भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 139

१५० अ० १ पा० ६ ख० १ ।

पार्षदानि । अथापि यज्ञेदैवतेन बहवः प्रदेशा भवन्ति । तत् एतेन उपेक्षितव्यम् । ते चेद् ब्रूयु 'लिङ्गज्ञा अत्र स्मः' इति । "इन्द्रं न त्वा शवसा देवता वायुम्पृणन्ति" – इति । वायुलिङ्गञ्च इन्द्र- लिङ्गञ्च आग्नेये मन्त्रे । "अग्निरिव मन्यो त्विषितः सहस्वः"-इति । तथा अग्निर्मान्यवे मन्त्रे त्विषितः- ज्वलितः । 'त्विषिः'-इत्यपि-अस्य दीप्तिर्नाम भव- ति । अथापि ज्ञान प्रशंसा भवति, अज्ञान निन्दा च ॥ १ ॥ अनुवाद । और भी इस ( निरुक्त ) के बिना पद विभाग ( पाठ ) नहीं है, या हो सकता है । [ ज से– ] "अवसायं पद्धते रुद्र मृळः" [ ऋ० सं० ८, ८, २७, १ ] हे रुद्र ! पैरवाले अवस या अन्नके लिये सुखरूप हो । पद्धत् = पैरवाला, अवस = खाद्य, गोरूप, –जो पाथेय या पथिभोजन है । गत्यर्थक 'अव' धातुसे यह ( अवस ) नाम बनता है । इससे इसमें अवग्रह नहीं करते । "अवसायाश्वान्" [ १, ७, १८, १ ] हे इन्द्र! घोड़ोंको [ रथसे ] अलग करके । यहां 'षो' ( सा ) अन्तर्कमणि, धातु 'अव' उपसर्गके साथ विमोचन या छोड़ देने अर्थ में है । इससे यहां 'अव' और 'सा' का विभाग दिखानेके लिये अवग्रह या रुककर पाठ करते हैं । "दूतो निर्ऋत्या"... [ ऋ० सं० ८, ८, २३, १ ] हे देवगण ! निर्ऋतिका या निर्ऋति से ( कपोत ) दूत इस ( घरमें ) आया । यहां [ निर्ऋत्याः पदमें ] पञ्चमीके अर्थका ग्रहण अथवा षष्ठीके अर्थका ग्रहण होता है।