निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० अ० १ पा० ६ ख० १ । बलपूर्वक लिङ्गके सहारे पर मंत्रों का विनियोग करें, तो एक मन्त्रमे' आनेवाले अनेक देवताओं के नामो'के गुण-प्रधान भावको न जाननेसे, वे अन्य देवताके 'मन्त्रको अन्य देवताके कर्ममें लगा दे'गे, जिससे कि विधि विरुद्ध करनेसे कर्मकी समृद्धि न होगी, इतना ही नहीं बल्कि—दुष्ट यज्ञसे यजमानकी हानि भी होगी। इसलिये निरुक्त शास्त्र सर्वथा जानने योग्य है। इस प्रकार देवताके परिज्ञान द्वारा पुरुषके प्रति निरुक्त शास्त्र विशिष्ट उपकारका करनेवाला है, इसीसे यह आरम्भ करने योग्य है। “त्वां हि मन्द्रतम मर्कशोकैर्ववृमहे महिनः श्रोष्यग्ने । इन्द्रं नत्वा शवसा देवता वायुं पृक्षन्ति राधसानृतमाः ॥” ऋ० सं० ४, ५, ६. २) भारद्वाजस्यार्षम् । आग्नेयी। प्रातरनुवाकाश्वि- नयोर्विनियोगः । हे अग्ने ! सब देवताओंमें अधिक कोमल हृदयवाले तुम्हीं हो, इस कारण हम ब्रह्मचर्य व्रतपूर्वक अध्ययन किए हुए वीर्ययुक्त मंत्रों के द्वारा तुम्हारा ही सेवन करते हैं। तुम हमारे मन्त्रों से किये हुए स्तोत्रको सुनो। तुम केवल हमारे ही पूज्य नहीं हो, अपितु देवता और लोकमें जो धन-बलसे सम्पन्न प्रतिष्ठित मनुष्य हैं, वे सभी इन्द्र तथा वायुके समान तुम्हारी ही पूजा करते हैं। इस प्रकार यह मन्त्र आग्नेय है, लिङ्गमात्रके दर्शनसे प्रधान देवताके जाने बिना इन्द्र या वायु देवताके कर्ममें विनियुक्त होकर यह मन्त्र कर्त्ताके वांछितको पूर्ण करनेके लिये समर्थ न होगा और कर्मके विगुण होनेके कारण प्रत्युत कर्त्ताका अपध्वंस करेगा। इसलिये मन्त्र देवताके निश्चय ज्ञानके लिये निरुक्त ज्ञातव्य है।