भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 129

१३० अ० १ पा० ४ ख० १ । "अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्ष म दिति र्माता स पिता स पुत्रः । विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदिति जातमदितिर्जनित्वम् ॥ (ऋ० सं० १, ६, १६, ५) इस मन्त्रमें 'जो ही अदिति द्युलोक (३ द्युलोक) है वही मध्यम लोक (अन्तरिक्ष) है। एवम् वही माता, पिता, तथा पुत्र है।' ऐसी ऐसी बहुत बातें परस्पर विरुद्ध कही हुई हैं, यदि ऐसे मन्त्रोंको अर्थवान् जाना जावे तो उनका उपपादन करना अशक्य हो जायगा, इसलिये उनका अनर्थक मानना ही ठीक है। ७—इस लिये भी मन्त्र अनर्थक कहे जा सकते हैं, कि—उनमें ऐसे शब्द भी आते हैं, कि—जिनका स्पष्ट रीतिसे कोई अर्थ ही प्रतीत नहीं होता। जैसे—"अम्यक्, यादृश्मिन्, जारयायि, काणुका" इत्यादि। क्योंकि—मन्त्रोंमें इनका कुछ स्पष्ट अर्थ जाना नहीं जा सकता। ऐसी कल्पना भी नहीं हो सकती कि— “मन्त्रोंमें कुछ शब्द अनर्थक हैं, और कुछ अर्थवान्”। क्योंकि— इसमे अर्द्धावशेष रह जायगा, इस लिये सारे ही अनर्थक हैं यह मानना अच्छा है। परिसमाप्तः पूर्वपक्षः । मन्त्रोंकी सार्थकताकी स्थापना । १—यास्क—"मन्त्र अर्थवान् ही हैं" किन्तु कौत्सके कथना- नुसार अनर्थक नहीं। क्योंकि—लोक और वेदमें समान ही शब्द हैं, अर्थात् जो 'गो' शब्द लोकमें स्वर-संस्कार युक्त है, वही मन्त्रोंमे भी है, ऐसी अवस्था में 'वही शब्द लोकमें अर्थवान् रहे और मन्त्रोंमें अनर्थक'—इसमें कोई विशेष हेतु नही है। जब

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