई आचार्य कहते हैं। ऐसी प्रतिज्ञा करके दिखाते हैं कि—जिन मन्त्रोंमें पदविभाग अनेक प्रकारसे हो सकता है वहां अर्थके परिज्ञान द्वारा ही पदोंके विभाग विशेषका निश्चय होता है। अर्थात् जैसा मन्त्रका उच्चारण है, वह कई प्रकारकी संधियोंसे संभव है। इसलिये वहां अर्थके

हिन्दी निरुक्तः । १४३ अतिरिक्त कोई अवलम्ब नहीं है कि—जिससे पदविभाग एक प्रकारसे स्थिर किया जाय । मयो भूर्वातो अभिवातूखा ऊर्जस्वतीरोषधी रारि शन्ताम् । पीवस्वतीर्जीवधन्यः पिबन्त्व वसाय पद्धते रुद्रमृल ॥ ( ऋ० सं० ८, ८, २७, १ ) सुचरो नाम गौतमः समयोभूरित्यृचा त्रिष्टुभः पूर्वै स्त्रिभिः पादैः गवामाशिष माशास्योत्तमे न ता सामेवच रुद्रात्सुखमयाचत । गवामुपस्थाने विनियुक्ता । ( भ० दु० ) मयोभूरिति चतुर्ऋ चमष्टादशं सूक्तं कक्षीवद् गोत्रस्य शबरस्यार्षं त्रैष्टुभं गोदेवत्यम् ।” घासाय वनंप्रतिष्ठमानागाः आदितोद्वाभ्यामभिमन्त्रणीयाः । ( सा० भा० ) आरोग्यका उत्पन्न करनेवाला पश्चिम दिशाका वायु इन गौओंके सामने चले और ये गौवें उस सुखकारी एवम् अनुद्वेग या अभय प्रद वायुके स्पर्शसे घने रसवालो ओषधियोंको चरें तथा सुख- कारी ओषधियोंका स्वाद ले लेकर अपने वाञ्छित समयमें जीवोंको प्राण देनेवाले जलको पीवें, और ओषधि सहित पान किया हुआ वह जल इन गौओंके उदरकोष्ठमें रस-शोणित-मांस-मेदा-मज्जा तथा अस्थिके रूपसे पके, एवम् ये मोटी बलवती बहुत दूधवाली हो जायें, हे रुद्र ! तुम भी इस पाद् (पैर) वाले गोरूप अवस नाम अन्नके लिये सुखरूप हो, अर्थात् इनकी हिंसा न कर ।

१४४ अ० १ पा० ६ ख० १ । दूसरा उदाहरण— "अव॑सायाश्वा॒न्" (ऋ० सं० १, ७, १८, १) एतया॑ नि॒ष्टुभा कुत्स आङ्गिरस इन्द्रं॑ तुष्टाव । कुत्स आङ्गिरस इन्द्रकी स्तुति करता है कि—हे इन्द्र ! तुम्हारे बैठनेके लिये मैंने जो यह स्थान किया है, तू उस पर आकर निश्चय ही बैठ, अर्थात् जिस प्रकार रस्सियोंसे बंधा तथा शब्द करता हुआ घोड़ा अपने स्थानमें स्थित होता है, उसी प्रकार मेरी स्तुतियोंसे हर्ष शब्दोंको करते हुए मेरे बिछाये हुए कुशरूप आसन पर तू दिन और रात्रिमें चलनेवालोंसे अधिक चलनेवाले अपने घोड़ोंको रथसे अलग कर रस्सियोंसे मुक्त कर, तथा उन्हें चारा देकर, अनन्तर स्वस्थ वा निश्चिन्त होकर बैठ। किन्तु तुम्हारे इस यजनकालमें हमारे लिये विघ्न उपस्थित न कर । उक्त दोनों ही ऋचाओंमें “अवसाय" पद आता है, किन्तु पदकार पहिली ऋचामें इसको अन्नके पर्याय अदन्त अवस नामका चतुर्थ्यन्त पद समझ कर बिना अवग्रह किये पढ़ते हैं। तथा दूसरी ऋचामें 'अव' उपसर्ग 'षो' अन्तकर्मणि धातु और 'क्त्वा' प्रत्ययका समस्त पद समझकर 'अव ३ साय' ऐसा अवग्रह पूर्वक पढ़ते हैं। भाव यह है कि-वेदके संहिता पाठके समान मन्त्रोंका एक पद पाठ भी है, जिसमें ऋषियोंने मन्त्रोंके अर्थको सुखपूर्वक जानने एवम् उसके अन्यथा न होनेके लिये आनुपूर्वीसे मन्त्रगत सब पद १—"योनिष्ट इन्द्र निषदे अकारितमा निषीद् स्वानोनावौ । विमुच्यावयोऽवसायाश्वान् दोषा वस्तोर्वहीयसः प्रपित्वे ॥" (ऋ० सं० १, ७, १८, १)

हिन्दी निरुक्त । १७५

अलग अलग पढ़े हैं । मन्त्रके स्वरूपमें जैसा संहिता पाठ प्रामाणिक है, वैसा ही पद-ज्ञानके लिये पद पाठ भी मान्य हैं । ऋषियोंने उसमें अभ्रान्तिके लिये यहां तक विशेष कर दिया है कि—जहाँ दो या बहुत पदोंका समास या अविलम्बसे उच्चारण है, उनको आधी मात्राके कालसे विलम्बित कर जिसे अवग्रह कहते हैं पढ़ा है । अर्थात् यद्यपि व्याकरणमें जहाँ 'राजपुरुषः' इत्यादि पदोंमें समास हो जाता है, वहाँ उन समस्त पदोंके उच्चारणमें परस्पर एकपदके अक्षरोंका नियम माना जाता है, जिससे कि-वह अलग अलग प्रतीत न होकर अनेक होते हुए भी एक पद प्रतीत हों, तथापि वेदार्थमें ऐसा मानने पर अनेक स्थानोंमें भ्रान्तिका अधिक संभव है, इसलिये वहां उस धर्मके असाधारण या अद्वितीय आधार स्तम्भकी रक्षाके लिये उस नियमको भङ्गकर अवग्रह अर्थात् विच्छेदपाठ स्वीकार किया है, जितनेसे कि-उन पदोंकी पृथक्ता प्रतीत हो सके, प्रयोजन यह है कि—उस पाठमें स्वतन्त्र स्वतन्त्र पद . जिस विलम्बसे पढ़े जाते हैं, उनकी अपेक्षा उनमें अल्पविलंब ही किया जाता है, उससे समासका धर्म और पदोंकी पृथक्ता दोनों ही कार्य हो जाते हैं । उसी चालके अनुसार उक्त दोनों ऋचा- ओंमें अर्थभेदके जनानेके लिये पहिले मन्त्रमें अवग्रहका अभाव और दूसरेमें अवग्रह रखा गया है, किन्तु यह अवग्रह अर्थज्ञान पूर्वक किया जा सकता है, और वह अर्थज्ञान एकमात्र निरुक्त शास्त्रके अधीन है, इसलिये निरुक्त शास्त्रके बिना पदपाठ भी सिद्ध नहीं होता, अतः निरुक्त शास्त्रका यह तृतीय प्रयोजन है, जो कि इससे वेदका पदपाठ सिद्ध होता है । पहिले मन्त्रमें 'अवसाय' पदका 'अन्नके लिये'—यह अर्थ होता है, और दूसरेमें 'छुड़ा करके' या 'अलग करके' अर्थ होता है ।

१४६ अ० १ पा० ६ ख० १. यद्यपि उक्त उदाहरणमें अवग्रहको लेकर जो फल दिखाया है, वह निरुक्तका ही है, तथापि वह पदके अभ्यन्तरके सम्बन्धको लेकर ही है, पदविभागमें कोई विशेष नहीं आया, जिससे कि— प्रतिज्ञाके अनुसार निरुक्तका प्रयोजन पदविभाग समझा जाता, इसलिये अब ऐसा उदाहरण देते हैं जिनमें दो पदोंके मध्यमें सन्धिमात्रसे विशेष होता है और वह निरुक्त शास्त्रका व्युत्पत्तिसे ही प्रतीत होता है। जैसे कि = “दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम” (ऋ० सं० ८, ८, २३, १) “परो निर्ऋत्या आचक्ष्व” (ऋ० सं० ८, ८, २२, १) प्रथम उदाहरणमें ‘निर्ऋत्याः+इदम्’ तथा ‘निर्ऋत्यै+इदम्’ इस प्रकारसे दो तरह पदविभाग हो सकता है, क्योंकि—प्रथम स्थानमें रुत्व-यत्व और यलोप होनेसे, और दूसरे स्थानमें ‘आय् आदेश और यलोप होनेसे “निर्ऋत्या इदमाजगाम” ऐसा यथोक्त वाक्य बन जाता है किन्तु एक पक्षका स्थिर करना अर्थापेक्ष होनेसे निरुक्तके अधीन है, जिससे प्रतीत होगा कि यह पञ्चमी या षष्ठी विभक्ति है चतुर्थी नहीं। इस मन्त्रका कपोतशान्तिके लिये कपोत पद हरणमें विनियोग है। इसमें देवताओंसे प्रार्थना की गई है कि—हे देवगण ! निर्ऋति (मृत्यु) के निजका दूत यह कबूतर हमारे घरमें आकर बैठा है, जो कि-हमारे पूर्वजन्मके किये हुए पाप कर्मके विपाकको अपने घुंसले या दीवारों पर पदचिन्होंसे सूचित करता है, आप उसके दूर करनेमें समर्थ हैं, इसीसे हम तुम्हारी पूजा करते हैं। इसके अतिरिक्त इस अपशकुनकी शान्तिके लिये हम निष्कृति या शान्ति भी करेंगे। इसलिये हम कहते हैं कि - तुम्हारे प्रसाद और हमारे तपसे हमारे मनुष्यों और पशुओंम कल्याण रहे।