निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १३१
कि—'विशेष हेतु नहीं है' तो शब्दोंकी समानतासे मन्त्र अर्थवान् हीं हैं । २—कौत्सने कहा है कि—"लोकमें शब्दोंको अनियमसे प्रयोग करनेके कारण शब्द अर्थवान् हैं" और वेदमें शब्दोंके प्रयोगके नियम होनेके कारण मन्त्र अनर्थक हैं"—यह अयुक्त है । क्योंकि—लोकमें 'जो दो शब्द हैं' उनके पौर्वापर्यका परिवर्त्तन नहीं हो सकता । ३—ब्राह्मण ग्रन्थ भी स्पष्ट रूपसे मन्त्रोंकी अर्थवत्ताको कह रहा है कि— “एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं यद्रूपसमृद्धं यत्कर्मक्रिय- माणमृग्यजुर्वाऽभिवदति” इति च । [ब्राह्मणम्] 'यह यज्ञकर्मका समृद्ध है, वह क्या ? जो रूप समृद्ध या मन्त्रलिङ्गोंसे कहा गया हों, अर्थात् किये जाते हुए कर्मको ऋचा अथवा यजू रूप मन्त्र अनुवाद करता हो । अब देखें कि—यदि मन्त्र अनर्थक हैं, तो कैसे कर्मको अनु- वाद करेंगे ? यदि अनुवाद नहीं करते तो कर्मका समर्थन कैसे करेंगे ? सर्वथा इस ब्राह्मण वाक्यसे मन्त्रोंकी अर्थवत्ता स्पष्ट उक्त होती है । ब्राह्मणको अनर्थकता स्वीकार करके तुम इस प्रमाणको निष्फल कर सकते हो, किन्तु तुम्हारा यह साध्य नहीं, क्योंकि—तुम पहिले ही ब्राह्मणको “ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना विधीयन्ते” इस वाक्यसे अर्थवान् स्वीकार कर चुके हो । इससे यह दिखाया जा चुका कि—मन्त्र अर्थवान् हैं । “इहैव स्त॑ मा वियौष्टं॒ विश्वमायु॒र्व्यश्नुतस् । क्रीळ॑न्तौ पु॒त्रैर्नप्तृ॑भि॒र्मोद॑मानौ स्वे गृ॒हे”