निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1273, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें• हिन्दी निरुक्त ( ५१२ ) १२ अ० ३ पा० ४ खं० _ 'विष्णाति' = शुद्धि अर्थ में 'वि' (उप०) और 'स्ना' (अदा० प०) धातु का है। क्यों कि— वह विशेष करके वस्त्र आदि को शुद्ध कर देता है। अथवा 'वि' (उप०) 'सच' (भ्वा० आ०) धातु का है। क्यों कि — वह सब जगह लगा हुआ रहता है। “केशी रोदसी बिभर्ति” केशी द्यावा पृथिवी दोनों लोकों को धारण करता है— उनमें रहने वाले प्राणियों पर अनुग्रह करता है। “केशी विश्वं स्वर्दृशे” केशी (स्वः) आदित्य [इदम् अभिविपश्यति] इस सब को भले प्रकार देखता है । '“केशी इदं ज्योतिः उच्यते” 'केशी' यह आदित्य रूप ज्योति कहाता है । इस यह प्रकार मन्त्र 'केशी' नामसे आदित्य को कह रहा है ॥ और भी ये दूसरे ज्योति प्रथम और मध्यम केशी कहे जाते हैं। उनमें धूम [धूप'] से अग्नि केशी (केश वाला) है । क्यों कि-वह जब प्रज्वलित होता है, तबभी उसमें धूआं केश जैसा रहता है। और मध्यम (वायु) रूप रहित होनेके कारण अप्रत्यक्ष होता हुआ भी धूली से प्रतीत होता है- वह वायु आता है, इससे मध्यम वायु धूलि से केशी है और विद्युत् [बिजली] के रूपमें वह जलसे केशी है-जलसे वह केश वाला जैसा प्रतीत होता है । “तयो०” उन दोनों [प्रथम और मध्यम = अग्नि और वायु] की यह ऋचा है ॥१ (२६) ॥ [ खं० ८ ] निरु०- “ त्रयः केशिन ऋतुथा विचक्षते संवत्सरे पवत एक एषाम् । विश्वमेको अभिचष्टे