निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें• हिन्दी निरुक्त ( ४१० ) १२ अ० ३ पा० ६ खं० तस्य एषा भवति ॥६ (२५) ॥ अर्थः— "येना पावक०" हे पावक ! वरुण जिसबुद्धि से सुकृती या पुण्यात्मा जनों के पीछे चलने वाले सुकृती को देखता है, उसी बुद्धि से हम लोगों को भी देखता है ॥ प्रथम व्याख्यान में भी अध्याहार किया था 'तत् ते वयं स्तुमः" उस तेरे ख्यान = दर्शन को हम स्तुति करते हैं) और इस चौथे व्याख्यानमें भी अध्याहार ही किया है— “तेन नो जनान् अभिविपश्यसि” [उस ख्यान से तू हम लोगों को देखता है], इनमें पहिले की अपेक्षा इस दूसरे अध्याहार में क्या विशेष है ? प्रथम अध्याहार में “तत् ते वयं स्तुमः” इस प्रकार स्तुति से मन्त्रार्थ पूर्ण किया है और इसमें “तेन नो जनान् अभिविपश्यसि” [उससे तू हम लोगों को देखता है या देख] इस प्रकार आशिषा ( प्रार्थना ) से पूरा किया है। यह दोनों अध्याहारों में भेद है क्यों कि—मन्त्रों में स्तुति और प्रार्थना का नित्य सम्बन्ध है, यह सप्तमाध्याय में विस्तार से निरूपण किया है। इस लिये दोनों अध्याहारों से ही मन्त्रार्थ की पूर्ति हो सकती है, तथा पूर्व उत्तर मन्त्रों में भी जोड़ने से पूर्ति हो सकती है । यह साकाङ्क्ष्य या अधूरे मन्त्रों में सर्वत्र ही एक वाक्यता या व्याख्यान के पूर्ण करने का प्रकार दिखाया है । 'केशी' [१४] ( आदित्य ) क्यों ? 'केश' नाम रश्मि ओं (किरणों) का है, उनसे वह केशवान् होने से 'केशी' है ।