भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 146

हिन्दी निरुक्त । १४७ इसी प्रकार दूसरे उदाहरणमें भी “निर्ऋत्यै+आवक्ष्व” तथा निर्ऋत्याः+आवक्ष्व” इन दोनों विभागोंसे ही सन्धिके नियमोंसे “निर्ऋत्या आवक्ष्व” यह यथोक्त वाक्य सिद्ध हो जाता है, किन्तु निरुक्त शास्त्रकी रीतिसे निर्णय हो जाता है कि—प्रथम पदविभाग ही ठीक है दूसरा नहीं। यह दूसरा मन्त्र दुःस्वप्नकी शान्तिके लिये पढ़ा जाता है। इसमें कहा गया है कि— हे मनसस्पते ! मृत्यो ! या व्याधे ! तू हमसे अलग हो जा । और अलग होकर भी, हमारे पास ही मत ठहर, किन्तु दूर जाकर रह । तथा दूर जाकर भी ऐसा दूर रह कि—फिर हमारी ओर तेरा आना न हो । और यह कि—यहांसे दूर होकर जिसका तू दूत है, उस निर्ऋतिसे बहुत प्रकारसे कह दे कि—“वह मुमूर्षु या मरनेवाला नहीं है ।” क्योंकि—मेरा मन जीते हुएके समान स्वच्छ है। मेरी सब इन्द्रियां सूर्यनारायणके प्रकाशमें यथार्थ ज्ञानको उत्पन्न करती हैं, जिस पुरुषका मृत्यु निकट आ जाता है, उसका अनुभव प्रकाशमें भी ठीक नहीं होता, जो कुछ देखता है, अन्यथा अन्यथा ही देखता है। संहिता और पद । स्वर तथा उनके सहारे पर लगे हुए व्यञ्जनोंका १ जो परस्पर अत्यन्त सामीप्य उसको संहिता १ कहते हैं। इस संहिता और नाम-आख्यात आदि रूप पदोंके सम्बन्धमें दो मत हैं, कोई कहते हैं कि—संहितासे पद होते हैं, और कोई कहते हैं कि—पदोंसे संहिता बनती है। पहिले मतमें संहिता प्रकृति (कारण) और पद विकृति (विकार या कार्य) हैं। एवम् दूसरे मतमें पद प्रकृति और संहिता विकृति है। १—परः संनिकर्षः संहिता। (पा० १. ४. १०९)