निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १४१
'आः' कार अन्तम है। परा निर्ऋत्या आचक्ष्व" [ऋ० सं० ८, ८, २४, १] हे व्याधे ! तू अलग जा, निर्ऋति या मृत्युके लिये कह । यहां चतुर्थीके अर्थका ग्रहण है। [ निर्ऋत्यै ] ऐ कार अन्तमें है । वर्षोंका अत्यन्त सामीप्य संहिता होती है। पदोंकी प्रकृति या कारण संहिता है। अथवा पद रूप प्रकृतिसे संहिता (विकृति) है। सब शाखान्तरोंके प्रातिशाख्य या शिक्षा ग्रन्थ पदोंको ही संहितामें प्रकृति बताते हैं ।
और भी [प्रयोजन], यज्ञ कर्मके होते हुए देवताका लिङ्ग मन्त्रके बहुत स्थानोंमें प्रतीत होता है, जो कि इस निरुक्तसे ही निश्चय होने योग्य है। यदि वे [ याज्ञिक लोग ] कहें,-कि-हम लिङ्गके जाननेवाले हैं। [तो-] "इन्द्रं न त्वाः [ऋ० सं० ४, ५, ६, २] हे अग्ने ! तुझे देवता इन्द्रके समान और वायुके समान मानते हैं। इस अग्निके मन्त्रमें वायुका लिङ्ग और इन्द्रका लिङ्ग (बोधक) है। "अग्निरिव०" [ ऋ० सं० ८, ३, १६, २ ] हे मन्यो ! अग्निके समान दीप्तियुक्त होता हुआ सहन करनेवाला हो। वैसे ही यहां मन्युके मन्त्रमें अग्निका लिङ्ग है । 'त्विषित' नाम ज्वलितका है । 'त्विषि'- इसका भी दीप्ति नाम होता है।
और भी [निरुक्तका प्रयोजन।] वेदमैं भा ञ्ज्ञानको प्रशंसा होती है, और अञ्ज्ञानकी निन्दा ॥ १ ॥-
विशेष-मूलमें 'त्विषि रित्यप्यस्य दीप्तिर्नाम भवति' इसके स्थानमें 'त्विषि रित्यपि देप्तेर्नाम भवति' -ऐसा युक्त पाठ प्रतीत होता है। कारण 'त्विषि' यह भी दीप्तिका नाम है, यद्यपि दीप्ति नामोंमें पढा हुआ नहीं। ऐसे अथसे ही प्रकरणकी सिद्धि होती है।