भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

हिन्दी निरुक्त । १३३ भी करेंगे। यह संमोह तुम्हारी मतिको घुमाता है। इससे 'मन्त्र अर्थवान् हैं" यह सिद्ध हुआ । और इससे यह शास्त्र भी मन्त्रोंके अर्थ के जनानेके लिये सार्थक हो हैं, इससे शास्त्रका आरम्भ भी सिद्ध हुआ । इस कारण वहां तुमने यह कहा कि—‘यदि मन्त्रार्थ- के जाननेके लिये यह शास्त्र आरम्भ किया जाता है तो अनर्थक है' यह अयुक्त है । इस रीतिसे वादीके हेतुओंका निराकरण हो जाने पर अपने पक्षकी सिद्धिमें हेतु उठे और मन्त्रगणकी सार्थकता तथा उसके लिये इस शास्त्रको प्रयोजनवत्ता सिद्ध हुई । ॥ समाप्तः पञ्चमः पादः ॥ षष्ठः पाद । (खं० १ ) अथापि इमन्तरेण पदविभागो न विद्यते । “अवसाय पद्वते रुद्र मृल”-इति । पद्वत् अवसं गावः पथ्यदनम् । अते र्गत्यर्थस्य असौ नाम करणः । तस्मात् न अवगृह्णन्ति । “अवसायाश्वान्”- इति । स्यतिः उपसृष्टः विमोचने, तस्मात् अव- गृह्णान्ति । ‘दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम” इति । पञ्चम्यर्थ प्रेक्षा वा षष्ठ्यर्थप्रेक्षा वा, आः कारा- न्तम् । “परो निर्ऋत्या आचष्ट्व”-इति । चतुर्थ्यर्थ प्रेक्षा, ऐकारान्तम् । “परः संनिकर्षः संहिता” । पद प्रकृतिः संहिता । पद प्रकृतीनि सर्वचरणानां