सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1276, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1276

हिन्दी निरुक्त ( ५१५ ) १२अ० ३पा० १०खं० 'यमः' व्याख्यातः । तस्य एषा भवति—॥ ९ (२८) ॥ अर्थः-“पुनरेहि वृषाकपे०” इस ऋचा का वृषाकपि ऋषि है, और पृष्ठ्य के षष्ठ (छठे) अहन् में ब्राह्मणाच्छंसी के शस्त्र में विनियुक्त है । 'वृषाकपे !' हे वृषाकपि देव ! “यः एषः त्वं स्वप्न- नंशनः ( स्वप्नान् नाशयति उदयेन आदित्यः ) अस्तम् एषि पथा” जो यह तू अपने उदय से लोगों के स्वप्नों का नाश करने वाला ( निद्रा का भङ्ग करने वाला ) आदित्य अपने मार्ग से अस्त को प्राप्त होता है । “ ( यश्च त्वं ) विश्वस्मात् ( सर्वस्मात् ) इन्द्रः उत्तरः ” और जो तू सब से ऊंचा या बड़ा है, ( सः त्वम् ) सो तू “पुनः एहि” फिर आ-उदय को प्राप्त हो । “सुविता, (सुप्र- सूतानि वः कर्माणि) कल्पयावहै” फिर हम दोनों तुम्हारे प्रवृत्त हुये शुभ कर्मों को साधें (करें) (.तम् एतद् ब्रूमः आदित्यम् ) उस आदित्य को हम यह कहते हैं ॥ ‘यम ’ ( १७ ) शब्द व्याख्यान किया जा चुका है [ १०, २, ६ ] । “तस्य०” उस (यम) की यह ऋचा है-॥ ६(२८) ॥ [ खं० १० ] निरु०-“यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे देवैः सम्पिबते