निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1272, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५११ ) १२अ० ३पा० ७ख०
अथवा काशन से 'केशी' है । अथवा प्रकाशन से 'केशी' है । दोनों में अर्थ और धातु समान हैं ॥ “तस्य०” उस ( केशी ) की यह ऋचा है ॥६[२५]॥ [ खं० ७ ] निरु०-“केश्य१ग्निं केशी विषं, केशी विभर्त्ति रोदसी । केशी विश्वं स्वर्दृशे केशीदं ज्योतिरु- च्यते ॥” [ ऋ०सं० ८, ७, २४, १ ] ॥ केशी अग्निं च विषं च । 'विषम्'-इति उदकनाम । विष्णातेः = विपूर्वस्य स्नातेः शुद्धार्थस्य । विपूर्वस्य वा सचतेः । द्यावा- पृथिव्यौ च धारयति । केशी इदं सर्वम् इदम् अभिविपश्यति केशी इदं ज्योतिः उच्यते । इत्यादित्यम् आह । अथापि एते इतरे ज्योतिषी केशिनी उच्येते । धूमेन अग्निः, रजसा च मध्यमः । तयोः एषा भवति ॥ ७ [२६] ॥ अर्थः- "केश्यग्निं०" इस ऋचाका जूतिनाम ऋषि है। 'केशी' देव 'अग्निं बिभर्ति" अग्नि को धारण कर ता है- वर्षा से जल के द्वारा ओषधियों ही उत्पन्न कर के आहुति के द्वारा अग्निका पोषण करता है । "केशीविषम्" केशी विषको धारण करता है- 'विष' यह जल का नाम है