निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५०९ ) १२ अ० ३पा० ६खं० प्रत्यङ् इदं सर्वम् उदेषि, प्रत्यङ् इदं सर्वम् इदम् अभिविपश्यसि-इति । अपिवा एतस्यामेव ॥ ५ (२४) ॥ अर्थः- हे वरुण ! पावक! जिस ख्याति या प्रज्ञा से या जिस अनुग्रह बुद्धिसे सुकृती जनों के पीछे जाते'हुये अग्नि- मान् जन को देखता है, उसी ख्याति या बुद्धि से "प्रत्यङ् देवानां विशः" देवताओं के निवासों को प्रत्यङ् = अभि- मुख या संमुख करके 'उदेषि' तू उदय होता है "प्रत्यङ् उदेषि मानुषान्" मनुष्यों के सामने करके उदय होता है "प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे" हे स्वः ! आदित्य ! ( प्रत्यङ् इदंसर्वम् उदेषि ) इस सब जगत् को सामने करके तू उदय होता है [प्रत्यङ् इदं सर्वम् अभिविपश्यसि] इस सब जगत् को तू अभिमुख देखता है ॥ "अपिवा०" अथवा यदि पूर्व ऋचा में भी एक वाक्यता न हो, और उत्तर ऋचा में भी एक वाक्यता न हो, तो भी इसी प्रस्तुत ऋचा में व्याख्यान होसकता है ॥५ (२४)॥ (खं० ६ ) निरु०- "येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु त्वं वरुण पश्यसि ॥" तेन नो जनान् अभिविपश्यसि ॥ 'केशी' केशाः रश्मयः, तैः तद्वान् भवति । काशनाद् वा । प्रकाशनाद् वा ।