निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १४६ प्रधानताका निर्णय करके,उसी उसी देवताके कर्ममें उस उस मन्त्रके विनियोगका निर्धार करना । यद्यपि पूर्वमीमांसा दर्शनके ३ य अध्यायके द्वितीय पादमें मन्त्रोंके विनियोगोंका निर्णय किया है, जैसे कि—७वें अधि- करणमे' "इन्द्राग्नी रोचन" इत्यादि याज्या-अनुवाक्या नामक मन्त्र काम्य ऐन्द्राग्न इष्टिमें ही विनियुक्त होते हैं, किन्तु—नित्यमे नहीं । तथा ८ वें अधिकरणमें "आग्नेय्याऽग्नीध्रमुपतिष्ठते" "ऐन्द्र्या सदः" "वैष्णव्या हविर्धानम्" इन विधियोंमें बताया है, कि--'ज्योतिष्टोम यज्ञमे आग्नेयी ( अग्नि देवताकी ) ऋचासे आग्नीध्र नामक मण्डपका उपस्थान करना। एवम् ऐन्द्री ( इन्द्र देवताकी ) ऋचासे सदस् नाम मण्डपका तथा वैष्णवी (विष्णु, देवताको ) ऋचासे हविर्धान नाम मण्डपका उपस्थान करना।' यहां ज्योतिष्टोमके मन्त्रकाण्डोय तथा कर्मकाण्डोय प्रकरणमें जो जो अग्न्यादि देवताओंकी ऋचा पढ़ी हुई हैं, वे ही ऋचा उस उस मण्डपके उपस्थानमे' विनियुक्त होती हैं, किन्तु समस्त ऋग्वेदमें जितनी इन देवताओंकी ऋचा हैं, वे नहीं। इत्यादि रूपसे मन्त्रोंके अर्थाभिधान सामर्थ्य रूप लिङ्ग, समाख्या तथा प्रकरण आदि प्रमाणों के द्वारा मन्त्रोंके विनियोगोंका निर्णय किया है, तथापि "इन्द्रं नत्वा शवसा देवता वायु' पृणन्ति" (ऋ० सं० ४, ५, ६, २,) इस आग्नेय ( अग्नि देवताके ) मन्त्रमें मीमांसक निर्णय नहीं कर सकते कि—'अग्नि देवताका है, तो इन्द्र और वायुका क्यों नहीं ? क्योंकि—इन्द्र और वायु देवताके भी नाम इस मन्त्रमें हैं। उनके दर्शनमे बहु देवताओंके संकरस्थलमें निर्णयका उपाय नहीं है और निरुक्त शास्त्रमे' यह निर्णय किया है कि—'यहां कौनसा देवताका नाम प्रधान है और कौनसा गौण ।' यदि याज्ञिक या मीमांसक लोग निरुक्त शास्त्रकी उपेक्षा करके