निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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- हिन्दी निरुक्त ( ४८६ ) १२ अ० २ पा० २ खं० आदित्यके उदय में अन्तर्धान हो जाती है।" [यह भाष्यकार ने संक्षिप्त व्याख्यान किया है । ॥ ११ ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते द्वादशाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥१२,१॥ द्वितीयः पादः । (खं० १) निघ०-सविता ॥७॥ भगः ॥८॥ सूर्यः ॥९॥ पूषा ॥१०॥ विष्णुः ॥११॥ निरु०-‘सविता’ व्याख्यातः, तस्य कालो-यदा द्यौः आहततमस्का कीर्णरश्मिर्भवति । तस्य एषा भवति-॥ १ (१२) ॥ अर्थः- ‘सविता’ (७) व्याख्यान किया गया (अभिधान या निर्वचन से) [ १०, ३, ९ ] उसका काल-जब द्यौ अन्ध- कार रहित फैली हुई किरणों वाली होती है-जिस काल में आकाश देश में ही प्रकाश होता है, किन्तु पृथिवी में नहीं अर्थात्- उदय होते हुए सूर्य की किरणें पहिले आकाश में जाती हैं, इससे वहीं प्रकाश रहता है और पृथिवी में अंधेरा ही रहता है, वह सविता का काल है, उस काल में आदित्य सविता कहा जाता है । “तस्य०” उस सविता की यह ऋचा है-॥१(१२)॥ ( खं० २ ) निरु०-“विश्वारूपाणि प्रतिमुञ्चते कविः प्रासा- वीद्भद्रं द्विपदे चतुष्पदे । विनाकमख्यत् सविता