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भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1267, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1267

| हिन्दी निरुक्त (५०६) १२ अ० ३ पा० ३ खं० 'भुरण्युः' इति क्षिप्रनाम । भुरण्युः शकुनिः । भूरिम् अध्वानं नयति स्वर्गस्य लोकस्यापि वोढा तत्सम्पाती भुरण्युः अनेन पावक ! ख्यानेन । भुरण्यन्तं जनाँ अनु । त्वं वरुण पश्यसि । तत्ते वयं स्तुमः इति वाक्यशेषः । अपिवा उत्तरस्याम् ॥ ३ (२२) ॥ अर्थ:-"येना पावक चक्षसा०" ये सब ऋचाएं प्रस्कण्व ऋषि की हैं और अश्विनों के शस्त्र में इनका विनि- योग है। हे 'पावक '! 'वरुण '! 'येन' जिस 'चक्षसा' (ख्यानेन) दृष्टि (दर्शन) से 'जनान्-अनु' (पूर्वान् पुण्यकृतः जनान् अनु) पूर्व पुण्यवानों के पीछे 'भुरण्यन्तम्' जल्दी २ देवमार्ग से स्वर्ग को जाते हुए अग्नि को आधान करने वाले जन को 'त्वं' तू 'पश्यसि' देखता है (तत् ते वयं स्तुम) उस तेरे दर्शन (देखने) को हम स्तुति करते हैं। यह वाक्यशेष है- भाष्यकार ने "येन" पद के जोड़ के लिये या उसकी अपेक्षा को पूर्ण करने के लिये "तत् ते वयं स्तुमः" यह "तत्" पद वाला वाक्य अध्याहार किया है। इस प्रकार जहां मन्त्रों मे अधूरा वाक्य रह जाये, वहां उस २ मन्त्रार्थ के अनुकूल अध्याहार कर लेना चाहिये, यह भाष्यकार ने दिखाया है। "भुरण्युः०" 'भुरण्यु' यह शीघ्र का नाम है। 'भुरण्यु' शकुनि = पक्षी होता है। क्यों ? "भूरिम् अध्वानं नयति"