भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 144

हिन्दी निरुक्त । १७५

अलग अलग पढ़े हैं । मन्त्रके स्वरूपमें जैसा संहिता पाठ प्रामाणिक है, वैसा ही पद-ज्ञानके लिये पद पाठ भी मान्य हैं । ऋषियोंने उसमें अभ्रान्तिके लिये यहां तक विशेष कर दिया है कि—जहाँ दो या बहुत पदोंका समास या अविलम्बसे उच्चारण है, उनको आधी मात्राके कालसे विलम्बित कर जिसे अवग्रह कहते हैं पढ़ा है । अर्थात् यद्यपि व्याकरणमें जहाँ 'राजपुरुषः' इत्यादि पदोंमें समास हो जाता है, वहाँ उन समस्त पदोंके उच्चारणमें परस्पर एकपदके अक्षरोंका नियम माना जाता है, जिससे कि-वह अलग अलग प्रतीत न होकर अनेक होते हुए भी एक पद प्रतीत हों, तथापि वेदार्थमें ऐसा मानने पर अनेक स्थानोंमें भ्रान्तिका अधिक संभव है, इसलिये वहां उस धर्मके असाधारण या अद्वितीय आधार स्तम्भकी रक्षाके लिये उस नियमको भङ्गकर अवग्रह अर्थात् विच्छेदपाठ स्वीकार किया है, जितनेसे कि-उन पदोंकी पृथक्ता प्रतीत हो सके, प्रयोजन यह है कि—उस पाठमें स्वतन्त्र स्वतन्त्र पद . जिस विलम्बसे पढ़े जाते हैं, उनकी अपेक्षा उनमें अल्पविलंब ही किया जाता है, उससे समासका धर्म और पदोंकी पृथक्ता दोनों ही कार्य हो जाते हैं । उसी चालके अनुसार उक्त दोनों ऋचा- ओंमें अर्थभेदके जनानेके लिये पहिले मन्त्रमें अवग्रहका अभाव और दूसरेमें अवग्रह रखा गया है, किन्तु यह अवग्रह अर्थज्ञान पूर्वक किया जा सकता है, और वह अर्थज्ञान एकमात्र निरुक्त शास्त्रके अधीन है, इसलिये निरुक्त शास्त्रके बिना पदपाठ भी सिद्ध नहीं होता, अतः निरुक्त शास्त्रका यह तृतीय प्रयोजन है, जो कि इससे वेदका पदपाठ सिद्ध होता है । पहिले मन्त्रमें 'अवसाय' पदका 'अन्नके लिये'—यह अर्थ होता है, और दूसरेमें 'छुड़ा करके' या 'अलग करके' अर्थ होता है ।