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भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1282

हिन्दी निरुक्त ( ४२१ ) १२ अ० २ पा० १२ खं० 'पृथिवी' (१६) का व्याख्यान होचुका [ १, ४, ३ ] “तस्याः०” उस पृथिवी ) का इन्द्र की ऋचा में यह निपात है-॥११(३०)॥ ( खं० १२ ) निरु०-“यदिन्द्राग्नी परमस्यां पृथिव्यां मध्यम- स्यामवमस्यामुतस्थः । अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥” [ ऋ० सं० १, ७, २७, ३ ] ॥ इति सा निगदव्याख्याता ॥ 'समुद्रः' व्याख्यातः । तस्य एष निपातो भवति पावमान्याम् ऋचि ॥ १२ ( ३१ ) ॥ अर्थः-“यदिन्द्राग्नी०” यह ऋचा कुत्स ऋषिकी है। हे 'इन्द्राग्नी!’ इन्द्र अग्नि देवो ! हे 'वृषणौ!’ काम- नाओं को बरसाने वाले ! 'यत्' (यदि) जो (युवाम्) तुम दोनों “परमस्यां पृथिव्याम्” द्युलोक रूप पृथिवी में ‘उत’ अथवा ‘मध्यमस्याम्’ [ मध्यमायाम् अन्तरिक्षे ] मध्यम लोक की पृथिवी = अन्तरिक्ष में अथवा ‘अवमस्याम्’ ( अस्यामेव भूम्याम् ) इसी भूमि में 'स्थः' हो, ( अतः ) तथापि ‘आ- यातम्’ हमारे प्रति आओ ‘अथ’ और ‘सुतस्य’ निचोड़े हुए ‘सोमस्य’ सोम को ‘पिबतम्’ पान करो ॥