निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ अ० १ पा० ६ ख० १. यद्यपि उक्त उदाहरणमें अवग्रहको लेकर जो फल दिखाया है, वह निरुक्तका ही है, तथापि वह पदके अभ्यन्तरके सम्बन्धको लेकर ही है, पदविभागमें कोई विशेष नहीं आया, जिससे कि— प्रतिज्ञाके अनुसार निरुक्तका प्रयोजन पदविभाग समझा जाता, इसलिये अब ऐसा उदाहरण देते हैं जिनमें दो पदोंके मध्यमें सन्धिमात्रसे विशेष होता है और वह निरुक्त शास्त्रका व्युत्पत्तिसे ही प्रतीत होता है। जैसे कि = “दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम” (ऋ० सं० ८, ८, २३, १) “परो निर्ऋत्या आचक्ष्व” (ऋ० सं० ८, ८, २२, १) प्रथम उदाहरणमें ‘निर्ऋत्याः+इदम्’ तथा ‘निर्ऋत्यै+इदम्’ इस प्रकारसे दो तरह पदविभाग हो सकता है, क्योंकि—प्रथम स्थानमें रुत्व-यत्व और यलोप होनेसे, और दूसरे स्थानमें ‘आय् आदेश और यलोप होनेसे “निर्ऋत्या इदमाजगाम” ऐसा यथोक्त वाक्य बन जाता है किन्तु एक पक्षका स्थिर करना अर्थापेक्ष होनेसे निरुक्तके अधीन है, जिससे प्रतीत होगा कि यह पञ्चमी या षष्ठी विभक्ति है चतुर्थी नहीं। इस मन्त्रका कपोतशान्तिके लिये कपोत पद हरणमें विनियोग है। इसमें देवताओंसे प्रार्थना की गई है कि—हे देवगण ! निर्ऋति (मृत्यु) के निजका दूत यह कबूतर हमारे घरमें आकर बैठा है, जो कि-हमारे पूर्वजन्मके किये हुए पाप कर्मके विपाकको अपने घुंसले या दीवारों पर पदचिन्होंसे सूचित करता है, आप उसके दूर करनेमें समर्थ हैं, इसीसे हम तुम्हारी पूजा करते हैं। इसके अतिरिक्त इस अपशकुनकी शान्तिके लिये हम निष्कृति या शान्ति भी करेंगे। इसलिये हम कहते हैं कि - तुम्हारे प्रसाद और हमारे तपसे हमारे मनुष्यों और पशुओंम कल्याण रहे।