भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

३२८ अ० १ पा० ५ ख० १ ।

  • अर्थ हैं, वे किसी युक्तिसे संगत नहीं होते। अर्थात् मन्त्रोंमे जैसा अर्थ लब्ध होता है कि- यह इनमें अर्थ होगा, वह घटता नहीं। जैसे- “ओषधेत्रायस्व” ( य० वा० सं० ४, १, ६, १५) 'हे ओषधे तू इस यजमानकी रक्षा कर।' अग्निष्टोम यज्ञमें यजमानके क्षौर कर्मके आरम्भमें उसके शिरपर कुशका अङ्कुर या पत्ता लगाया जाता है कि पहिले छुरा शिरपर न टिककर उसी पर टिके, उस तृणके धरनेका यह मन्त्र है। किन्तु इस मन्त्रके अर्थको स्वीकार करें तो यह प्रश्न होगा कि-जब ओषधि अपनी ही रक्षा नहीं कर सकती तो यजमानकी क्या करेगी ?” तथा दूसरा मन्त्र छुरेके चलानेके लिये हैं- “स्वधिते मैन≍हि≍सीः” ( य० वा० सं० ४, १-६, १५) इसका अर्थ है-हे क्षुर ! पैनीधारवाले ! तू इस यजमान की हिंसा न करना। अब देखते हैं, तो-जो छुरेसे स्वयम् यजमान के बालोंको काट रहा है, वही छुरेसे न काटनेको प्रार्थना कर रहा है। कौन ऐसा है जो ऐसा कह कर, ऐसा करेगा ? लोकमें जितने ऐसे वाक्य होते हैं, वे सब उन्मत्त लोगोंके जैसे अनर्थक ही माने जाते हैं। इस लिये ये मन्त्र वाक्य भी अनर्थक ही हैं। ४-मन्त्रोंकी अनर्थकतामें और हेतु यह है कि-एक मन्त्रके अर्थको दूसरे मन्त्रका अर्थ निषेध करता या मिथ्या ठहराता है। जैसे कि- “एक एव रुद्रोऽवतस्थे न द्वितीयः” “असं- ख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा अधिभूम्याम् ( य० वा० सं० १६, ५४) “अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे” (ऋ० सं० ८, ७, २१, २) “शतं सेना अजयत्साकमिन्द्रः” (ऋ०