सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1268, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1268

बहुत मार्ग को लेजाता है चला जाता है । ‘स्वर्गस्य लोक- स्यापि वोढा’ तथा स्वर्ग लोक को लेजाने वाला अग्नि भी ‘भुरण्यु’ है! “स्वर्गाय लोकाय अग्निश्चीयते” ‘स्वर्ग लोक के लिये अग्नि चयन (स्थापन) किया जाता है’- यह श्रुति है। ‘तत्संपाती’ उसके साथ जाने वाला - अग्नि को चयन करने वाला अग्नि से युक्त जन कर्म के अनुष्ठान से उत्पन्न हुए अदृष्ट को लेकर स्वर्ग लोक के प्रति जाता है, वह “भुरण्यति” (शीघ्र जाता है) कहा जाता है, उसी “भुरण्यति” पद से ‘भुरण्यत्’ शब्द बनता है, जिस का रूप मन्त्र में ‘भुरण्यन्तम्’ है । सुतराम् यह ‘भुरण्यत्’ शब्द ‘भुरण्यु’ शब्द से नामधातु के संस्कार द्वारा बना है ॥ “अपिवा०” ऐसा भी है, जैसा कि—यह कहा गया, और ऐसा भी दूसरे प्रकार से [व्याख्यान] है, जैसा कि— उत्तरा = अगली ऋचामें इस पूर्व ऋचा को मिला देने से होता है-॥ ३ [ २२ ] ॥ ( सं० ४ ) निरु०-“येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु त्व वरुण पश्यसि ॥ विद्यामेषि रजस्पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः । पश्यञ्जन्मानि सूर्य ॥” व्येषि द्यां रजश्च पृथु महान्तं लोकम् अहानि च मिमानः अक्तुभिः रात्रिभिः सह पश्यन् जन्मानि जातानि सूर्य ! ।

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य) · पृष्ठ 1268, कुल 1282 में से · BharatKosha