भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 13

अ० १ पा० १ ख० १ । चारों पदोंमें गौण और प्रधान । इन नाम आदि चारों प्रकारके पदोंमें कौन पद प्रधान या मुख्य है, और कौन गौण अथवा अमुख्य है, यह निर्णय भाष्य- कारने साक्षात् न कहकर उनकी गणनाके क्रमसे ही जना दिया है, जिस का अभिप्राय टीकाकार ने स्पष्ट कह दिया है भाष्य - "नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्च" [ १ अ० १ पा० १ ख० ] यास्क आचार्य्य अपने अभिमत चार पदोंमे दो दोको मिला कर दो भाग करते हैं। नाम और आख्यात एक भाग, उपसर्ग और निपात दूसरा भाग। इसी से उन्होंने- "नामा-ख्याते" उपसर्ग-निपाता:"—दो दो नामोंको द्वन्द्वसमाससे जोड दिया है। प्रथमभागकी प्रधानता । (१) नाम और आख्यातके भागकी प्रधानता इसलिये प्रतीत होती है कि-आचार्यने उसे पहिले कहा है। क्योंकि लोकमें जो प्रधान होता है, उसका नाम पहिले लिया जाता है। (२) नाम और आख्यात उपसर्ग और निपातकी सहायताके बिना भी अपने अर्थको कह देते हैं, किन्तु उपसर्ग और निपात उनके सामीप्य के बिना अपना अर्थ प्रकाशित नहीं करते, इसीसे नाम और आख्यात दोनों प्रधान और उप- सर्ग एवं निपात अप्रधान हैं।