निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त । ११ (२) प्रसिद्ध भगवान् पाणिनि मुनि जिनका अनुशासन वर्त्त- मानमें भी संस्कृत भाषाके लिये जगद्व्यापी है, दो, पदं मानते हैं— “सुप्तिङन्तं पदम्” सुबन्त और तिङन्त । जिन पदोंमें सुप् विभक्ति हो वे सुबन्त पद होते हैं, और जिन- में तिङ् विभक्ति हो वे तिङन्त पद होते हैं । अर्थात् उनके मतमें नाम और आख्यात दो विभागोंमें समस्त शब्द आजाते हैं । (३) कुछ आचार्य तीन पद मानते हैं— (क) सुबन्त, (ख) तिङन्त, (ग) निपात और उपसर्ग । (४) कोई कोई आचार्य—सुबन्त (१) तिङन्त (२) निपात (३) गति (४) और कर्मप्रवचनीय (५) इस प्रकार पाँच पद मानते हैं और कोई इनमें उपसर्गको पृथक् गिन् कर छः तक मानते हैं । पदों के प्रभेद । (१) नाम पद तीन प्रकारके होते हैं, जैसे स्त्री लिङ्ग, पुलिङ्ग और नपुंसक लिङ्ग । (२) आख्यात पदोंके भी तीन भेद होते हैं, जैसे कर्तृवचन, भाववचन, और कर्मवचन । (३) उपसर्ग पदोंमें आङ् (आ) नि, अधि इत्यादि कुछ पद हैं । (४) निपात पदसमूहमें भी इव, न, चित् इत्यादि पद हैं । प्रथम अध्यायके प्रथम पादके अन्तमें उपसर्ग और द्वितीय तृतीय पादोंमें निपातोंका विशेष रूपसे निरूपण होगा ।
अ० १ पा० १ ख० १ । चारों पदोंमें गौण और प्रधान । इन नाम आदि चारों प्रकारके पदोंमें कौन पद प्रधान या मुख्य है, और कौन गौण अथवा अमुख्य है, यह निर्णय भाष्य- कारने साक्षात् न कहकर उनकी गणनाके क्रमसे ही जना दिया है, जिस का अभिप्राय टीकाकार ने स्पष्ट कह दिया है भाष्य - "नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्च" [ १ अ० १ पा० १ ख० ] यास्क आचार्य्य अपने अभिमत चार पदोंमे दो दोको मिला कर दो भाग करते हैं। नाम और आख्यात एक भाग, उपसर्ग और निपात दूसरा भाग। इसी से उन्होंने- "नामा-ख्याते" उपसर्ग-निपाता:"—दो दो नामोंको द्वन्द्वसमाससे जोड दिया है। प्रथमभागकी प्रधानता । (१) नाम और आख्यातके भागकी प्रधानता इसलिये प्रतीत होती है कि-आचार्यने उसे पहिले कहा है। क्योंकि लोकमें जो प्रधान होता है, उसका नाम पहिले लिया जाता है। (२) नाम और आख्यात उपसर्ग और निपातकी सहायताके बिना भी अपने अर्थको कह देते हैं, किन्तु उपसर्ग और निपात उनके सामीप्य के बिना अपना अर्थ प्रकाशित नहीं करते, इसीसे नाम और आख्यात दोनों प्रधान और उप- सर्ग एवं निपात अप्रधान हैं।
हिन्दी निरुक्त । १३ (३) नाम और आख्यात वाच्य अर्थसे अर्थवाले है तथा उपसर्ग और निपात द्योत्य अर्थसे। इससे पहिला समु- दाय प्रधान और दूसरा गौण है। वाच्य अर्थ अपना निजका अर्थ होता है और द्योत्य अर्थ दूसरे शब्द का होता है तथा दूसरे शब्दसे प्रकाशित होता है। वाचक शब्द अपने अर्थ का कहने वाला होता है, और द्योतक शब्द दूसरे शब्दके अर्थ को केवल प्रका- शित करता है, वस्तुतः उसका कोई अर्थ नहीं होता, जैसे “सर्प का बिल और हिन्दुस्तानमें कंजरका घर" इस वाक्य का। दो दोको समस्त करने का हेतु। (१ नाम आख्यात) (१) नाम और आख्यात परस्पर आकांक्षा रखते है, इसीसे आचार्यने इनका समस्त निर्देश किया है। जैसे—'यज्ञदत्तः' यह नाम शब्द तभी तक साकांक्ष है, जब तक 'पचति' 'पठति' इत्यादि आख्यात उसके सामने जोड़ कर उसकी आकांक्षा न मिटाई जावे। तथा 'पचति' यह आख्यात शब्द तभी तक सापेक्ष है, जब तक 'यज्ञदत्तः' यह नाम शब्द उसकेसाथ नहीं जोड़ा जावे। अर्थात् व्यवहारमें दोनों साथ ही रहते है, जैसे—पचति यज्ञदत्तः ओदनम् । इसलिये इनके इस नित्य सम्बन्धको सूचन करनेके लिये इनका समास निर्देश किया। (२) नाम और आख्यात दोनों ही वाच्य अर्थसे अर्थवान् होते हैं, इनके इस सादृश्यको जतानेके लिये इनका समास किया गया है, अन्यथा अलग अलग भी कहे जा सकते थे।
१४ अ० १ पा० १ खं० १ । ० ( २ उपसर्ग निपात ) “उपसर्ग --निपाताः” यह उपसग और निपात दोनोंका समास निर्देश है, इनका पृथक् एक समासमें संयोजन ‘इस प्रयोजन से किया गया है कि ये दोनो नाम और आख्यातके अर्थ विशेषके द्योतन( प्रकाशन ) रूप समान कार्य्य को करते हैं । एक एकके पूर्वापरका निर्णय । ( १ नाम ) पहिले निश्चित हो चुका है कि चारोंमें दो नाम और आख्यात प्रधान है, इसलिये ये दो सबमें पहिले कहे गये, किन्तु इनमें भी नाम पदके प्रथम प्रयोगका कारण अल्पस्वरता है। जिस शब्द मे स्वर कम होते हैं, वह पद द्वन्द्वसमासमें पूर्व रहता है। यह व्याकरण का नियम है। ( २ आख्यात ) 'आख्यात' पद 'नाम' पदके अनन्तर इस कारण किया गया कि वह नामके कारक रूप अर्थ में रहने वाली क्रियाको कहता है । ( ३ उपसर्ग ) आख्यातका सहयोगी होने से उपसर्ग का पाठ आख्यातके अनन्तर किया गया है । ( ४ निपात ) परिशेषसे निपातका पाठ या प्रयोग सबसे पीछे हुआ । इन युक्तियोंके बल पर यास्क मुनिने इन सबको।
हिन्दी निरुक्त । १५ “नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्च” इस क्रमसे कहा है । आख्यात का लक्षण । “तत्रैतन्नामाख्यातयो र्लक्षणं प्रदिशन्ति, भावप्रधान-माख्यातम्” । (क) आख्यात जो 'पचति' 'पठति' इत्यादि क्रिया रूप है, उस में द्रव्य और क्रिया दो अर्थ रहते हैं। जैसे-'पचति' मे पाक और पकानेवाला, तथा 'पठति' मे पढ़ना और पढनेवाला। यहां पाक ओर पढ़ना क्रियाएं हैं और पाक करनेवाला तथा पढ़नेवाला पुरुष आदि द्रव्य होता है। इन दोनों मे क्रियां या भाव प्रधान (विशेष्य) होता है, और द्रव्य अप्रधान या विशेषण होता है। इसीसे आख्यातको भाव-प्रधान कहते हैं, और यह भाव-प्रधानताही उसका लक्षण या पहिचान है। अर्थात् जहां इस प्रकारसे भाव-प्रधानता होगी वह आख्यात होगा। आख्यायते प्रधानभावेन क्रिया (भावः), गौणत्वेन द्रव्यं च यत्र तदाख्यातम् । (ख) जिस पदमें गौण भावसे क्रिया और उस पर प्रधान भावसे भाव कहा जावे, उसको आख्यात कहते हैं। इस मतमें पूर्व मतसे यह विशेष है कि-उसमें कारक या द्रव्यकी अपेक्षा से भावकी प्राधनता है, और इसमें क्रियाकी अपेक्षा से भावकी प्रधा- नता है। पूर्व मतमें क्रिया और भावका अभेद है और यहां भेद है। क्रिया नाम व्यापारका है, वह सदा ही परिच्छिन्न द्रव्यमें आश्रित रहती है। क्रियासे सम्बन्ध रखनेवाले द्रव्यको कारक
१६ अ० १ पा० १ ख० १ । कहते हैं, उसके कर्त्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, अधिकरण. ये छः भेद होते हैं। एक ही क्रिया सम्बन्धके भेदसे अनेक कारकविशेषोंका हेतु हो जाती है। जैसे—एक स्त्री सम्बन्धके भेदसे पति और पुत्र आदि विशेष नामोंका कारण बन जाती है। जो उसमें गर्भ रखता है वह पति और जो उसका या उसमें गर्भ है वह पुत्र, इसी प्रकार पाक क्रियामें जो पकाता है, वह कर्त्ता, जो पकाया जाता है वह कर्म, जिसमें तण्डुल रखकर पकाया जाता है, वह अधिकरण और जिसके लिए पकाया जावे वह सम्प्रदान इत्यादि रीतिसे कारक-भेद हो जाते हैं। पचनानुकूल क्रिया एक ही समयमे पाचक (पकानेवाला) ओदन (भात) और स्थाली (बटलोई) में भिन्न २ सम्बन्धसे उन की कर्त्ता, कर्म और अधिकरण संज्ञाको उपपन्न करतो है। और वह समान कालमें ही इस तरह विभक्त रहती हुई ओदनमें पाक रूप भावको उत्पन्न करनेके लिए उन्मुखो प्रतीत होती है। वहाँ पाक रूप फलकी प्रधानता और कारणभूत जो पाकानुकूल क्रिया है, उसकी गौणता प्रतीत होती है। क्रिया पर भावकी प्रधानता । आख्यातमें भावकी अपेक्षा से क्रियाकी गौणता इस लिए है, कि वह भावकी सिद्धि ही के लिए आत्म लाभको धारण करती या उत्पन्न होती है, जब वह तण्डुल आदिमें पाक नामक भावको उत्पन्न कर देती है, तो अपना प्रयोजन पूरा हो जानेसे एक देश (चावलका वह भाग जो सबसे पीछे गलता है) में ही अन्तर्द्धान हो जाती है। जिसका जिसके लिए आत्मलाभ (उत्पत्ति) होता है, वह उसका गुणभूत या विशेषण होता है। भाव सिद्धिके लिए ही क्रियाका आत्मलाभ होता है। इसी से
हिन्दी निरुक्त । १७ वह गुणभूता है, और उसका भाव सिद्धिसे ही परोक्ष होने पर अनुमान होता है । क्रियाकी परोक्षता । इन्द्रियोंमें किसी इन्द्रियसे भी अपने स्वरूपमें रहती हुई क्रिया भी प्रत्यक्ष नहीं होती। किन्तु उसके अन्तमे जो भाव सिद्धि होती है, उस से वह अनुमित होती है-(अनुमान) निश्चय ही क्रिया हो चुकी, जिससे कि यह भाव सिद्ध हो गया । यदि क्रिया न होचुकी होती तो जैसे कि-पहिले इस क्रियाके बिना यह भाव कभी नहीं हुआ था, ऐसे ही अब भी नहीं होता, और अब यहां भाव है, इससे क्रिया होचुकी, यह अनुमिति होती है । फलितार्थ । यद्यपि आख्यात क्रिया और भाव दोनोंका वाचक है, तथापि भाव के ही लिए क्रिया होती है, इससे भावकी प्रधानता मानी जाती है । भाव-प्रधानताका व्याख्यान्तर । कोई आचार्य भावप्रधान शब्दका प्रकृत्यर्थ प्रधान अर्थ करते हैं । अर्थात्, आख्यातमें दो भाग होते हैं, प्रकृति और प्रत्यय, प्रकृतिका अर्थ जो भाव है वह प्रधान, और प्रत्ययका अर्थ जो साधन या कारक हैं, वे गौण रहते हैं । इस मतमें भाव, कर्म, क्रिया और धात्वर्थ एक ही वस्तु है । (यह व्याख्या पहिली व्याख्याका स्पष्टीकरणमात्र है) । व्युत्पत्ति । आख्यायन्ते स्त्रीपुन्नपुंसकानि, क्रियागुणभावेन वर्तमानानि अनेन, क्रिया च तेषामुपरि प्राधान्येन वर्तमाना-इत्याख्यातम् ॥ ३
१८ अ० १ पा० १ खं० १ । • आख्यातमें स्त्रीलिङ्ग, पुंलिङ्ग और नपु सकलिङ्ग अर्थात् कारक द्रव्य क्रियाके गुणभूत रूपसे और क्रिया उन के ऊपर प्रधानता- से रहती हुई कही जाती है। कारकोंपर क्रियाकी प्रधानता ! (क) आख्यात में कारकों के ऊपर क्रियाकी प्रधानता इस लिए है, कि यहां क्रिया शब्दसे वाच्य होती है, और कारक अर्थात् से लिए जाते हैं। इसीसे क्रियाकी प्रधानता और कारकों की गौणता है। [विशेष-प्रत्ययाधानात्] •क्रियाकी प्रधानताका दूसरा यह भी कारण है कि ‘पचति’ इत्यादि आख्यात शब्द पचि क्रियामें ही विशेष बुद्धिको उत्पन्न करता हैं। यद्यपि वहां पकानेवाले आदि साधन, जिनमें कि वह क्रिया रहती है, और जो कि अनेक क्रियाओंमें शक्ति भी रखते हैं, प्रतीत होते हैं, किन्तु गौणतासे। जो शब्द जिस अर्थमें विशेष रूपसे रहता है, वही उसका प्रधान अर्थ है। इस न्यायसे आख्यात भी क्रिया और कारक दोनों अर्थोंमें रहता है, किन्तु क्रियामें विशेष रूपसे और कारकमें सामान्य रूपसे रहता है, इससे यह भावप्रधान है, यह सिद्ध हुआ। इसी बातको इस तरह भी समझ सकते हैं, कि किसीने किसीसे क्रियाके जानने के लिये ही पूछा कि-किं करोति देवदत्तः ? क्या करता है देवदत्त ? इस पर क्रियाके बताने के ही अभिप्रायसे उत्तर देता है—‘पचति’ पाक करता है, किन्तु ‘ओदनम्’ यह पद पहिले कह कर उसके पीछे ‘पचति’ ऐसा नहीं कहता । तात्पर्य । जो शब्द जिस वस्तु के बोध करानेमें दूसरे शब्दकी अपेक्षा से करता है, वह उस पदार्थमें विशेष•प्रत्ययाधान या विशेष रूप
हिन्दी निरुक्त । १६ बुद्धिको उत्पन्न करता है। जैसे—'देवदत्त पाक करता है' इस अर्थको कोई पुरुष वाक्यके द्वारा प्रकट करना चाहता है। इसलिये यदि वह 'देवदत्तः' ऐसा कहता है, तो देवदत्तका केवल बोध होता है, किन्तु जिस क्रियाको वह कर रहा है, उसका ज्ञान अभी नहीं होता, इससे जाना गया कि —देवदत्त शब्द पाकानुकूल क्रियाके बतानेमें असमर्थ होकर 'पचति' पदकी अपेक्षा कर रहा है। इससे उस (देवदत्त) शब्दका देवदत्त नामवाले मनुष्यमें ही विशेष प्रत्ययाधान है। किन्तु उस क्रियामें नहीं। यदि वह 'पचति' पदका ही प्रयोग करता है, तो 'पकाता है' इतना ही अर्थ प्रतीत होता है, किन्तु वह कौन है ? यह प्रतीत नहीं होता। सुतराम्, उसे देवदत्त-जो पाक क्रियाको कर रहा है, उसके बतानेवाले देवदत्त शब्दमें आकांक्षा बनी हुई है, इससे 'पचति' पद पाका- नुकूल क्रिया ही में विशेष प्रत्ययाधान करता है, किन्तु द्रव्यमें नहीं। जो शब्द जिसमें विशेष प्रत्ययाधान करता है, उस शब्दका वही मुख्य अर्थ है, अथवा वह शब्द तदर्थ-प्रधान होता है। इसी न्यायसे "भावप्रधान-माख्यातम्" यह सिद्धान्त सिद्ध होता है। आख्यात में । हम जिस क्रियाकी प्रधानताका निरूपण कर रहे हैं, वह अमूर्त है, उसका स्वतन्त्र शरीर नहीं है। जब कभी उसको दिखाना चाहेंगे, तो पाचक, भात, तथा बटलोई आदि साधनोंमें जब होती है, उनके द्वारा ही उसका निर्देश करेंगे, अर्थात् उन्हीं में रधनेके समय कहेंगे कि—यह पाक क्रिया है अन्यथा उस शरीर-रहित क्रियाको नहीं दिखा सकते। इस लिये ही आख्यात पदके साथ 'ओदनम्' 'देवदत्तः,--इत्यादि कारक जो उसकी क्रियासे सम्बन्ध रखते हैं, बोले जाते हैं। यदि आख्यात में क्रियाकी प्रधानता न होती, किन्तु किसी द्रव्य आदिकी होती, तो आख्यात पद ( 'पचति' आदि) के साथ
द्रव्य वाचक पदोंकी जो 'ओदनम्' इत्यादि हैं, सहायता नहीं ली जाती, अर्थात् 'ओदनम् पचति' ऐसा कहनेकी आवश्यकता न होती । केवल 'पचति' पदसे ही आकांक्षा पूर्ण हो जाती । भाव यह है कि-'पचति' पद क्रियाके बोधनके लिये किसी दूसरे पदकी अपेक्षा नही करता, किन्तु साधनोंके ही विशेष रूप जनानेके लिये ही 'ओदनम्' इत्यादि पदोंकी अपेक्षा करता है, इसीसे आख्यात क्रियाप्रधान है। अर्थात् जिस प्रकार पचति क्रिया कर्तृ, कर्म आदि कारकोंके विशेषरूपको बतानेमें असमर्थ होकर 'ओदनम्' 'देवदत्तः' इत्यादि द्रव्यवाचक शब्दोंकी अपेक्षा करती है, वैसे पाकरूप क्रियाके विशेषरूपके बोधन करनेमें किसी पदकी सहायताकी अपेक्षा नहीं करती, किन्तु स्वयम् आपही उस कार्यको पूरा कर देती है, जो जिसमें स्वतन्त्र है, वह उसमें प्रधान है, इसी न्याय पर आख्यातमें क्रियाकी प्रधानता स्थिर होती है । अथवा जब कोई किसीसे किसीकी क्रियाके ही जानने के लिए पूछता है कि-'क्या करता है ? तब उसके उत्तरमें वह उसकी क्रियाको 'पचति' (पकाता है) आदि आख्यात पदसे ही बताता है, किन्तु 'ओदनम्' (ओदनको देवदत्त) इत्यादि नाम पदोंसे कभी क्रियाके बतानेका उद्योग नहीं करता। यदि नाम, उपसर्ग या निपात इन पदोंमें से भी किसी पदसे क्रिया बताई जा सकती अथवा 'पचति' आख्यात पदसे क्रिया बताई ही नहीं जा सकती तो, नियम पूर्वक 'पचति' पदसे ही उसका सदा उत्तर न देता, किन्तु उत्तर जब देता है, इसी से देता है, और जहां द्रव्य या साधनोंकी जिज्ञासा होती है, तो उसका प्रयोग कभी नहीं किया जाता, जब कि-सर्वथा क्रियाके बोधन के अतिरिक्त कोई उसका कार्य ही नहीं है-तो उसको क्रिया प्रधान मानने के अतिरिक्त क्या कहा जावेगा ?
हिन्दी निरुक्त । २१ 'पचति' के साथ 'ओदनम्' की आवश्यकता । यद्यपि क्रियाके विशेषरूप जो पाक पठन आदि व्यापार हैं, उनके जानने के लिए जो प्रश्न होता है, कि-'क्या करता है' उसके उत्तरमें भी 'ओदनं पचति' ऐसा वाक्य कहा जाता है, जिससे यह प्रतीत होता है कि-'पचति' के समान 'ओदनम्' पद भी क्रिया- का बोधक है, और वह आख्यातकी क्रिया-प्रधानताको कुछ छीन लेगा, किन्तु वास्तवमें 'ओदनम्' पद क्रियाके विशेषरूपके बतानेके लिए नहीं कहा जाता, बल्कि उत्तर देनेवालेके हृदयमें उत्तर देते हुए पाक क्रियाके बतानेके समय अगाऊ शङ्का उठती है कि-जब मैं कहूँगा- 'पकाता है' तो उस पर 'क्या?' ऐसा प्रश्न, जिसका विषय पकाईजानेवाली वस्तु होती है- अवश्य होगा, इससे पाक क्रियाके बतानेके साथ ही 'ओदनम्' पद कह कर भविष्यत् प्रश्न, जो उसका अत्यन्त समीपी है- शान्त कर दिया जाय, इस लिए 'पचति' की आवश्यकता पर 'ओदनम्' भी कहा जाता है, इससे यह सिद्ध होता है कि-आ- ख्यातकी क्रिया-प्रधानताको अन्य कोई भी पद नहीं ले सकता है। यह भाव निकला कि-जब 'ओदन पचति' ऐसा उत्तर होता है, उस में 'ओदनम्' के लिए बिना किया हुआ भी 'क्या?' ऐसा प्रश्न बुद्धिमें अलग कल्पित कर लिया जाता है। सुतराम्, “ओदनम्” पदका क्रियाके कथनमें कोई सामर्थ्य नहीं है, आख्यात ही उसका स्वतन्त्र बोधक है। क्रियाके स्वभावसे आख्यातकी क्रिया-वाचकता । क्रियाका स्वभाव है, कि-वह मूर्त्त या परिच्छिन्न द्रव्यमें रह- ती है, और प्रकारके द्रव्य या क्रिया आदि किसी पदार्थमें नहीं रह सकती, इससे यह सार निकला कि 'जो क्रियावाचक शब्द होगा वह भी योग्य सम्बन्धसे एक वाक्यमें वैसे द्रव्यवाचक शब्द
२२ अ० १ पा० १ ख० १ । के ही साथ रहेगा। जिसमें उस क्रियाके रहनेका सम्भव हो, सुतराम्, क्रियावाचकके साथ क्रियावाचक मिल कर एक वाक्य- में कभी नहीं रहेगा, यही क्रियाका स्वभाव है। इसके अनुसार हम देखते हैं, तो नामपदके साथ नामपद या क्रियापद देखा जाता है, किन्तु क्रियापदके साथ क्रियापद नहीं देखा जाता, जैसे-‘देवदत्तः पचति’ ‘देवदत्त पकाता है’ ‘यज्ञदत्तः पठति’ ‘यज्ञदत्त पढता है’ यह नाम और क्रिया पद या आख्यातका जोड़ा है, तथा ‘राज्ञः पुरुषः’ ‘राजाका पुरुष’ यह एक वाक्यमें दो नामोंका योग है, किन्तु ‘पचति’ पठति’ (पकाता है-पढ़ता है) ऐसे दो स्वतन्त्र क्रियापदोंका एक वाक्यमें मेल नहीं देखा जाता। ऐसी अवस्थामें हम ‘पचति’ और ‘पठति’ आदि आख्यात पदोंको क्रिया प्रधान न कहें, तो क्या करेंगे? अर्थात् पढ़ना कभी लिखना करता, या लिखना पढ़ना, तो ‘पचति पठति’ आदि प्रयोग होते। यदि यह इसी लिए ऐसा है तो— आख्यातका क्रिया-प्रधानत्व अनिवार्य है। आख्यातमें द्रव्य-प्रधानता नहीं। जिन शब्दोंमें द्रव्य प्रधान होता है, ऐसे शब्दो में लिङ्ग (स्त्री-पुं-नपुंसकत्व) का योग भी रहता है, जैसे—पाचक—पाठक आदि शब्द। इनका पुँल्लिङ्गमें ‘पाचकः’ स्त्रीलिङ्गमें ‘पाचिका और नपुंसक लिङ्गमें ‘पाचकम्’ बनता है, जब कि लिङ्गके भेदसे इनमें विकृति देखी जाती है तो इनमें लिङ्गका योग भी स्वीकार्य ही होगा। जिन शब्दोंमें लिङ्गके कारण कोई विकृति नहीं देखी जाती उनमें लिङ्गके सम्बन्धके होनेका कोई प्रमाण न होने से वे निर्विवाद लिङ्ग-सम्बन्ध-रहित ही माने जायेंगे। इस विचारके साथ हम आख्यात पदोंको देखते हैं तो वे भी---‘ब्राह्मणः
पठति' 'ब्राह्मणी पठति' तथा 'ब्राह्मणकुलं पठति' इन तीनो ही वाक्योंमें पुल्लिङ्ग स्त्रीलिङ्ग एवम् नपुंसकलिङ्ग पदोंके साथ लग कर भी एक ही रूपसे रहते है, इसका कारण यही हो सकता है कि—वह द्रव्य—प्रधान नहीं है। इस द्रव्य प्रधानताके खण्डनसे भी परिशेषसे आख्यातमें क्रिया प्रधानता ही आती है। इसी अभिप्रायसे किसी प्राचीन आचार्य्यने कहा है— "क्रियावाचक माख्यातं, लिङ्गतो न विशिष्यते । त्रींश्च पुरुषान्विद्यात् कालतस्तु विशिष्यते ॥ आख्यात क्रिया—वाचक या क्रियाप्रधान है। (द्रव्यवाचक नहीं) क्योकि इसमें लिङ्गकी विशेषणता नही देखी जाती। जैसे कि—हिन्दीभाषामें 'पकाता है' 'पकाती है' इत्यादि। इसके अतिरिक्त—३ पुरुषो और कालका योग भी आख्यातके क्रियाप्रधान होनेका मूल है। अर्थात् द्रव्यवाचक नाम पदोंमे प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष तथा भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान कालकी विशेषणता नहीं देखी जाती, यह विलक्षणता भी आख्यातके क्रियाप्रधान होनेमें कारण है। प्रश्न। शाब्दिक लोगोंने लिङ्ग और संख्याके सम्बन्धको द्रव्यका लक्षण बताया है, क्योंकि—संख्या और लिङ्ग ये दोनो ही द्रव्यके धर्म हैं, हम जहां तक समझतेहै, इसी सिद्धान्तके अवलम्बन पर यह वचन उतरा है, किन्तु कोई यह भी सिद्ध नहीं कर सकता कि—'अकेली संख्या भी किसी अद्रव्य पदार्थमें रह सकती है' इस लिए जब कि—आख्यातपदोंमें 'पचति' पचतः, पचन्ति' इत्यादि रूपसे संख्याका योग व्यापक है, तो वे क्यों नहीं द्रव्यवाचक समझे जाते ? जैसे कि—घटः घटौ घटाः । अर्थात् 'पकाता है' और 'पकाते हैं' ऐसे प्रयोगोमें संख्याकां प्रभाव स्पष्ट प्रतीत होता है।
२४ अं० १ पा० १ खं० १ । • इसके अतिरिक्त 'देवदत्तः पचति' 'ओदनः पच्यते' ( 'देवदत्त पकाता है, ओदन पकाया जाता है) इन वाक्योंमें द्रव्यवाचकता या द्रव्यके सामानाधिकरण्यके कारण क्रियामें विकृति होती है, अन्यथा उस विकृतिका मूल ही क्या है। अपि च "लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः” “कर्त्तरि शप्” । इत्यादि अनेक पाणिनि सूत्र इसका साक्ष्य भी देते हैं कि- आख्यातमें द्रव्य-वाचकता रहती है। लिङ्गकी विकृतिका अभाव भी पूर्णरूपसे प्रमाण नहीं हो सकता कि--'आख्यात द्रव्यवाचक नहीं', क्योंकि कति और युष्मद्-अस्मद् आदि बहुत द्रव्यवाचक शब्द ऐसे है, जिनमें लिङ्ग की विकृति नही देखी जाती जैसे-'त्वं पुमान्' 'त्वंस्त्री' 'त्वं ब्रह्म' 'कति पुरुषाः' 'कति स्त्रियः' 'कति कुलानि' इत्यादि । • यह कहें कि-- कति आदि शब्दोमे लिङ्ग है, किन्तु प्रतीत नहीं होता, तो हम भी 'पचति' आदिके लिये यह कह सकते है, इस लिये यह शब्दका स्वभाव है कि-कहीं लिङ्गकी विकृति प्रतीत होतो है, और कहीं नहीं। जब कि-पच् धातुसे लट् लकार होता है, और वह 'शतृ' आदेश होनेकी अवस्था में द्रव्यवाचक स्वीकृत है, तो तिप् आदेश- की अवस्था में उस लट्के अर्थको कौन उड़ा ले जायगा, या उड़ भी जाता है, तो उसमें क्या प्रमाण है ? अपि च 'देवदत्तः पचति' यहा पर पचति द्रव्यवाचक नहीं तो देवदत्त शब्दमें प्रथमा विभक्तिका क्या मूल है ? और पचति पचसि तथा पचामि में पुरुष नियम किसने किया ? • यदि इन सब बातोंका मूल निकालेंगे तो आप समझेंगे कि- आख्यातमें द्रव्य-वाचकता है, या द्रव्य-प्रधानता है, या नहीं।
हिन्दी निरुक्त । २५ अपि च—यदि आख्यातमें सर्वत्र भाव—प्रधानता ही होती तो पाणिनि मुनि उक्त सूत्रमे कर्त्ता और कर्मके अतिरिक्त भावमें लकारको क्यो विधान करते ? यद्यपि यहां एक आपत्ति और हो सकती है ! वह यह है— कि—आख्यातकी द्रव्य—प्रधानता शब्दानुशासन तक है, फिर अपना कार्य करके लोकव्यवहारमे शब्दके आनेसे पहले ही वह लय हो जाती है ? तथापि उसके लिये यह कहा जा सकता है कि—वह पीछे किस कारणसे लय हो जाती है, और उसके लय होने मे क्या प्रमाण है ? यदि कोई प्रमाण तुम्हारे पास अनिवार्य होता तो प्रथमान्त- विशेष्यक शाब्दबोध माननेवाले नैयायिक तुमसे अलग क्यो होने ? इससे सार यह निकला कि—आख्यात हो या नाम जहां भाव-वाचक प्रत्यय होगा, वही भाव-प्रधानता है, अन्यत्र नही । जैसे—'देवदत्तेन भूयते' पच्यते, 'ओदनेन पच्यते, कृतिः भूतिः भवनम्, भावः, पाचकता, पाठकता इत्यादि ! उत्तर—यह ठीक है कि—आख्यातपद भाव, क्रिया, काल और संख्याके समान द्रव्यका वाचक भी होता है, तथापि उन सब अर्थोमे भावकी ही प्रधानता रहती है, इसके लिये विशेष- प्रत्ययाधान आदि बहुत युक्तिया दी जाचुकी हैं, इसलिए यहा अन्य विस्तारकी उपेक्षा की जाती है । प्रकृत्यर्थकी प्रधानता । और प्रत्ययार्थकी अप्रधानता । आख्यातके चार विभाग हे, कर्तृ-वाचक, कर्म-वाचक, भाव-
२६ अ० १ पा० १ ख० १ । वाचक और कर्म-कर्तृ-वाचक । जैसे—कर्तृ० 'पचति', कर्म० 'पच्यते', भाव० 'भूयते', और क० क० 'पच्यते-स्वयमेव' । इन चारों आख्यातोंमें अवयव या प्रत्यय (तिप् आदि) के अर्थ द्रव्य हैं, वे अप्रधान हैं, और प्रकृति जो धातु (पच आदि) है, उसका अर्थ (क्रिया) प्रधान है। उसका अभिधान करनेसे यह आख्यात कहाता है अर्थात् प्रधानीभूत क्रिया ही इसका लक्षण है। अथ नामलक्षणम् । (संगति) आचार्य्यने चारों पदोंकी गणनाके समय 'नामाख्याते' इस पदमें व्याकरणके नियमके अनुरोधसे आख्यातकी अपेक्षा नामकी गणना पहिले की है, किन्तु लक्षणका क्रम उत्पत्तिके क्रमानुसार किया है, उत्पत्तिमें आख्यात पहिले है, और नाम आख्यातसे उत्पन्न होनेके कारण उससे पीछे है। इसी उत्पत्ति के क्रमके अनुरोधसे गणनाक्रमको भङ्ग करके आख्यातके लक्षणके अनन्तर नामका लक्षण किया। लक्षण । (नि०) “सत्वप्रधानानि नामानि” लिङ्ग और संख्यावाले पदार्थको द्रव्य या सत्व कहते हैं, जिस पदमें द्रव्य प्रधानतासे कहा जावे, और क्रिया गौणभावसे वह 'नाम' कहाता है। नाम शब्दकी व्युत्पत्ति । (क) नमन्ति आख्यातशब्दे गुण- भावेन यानि, तानि नामानि । जहां वाक्यमें नाम और आख्यात दोनों इकट्ठे होते हैं
हिन्दी निरुक्त । २७ वहां नाम पद गौण होकर आख्यात पदसे झुक जाते हैं, इसीसे ये नाम कहाते हैं । (ख) नमन्ति स्वमर्थम् आख्यातशब्द- वाच्येगुणभावेन इति नामानि । आख्यातके क्रियारूप अर्थमे० अपने अर्थको गौण भावसे झुका देते हैं, इससे ये नाम कहाते हैं । जिस प्रकार आख्यातमें रहता हुआ भी द्रव्य इच्छासे छोड़ दिया जाता है, उसी प्रकार नाममै रहती हुई भी क्रिया गणना नहीं की जाती । क्योकि नाम पदकी द्रव्यमे परता या अभि निवेश होता है इसीसे उसमे जो क्रिया रहती है वह अपने विकार से उत्पन्न होनेवाले नामार्थको बताकर वहांसे हट जाती है । ॅमानो 'पाचक' शब्दमे जो पाकक्रिया प्रतीत होती है, वह जन समुदायमे पाचक पुरुषकी पहिचान कराके फिर वहांसे चली जाती है। इसी कार्यके लिए उसका वहां निवास था । जब उस द्रव्यका पता चल गया तो फिर वहां वह अपना प्रयोजन नहीं देखती । नाममें क्रियाका रहना । नाम पदमें तीन भाग होते हैं, —प्रकृति, (धातु) प्रत्यय (अ क आदि) और विभक्ति (प्रथमा आदि) जैसे—'पाचक:' इस- ॅमें पच् (धा०) अक (प्र०) और विसर्ग (:) विभक्ति है । यहां प्रकृति और धातु एक ही बात है। धातु क्रियाका वाचक होता है, और वह नाममें विद्यमान है, इससे उसकी वाच्य क्रिया भी वहां होनी चाहिए । जैसे कि—जहां जो अर्थ है, वहां उसका वाचक शब्द भी अवश्य रहता है ।
२८ अ० १ पा० १ ख० १ । जहां शब्द है वहां उसका वाच्य अर्थ है, क्यों कि—शब्द और अर्थ दोनों वाच्य-वाचक।सम्बन्धसे नित्य सम्बन्धी हैं, इस रीति से सिद्ध हुआ कि नाम में क्रिया है। नाममें रहती हुई भी क्रियाकी अविवक्षा। नाममें जो धातु रहता है, उसकी क्रियाको कहनेकी शक्ति कृत् प्रत्ययसे बने हुए प्रातिपदिकसे तिरस्कृत हो जाती है। अर्थात् उसकी वृत्ति प्रातिपदिकके भीतर ही लय हो जाती है, ऐसी अवस्थामें अपने अर्थको प्रगट करनेमे असमर्थ होकर प्रातिपदिक- के अर्थका ही अनुसरण करता है। इस लिए वह द्रव्यप्रधान ही हो जाता है, और क्रियाकी विवक्षा नहीं रहती। यह भाव है कि-जिस समयमें नामका विग्रह करते हैं, उस समय धातु प्रातिपदिकके बन्धनसे मुक्त होकर द्रव्यमें रहते हुए अपने अर्थ को प्रकाशित करता है, किन्तु विग्रहसे पहिले नही, यही नाम शब्दकी द्रव्यपरता है। जिस प्रकार राजाकी शासन शक्ति परराष्ट्र- में तिरस्कृत हो जाती है और उसकी सीमासे बाहिर होते ही उसकी शक्तिका उद्दीपन हो जाता है, वैसेही नामके भीतर आये हुए धातुकी शक्तिका वृत्त है। आख्यातमें क्रिया और नाममे द्रव्यका राज्य है। श्लोकोंमे नामके लक्षण। शब्देनोच्चारितेनेह, येन द्रव्यं प्रतीयते । तदक्षरविधौ युक्तं, नामेत्याहुर्मनीषिणः ॥ १ ॥ अष्टौ यत्र प्रयुज्यन्ते, नानार्थेषु विभक्तयः । तन्नाम कवयः प्राहु, र्भेदे वचनलिङ्गयोः ॥ २ ॥
हिन्दी निरुक्त । २६ निर्देशः कर्म करणं, प्रदानमपकर्षणम् । स्वाम्यर्थोप्यधिकरणं, विभक्त्यर्थाः प्रकीर्त्तिताः ॥३॥ १—लक्षण, जिस शब्दके उच्चारण करनेसे द्रव्य प्रतीत हो, उस को शब्दशास्त्रमें नाम कहते हैं । २—लक्षण, जिस शब्दमें भिन्न २ अर्थोंमें ८ विभक्तियां होती हों और वचनं तथा लिङ्गका भेद हो, उसको नाम कहते है। विभक्तियोंके अर्थ । १ माका, शब्द निर्देश, २ याका कर्मकारक, ३ याका कर्तृ और करण कारक, ४ र्थीका सम्प्रदान कारक, ५ मीका अपादान कारक, ६ ष्ठीका स्वामिभाव आदि सम्बन्ध और ७ मीका अधिकरण कारक अर्थ है। 'नामानि' बहुवचनका कारण । “सत्वप्रधानानि नामानि” इस नाम लक्षणमें “क्रियाप्रधान- माख्यातम्” इस लक्षणमें 'आख्यातम्' पदके समान 'नामानि' के स्थानमें 'नाम' यह एक बचन ही देना चाहिये था, तथापि बहुव- चन करनेका प्रयोजन यह है कि-कही निपात और उपसर्गोंमें भी स्त्रीलिङ्ग, पुलिङ्ग, नपुंसक लिङ्गोंका भेद देखा जाता है, इसलिए उनका भी नामोंमें संग्रह करनेके लिए बहुबचन दिया है । अन्य आचार्योंके मतमें नाम और आख्यातके अर्थोंका भेद । कोई आचार्य नाम और आख्यातके अर्थोंका भेद इस प्रकारसे करते हैं, कि—भाव, काल, कारक और संख्या ये चार अर्थ आख्या- तके हैं, और उनमें भावकी प्रधानता है, इसीसे आख्यातको भाव प्रधान कहते हैं। एवम् नामके भी सत्ता, द्रव्य, संख्या और लिङ्ग ये चार अर्थ होते हैं। और उनमें द्रव्य प्रधान होता है, इसीसे नाम सत्वप्रधान कहे जाते हैं।
३० अ० १ पा० १ ख० १ । नाम और आख्यातके समुदायमें भावकी प्रधानता । (नि०) - तद्यत्रोभे भावप्रधाने भवतः । जहाँपर नाम और आख्यात दोनों इकट्ठे होजाते हैं, वहां भाव- की ही प्रधानता रहती है । यद्यपि स्वतन्त्रताकी अवस्था में एक भावप्रधान और दूसरा द्रव्यप्रधान है, तथापि वह प्रधानता एक पदके विचार तक ही रहती है, लोक तथा वेदमे इनसे जब कार्य निकलता है, तो दोनोंके मेलसे ही निकलता है, अर्थात् व्यवहार स्थलमें इनमें से एकके बिना एक नहीं रहता है, सुतराम्, दोनोको परस्परकी अत्यन्त अपेक्षा बनी रहती है । जैसे—व्यवहारमें 'पचति' से भी कुछ प्रयोजन नहीं मालूम होता, और ऐसे ही एक 'देवदत्तः' पदसे भी । इससे ये दोनो जहां इकट्ठे रहेंगे, वहां, अर्थात् वाक्यमें भावकी प्रधानता और द्रव्यकी गौणता रहेगी । क्योंकि—क्रिया-साध्य होती है, और कारक जो द्रव्य है, वे उसके साधनके लिए होते है । इस उपरि लिखित व्याख्यानसे वाक्यमें आख्यातकी प्रधानता सिद्ध हुई । आख्यातमें भावकी अवस्था । (नि०) पूर्वापरीभूतं भावमाख्यातेनाचष्टे । व्रजति-पचति--इत्युपक्रमप्रभृत्यपवर्गपर्यन्तम् । भावकी दो अवस्था होती है, एक साध्यावस्था जो उसके बनते हुएकी असम्पूर्ण अवस्था कही जा सकती है । दूसरी सिद्धावस्था होती है, जिसको उसकी सम्पूर्ण होनेकी अवस्था कह सकते हैं । इनमें भावकी पहिली अवस्था आख्यातसे कही जाती या प्रतीत होती है । शब्द और अर्थका जो सम्बन्ध है, वह लोक व्यवहारसे ही