निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ११ (२) प्रसिद्ध भगवान् पाणिनि मुनि जिनका अनुशासन वर्त्त- मानमें भी संस्कृत भाषाके लिये जगद्व्यापी है, दो, पदं मानते हैं— “सुप्तिङन्तं पदम्” सुबन्त और तिङन्त । जिन पदोंमें सुप् विभक्ति हो वे सुबन्त पद होते हैं, और जिन- में तिङ् विभक्ति हो वे तिङन्त पद होते हैं । अर्थात् उनके मतमें नाम और आख्यात दो विभागोंमें समस्त शब्द आजाते हैं । (३) कुछ आचार्य तीन पद मानते हैं— (क) सुबन्त, (ख) तिङन्त, (ग) निपात और उपसर्ग । (४) कोई कोई आचार्य—सुबन्त (१) तिङन्त (२) निपात (३) गति (४) और कर्मप्रवचनीय (५) इस प्रकार पाँच पद मानते हैं और कोई इनमें उपसर्गको पृथक् गिन् कर छः तक मानते हैं । पदों के प्रभेद । (१) नाम पद तीन प्रकारके होते हैं, जैसे स्त्री लिङ्ग, पुलिङ्ग और नपुंसक लिङ्ग । (२) आख्यात पदोंके भी तीन भेद होते हैं, जैसे कर्तृवचन, भाववचन, और कर्मवचन । (३) उपसर्ग पदोंमें आङ् (आ) नि, अधि इत्यादि कुछ पद हैं । (४) निपात पदसमूहमें भी इव, न, चित् इत्यादि पद हैं । प्रथम अध्यायके प्रथम पादके अन्तमें उपसर्ग और द्वितीय तृतीय पादोंमें निपातोंका विशेष रूपसे निरूपण होगा ।