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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त । ३१ ग्रहण किया जाता है। क्योंकि मनुष्य लोकमे रहकर लोकही से शिक्षा प्राप्त कर सकता है। इसलिए यहां भावकी अवस्था दिख- लानेके लिए भी लोकही अवलम्बनीय है। आख्यात नाम 'पचति-पठति' इत्यादि तिङन्त पदोंका है। भाषामें इनकी जगह 'पकाता है-पढ़ता है' इत्यादि धर सकते हैं। इन पदोंका स्वभाव है कि—जबसे क्रियाका आरम्भ होता है, वहांसे लेकर उसकी समाप्ति तक जो अवस्था है, वह आख्यात पदसे प्रका- शित की जाती है। उदाहरण में हम 'गङ्गां व्रजति' यह वाक्य रखते हैं। जिसका अर्थ 'गङ्गाको जाता है-यह होता है। यहां पर 'व्रजति' से जो क्रिया प्रतीत होती है, उसको गमन कहते हैं। इस गमन क्रियाका आरम्भ जूतीके पहिननेसे होता है, अर्थात् जूती का पहिनना, आगे पीछे पैरोका धरना, मार्गमे भोजन करना, सोना, बैठना तथा जलपान करना आदि क्रियाओमे गमन ही व्याप्त हुआ दिखाई देता है, जब तक वह गङ्गा तक पहुंचे। अर्थात् चलते, बैठते, खाते, पीते हुए भी पूछते है कि क्या करता है, तो उसका यही उत्तर मिलता है, कि—गङ्गाको जाता है। सार यह निकला कि—घरसे गङ्गातक जितनी क्रिया देवदत्तके शरीरमें होती हैं, उन सभीमे गमन क्रिया व्यापक रूपसे प्रतीत होती है। जब वह गङ्गाके ऊपर पहुँच जाता है, तब वह गमन क्रिया सम्पूर्ण हो जाती है। उस अवस्थामें यदि पूछा जाय तो 'व्रजति' इस पदसे उत्तर नहीं दिया जायगा, किन्तु 'गतः-प्राप्तः' इत्यादि पदोंसे ही उत्तर दिया जायगा। क्योकि-अब वह गमन करता नहीं किन्तु कर चुका। इसीसे स्पष्ट होता है कि—आख्यात पद क्रिया की साध्यवस्थाको ही कथन करता है। ऐसे ही पचन तथा पठन क्रियाओंका भी आरम्भ और समाप्ति एवम्, आख्यातके वाच्यार्थ को निर्णय करना होगा।

३२ अ० १ पा० १ ख० १ । अन्त्य क्रियासे भावकी सिद्धि। यहांपर ऐसी आपत्ति उठाई जा सकती है कि जब हम अन्त्य क्रियाके पास ही भावकी सिद्धिको देखते है, तो क्यो नहीं अन्तकी क्रिया ही आख्यातका वाच्य समझा जाय ? यद्यपि जिस पदविहरणसे देवदत्त गङ्गाके तटपर पहुंचता है, ठीक उसी पदविहरण ( पैंड ) पर भावकी सिद्धि प्रतीत होती है, तथापि जिस क्रियासे गङ्गाके तटपर पहुंचता है, यदि उससे पहलेकी क्रियाएं न हो तो उसीका होना असम्भव है, इसीलिए गृहके त्याग और गङ्गाकी प्राप्ति तक जितनी क्रिया है, सभीमें गमन की व्याप्ति माननी होगी । इसके अतिरिक्त गृह और गङ्गाके मध्य देशमें खान, पान आदि क्रियाओके समय भी 'किङ्करोति' का उत्तर 'गङ्गां व्रजति' यही मिलता है जब कि अन्त्यक्रियाका जन्म भी नही है, तो किस प्रकारसे अन्त्य क्रियाको ही आख्यातका वाच्य कह सकते है। तात्पर्य यह है कि-आरम्भ से जितनी क्रियाए होती हैं, उनसे कुछ २ भाव सिद्ध होता रहता है, किन्तु उसकी पूर्त्ति अन्त्य-क्रिया ही में होती है, इससे वह अन्त्यक्रियासे ही सिद्ध हुआ प्रतीत होता है किन्तु वास्तव में उन सभी क्रियाओंमे जो आरम्भसे अन्ततक होती हैं, भावकी सिद्धि होती है। यद्यपि वृक्षका पूर्ण स्वरूप फलपाक पर ही प्रतीत होता है किन्तु अङ्कुरसे आदि लेकर उसकी जितनी अवस्था हो चुकी है सभीकी कारणता माननी होगी । वही प्रकार इस प्रकरण मे है। प्रसिद्धिसे भावकी अनेक क्रियाश्रितता। मार्ग के मध्यमे जाते हुए किसी मनुष्यको देखो कि-वह गमन के कुछ भागको कर चुका है, कुछ कर रहा है, और कुछको करेगा, किन्तु कहनेवाले उन भूत भविष्यत् तथा वर्तमान क्रियाओ को एक

हिन्दी निरुक्त । २५ अपि च—यदि आख्यातमें सर्वत्र भाव—प्रधानता ही होती तो पाणिनि मुनि उक्त सूत्रमें कर्त्ता और कर्मके अतिरिक्त भावमें लकारको क्यो विधान करते ? यद्यपि यहां एक आपत्ति और हो सकती है। वह यह है कि—आख्यातकी द्रव्य—प्रधानता शब्दानुशासन तक है, फिर अपना कार्य करके लोकव्यवहारमें शब्दके आनेसे पहले ही वह लय हो जाती है ? तथापि उसके लिये यह कहा जा सकता है कि—वह पीछे किस कारणसे लय हो जाती है, और उसके लय होने मे क्या प्रमाण है ? यदि कोई प्रमाण तुम्हारे पास अनिवार्य होता तो प्रथमान्त- विशेष्यक शाब्दबोध माननेवाले नैयायिक तुमसे अलग क्यों होते ? इससे सार यह निकला कि—आख्यात हो या नाम जहां भाव-वाचक प्रत्यय होगा, वही भाव-प्रधानता है, अन्यत्र नही । जैसे—'देवदत्तेन भूयते' एध्यते, 'ओदनेन पच्यते, कृतिः भूतिः भवनम्, भावः, पाचकता, पाठकता इत्यादि । उत्तर—यह ठीक है कि—आख्यातपद भाव, क्रिया, काल और संख्याके समान द्रव्यका वाचक भी होता है, तथापि उन सब अर्थोंमें भावकी ही प्रधानता रहती है, इसके लिये विशेष प्रत्ययाधान आदि बहुत युक्तियां दी जाचुकी हैं, इसलिए यहां अन्य विस्तारकी उपेक्षा की जाती है । प्रकृत्यर्थकी प्रधानता । और प्रत्ययार्थकी अप्रधानता । आख्यातके चार विभाग हैं, कर्तृ-वाचक, कर्म-वाचक, भाव्- ४

२६ अ० १ पा० १ ख० १ । वाचक और कर्म-कर्तृ-वाचक । जैसे—कर्तृ० 'पचति', कर्म० 'पच्यते', भाव० 'भूयते', और क० क० 'पच्यते-स्वयमेव' । इन चारों आख्यातोंमें अवयव या प्रत्यय (तिप् आदि) के अर्थ द्रव्य हैं, वे अप्रधान हैं, और प्रकृति जो धातु (पच आदि) है, उसका अर्थ (क्रिया) प्रधान है। उसका अभिधान करनेसे यह आख्यात कहाता है अर्थात् प्रधानोभूत क्रिया ही इसका लक्षण है । अथ नामलक्षणम् । (संगति) आचार्यने चारो पदोंकी गणनाके समय 'नामाख्याते' इस पदमे व्याकरणके नियमके अनुरोधसे आख्यातकी अपेक्षा नामकी गणना पहिले की है, किन्तु लक्षणका क्रम उत्पत्तिके क्रमानुसार किया है, उत्पत्तिमे आख्यात पहिले है, और नाम आख्यातसे उत्पन्न होनेके कारण उससे पीछे है। इसी उत्पत्ति के क्रमके अनुरोधसे गणनाक्रमको भङ्ग करके आख्यातके लक्षणके अनन्तर नामका लक्षण किया । लक्षण । (नि०) “सत्वप्रधानानि नामानि” लिङ्ग और संख्यावाले पदार्थको द्रव्य या सत्व कहते हैं, जिस पदमें द्रव्य प्रधानतासे कहा जावे, और क्रिया गौणभावसे वह 'नाम' कहाता है । नाम शब्दकी व्युत्पत्ति । (क) नमन्ति आख्यातशब्दे गुण- भावेन यानि, तानि नामानि । जहां वाक्यमे नाम और आख्यात दोनों इकट्ठे होते हैं,

हिन्दी निरुक्त । २७ वहां नाम पद गौण होकर आख्यात पदसे झुक जाते हैं, इसीसे ये नाम कहाते हैं । ( ख ) नमन्ति स्वमर्थम् आख्यातशब्द- वाच्येगुणभावेन इति नामानि आख्यातके क्रियारूप अर्थमे अपने अर्थको गौण भावसे झुका देते हैं, इससे ये नाम कहाते है । जिस प्रकार आख्यातमें रहता हुआ भी द्रव्य इच्छासे छोड़ दिया जाता है, उसी प्रकार नाममे रहती हुई भी क्रिया गणना नहीं की जाती । क्योकि नाम पदकी द्रव्यमे परता या अभि निवेश होता है इसीसे उसमे जो क्रिया रहती है वह अपने विकार से उत्पन्न होनेवाले नामार्थको बताकर वहांसे हट जाती है। मानों 'पाचक' शब्दमे जो पाकक्रिया प्रतीत होती है, वह जन समुदायमे पाचक पुरुषकी पहिचान कराके फिर वहांसे चली जाती है। इसी कार्यके लिए उसका वहां निवास था। जब उस द्रव्यका पता चल गया तो फिर वहां वह अपना प्रयोजन नहीं देखती । नाममें क्रियाका रहना । नाम पदमें तीन भाग होते है,—प्रकृति, (धातु) प्रत्यय (अ क आदि) और विभक्ति (प्रथमा आदि) जैसे—'पाचक:' इस- में पच् (धा०) अक (प्र०) और विसर्ग (:) विभक्ति है। यहां प्रकृति और धातु एक ही बात है। धातु क्रियाका वाचक होता है, और वह नाममें विद्यमान है, इससे उसकी वाच्य क्रिया भी वहां होनी चाहिए। जैसे कि—जहां जो अर्थ है, वहां उसका वाचक शब्द भी अवश्य रहता है।

२८ अ० १ पा० १ ख० १ । जहां शब्द है वहां उसका वाच्य अर्थ है, क्यों कि—शब्द और अर्थ दोनों वाच्य-वाचक।सम्बन्धसे नित्य सम्बन्धी हैं, इस रीति से सिद्ध हुआ कि नाम में क्रिया है। नाममें रहती हुई भी क्रियाको अविवक्षा । नाममें जो धातु रहता है, उसकी क्रियाको कहनेकी शक्ति कृत् प्रत्ययसे बने हुए प्रातिपदिकसे तिरस्कृत हो जाती है। अर्थात् उसकी वृत्ति प्रातिपदिकके भीतर हो लय हो जाती है, ऐसी अवस्थामें अपने अर्थको प्रगट करनेमें असमर्थ होकर प्रातिपदिक- के अर्थका ही अनुसरण करता है। इस लिए वह द्रव्यप्रधान ही हो जाता है, और क्रियाकी विवक्षा नही रहती। यह भाव है कि—जिस समयमें नामका विग्रह करते हैं, उस समय धातु प्रातिपदिकके बन्धनसे मुक्त होकर द्रव्यमे रहते हुए अपने अर्थ को प्रकाशित करता है, किन्तु विग्रहसे पहिले नहीं, यही नाम शब्दकी द्रव्यपरता है। जिस प्रकार राजाकी शासन शक्ति परराष्ट्र- में तिरस्कृत हो जाती है और उसकी सीमासे बाहिर होते ही उसकी शक्तिका उद्दीपन हो जाता है, वैसेही नामके भीतर आये हुए धातुकी शक्तिका वृत्त है। आख्यातमें क्रिया और नाममें द्रव्यका राज्य है। श्लोकोंमें नामके लक्षण । शब्देनोच्चारितेनेह, येन द्रव्यं प्रतीयते । तदक्षरविधौ युक्तं, नामेत्याहुर्मनीषिणः ॥ १ ॥ अष्टौ यत्र प्रयुज्यन्ते, नानार्थेषु विभक्तयः । तन्नाम कवयः प्राहु, र्भेदे वचनलिङ्गयोः ॥ २ ॥

हिन्दी निरुक्त । २६ निर्देशः कर्म करणं, प्रदानमपकर्षणम् । स्वाम्यर्थोऽप्यधिकरणं, विभक्त्यर्थाः प्रकीर्त्तिताः ॥३॥ १—लक्षण, जिस शब्दके उच्चारण करनेसे द्रव्य प्रतीत हो, उस को शब्दशास्त्रमें नाम कहते हैं । २—लक्षण, जिस शब्दमे भिन्न २ अर्थोंमें ८ विभक्तियां होती हों और वचन तथा लिङ्गका भेद हो, उसको नाम कहते है । विभक्तियोंके अर्थ । १ माका, शब्द निर्देश, २ याका कर्मकारक, ३ याका कर्तृ और करण कारक, ४ र्थीका सम्प्रदान कारक, ५ मीका अपादान कारक, ६ ष्ठीका स्वामिभाव आदि सम्बन्ध और ७ मीका अधिकरण कारक अर्थ है। 'नामानि' बहुवचनका कारण । "सत्त्वप्रधानानि नामानि" इस नाम लक्षणमें "क्रियाप्रधान माख्यातम्" इस लक्षणमें 'आख्यातम्' पदके समान नामानि' के स्थानमें 'नाम' यह एक वचन ही देना चाहिये था, तथापि बहुव- चन करनेका प्रयोजन यह है कि-कही निपात और उपसर्गोंमें भी स्त्रीलिङ्ग, पुलिङ्ग, नपुंसक लिङ्गोंका भेद देखा जाता है, इसलिए उनका भी नामोंमें संग्रह करनेके लिए बहुवचन दिया है । अन्य आचार्योंके मतमें नाम और आख्यातके अर्थोंका भेद । कोई आचार्य नाम और आख्यातके अर्थोंका भेद इस प्रकारसे करते हैं, कि—भाव, काल, कारक और संख्या ये चार अर्थ आख्या- तके हैं, और उनमें भावकी प्रधानता है, इसीसे आख्यातको भाव प्रधान कहते हैं। एवम् नामके भी सत्ता, द्रव्य, संख्या और लिङ्ग ये चार अर्थ होते हैं। और उनमें द्रव्य प्रधान होता है, इसीसे नाम सत्वप्रधाने कहे जाते हैं।

३० अ० १ पा० १ ख० १ । नाम और आख्यातके समुदायमें भावकी प्रधानता । (नि०) । तद्यत्रोभे भावप्रधाने भवतः । जहाँपर नाम और आख्यात दोनों इकट्ठे होजाते हैं, वहां भाव- की ही प्रधानता रहती है। यद्यपि स्वतन्त्रताकी अवस्थामें एक भावप्रधान और दूसरा द्रव्यप्रधान है, तथापि वह प्रधानता एक पदके विचार तक ही रहती है, लोक तथा वेदमें इनसे जब कार्य निकलता है, तो दोनोंके मेलसे ही निकलता है, अर्थात् व्यवहार स्थलमे इनम से एकके बिना एक नहीं रहता है, सुतराम्, दोनोंको परस्परकी अत्यन्त अपेक्षा बनी रहती है। जैसे—व्यवहारमें 'पचति' से भी कुछ प्रयोजन नहीं मालूम होता, और ऐसे ही एक 'देवदत्तः' पदसे भी। इससे ये दोनों जहां इकट्ठे रहेंगे, वहां, अर्थात् वाक्यमे भावकी प्रधानता और द्रव्यकी गौणता रहेगी। क्योंकि—क्रिया-साध्य होती है, और कारक जो द्रव्य है, वे उसके साधनके लिए होते है। इस उपरि लिखित व्याख्यानसे वाक्यमें आख्यातकी प्रधानता सिद्ध हुई। आख्यातमें भावकी अवस्था । (नि०) पूर्वापरीभूतं भावमाख्यातेनाचष्टे । ब्रजति-पचति--इत्युपक्रमप्रभृत्यपवर्गपर्यन्तम् । भावकी दो अवस्था होती हैं, एक साध्यावस्था जो उसके बनते हुएकी असम्पूर्ण अवस्था कही जा सकती है। दूसरी सिद्धावस्था होती है, जिसको उसकी सम्पूर्ण होनेकी अबस्था कह सकते हैं। इनमें भावकी पहिली अवस्था आख्यातसे कही जाती या प्रतीत होती है। शब्द और अर्थका जो सम्बन्ध है, वह लोक व्यवहारसे ही

हिन्दी निरुक्त । ३१ ग्रहण किया जाता है। क्योंकि मनुष्य लोकमे रहकर लोकही से शिक्षा प्राप्त कर सकता है। इसलिए यहां भावकी अवस्था दिख- लानेके लिए भी लोकही अवलम्बनीय है। आख्यात नाम 'पचति-पठति' इत्यादि तिङन्त पदोंका है। भाषामें इनकी जगह 'पकाता है-पढता है' इत्यादि धर सकते है। इन पदोंका स्वभाव है कि—जबसे क्रियाका आरम्भ होता है, वहांसे लेकर उसकी समाप्ति तक जो अवस्था है, वह आख्यात पदसे प्रका- शित की जाती है। उदाहरण मे हम 'गङ्गां व्रजति' यह वाक्य रखते है। जिसका अर्थ 'गङ्गाको जाता है-यह होता है। यहां पर 'व्रजति' से जो क्रिया प्रतीत होती है, उसको गमन कहते हैं। इस गमन क्रियाका आरम्भ जूतीके पहिननेसे होता है, अर्थात् जूतो का पहिनना, आगे पीछे पैरोंका धरना, मार्गमें भोजन करना, सोना, बैठना तथा जलपान करना आदि क्रियाओमें गमन ही व्याप्त हुआ दिखाई देता है, जब तक वह गङ्गा तक पहुंचे। अर्थात् चलते, बैठते, खाते, पीते हुए भी पूछते हैं कि क्या करता है, तो उसका यहो उत्तर मिलता है, कि—गङ्गाको जाता है। सार यह निकला कि—घरसे गङ्गातक जितनी क्रिया देवदत्तके शरीरमें होती है, उन सभीमे गमन क्रिया व्यापक रूपसे प्रतीत होती है। जब वह गङ्गाके ऊपर पहुँच जाता है, तब वह गमन क्रिया सम्पूर्ण हो जाती है। उस अवस्थामें यदि पूछा जाय तो 'व्रजति' इस पदसे उत्तर नहीं दिया जायगा, किन्तु 'गतः-प्राप्तः' इत्यादि पदोंसे ही उत्तर दिया जायगा। क्योंकि-अब वह गमन करता नहीं किन्तु कर चुका। इसीसे स्पष्ट होता है कि—आख्यात पद क्रिया की साध्यावस्थाको ही कथन करता है। ऐसे ही पचन तथा पठन क्रियाओंका भी आरम्भ और समाप्ति एवम्, आख्यातके वाच्यार्थ को निर्णय करना होगा।

३२ अ० १ पा० १ ख० १ । अन्त्य क्रियासे भावकी सिद्धि । यहांपर ऐसी आपत्ति उठाई जा सकती है कि जब हम अन्त्य क्रियाके पास ही भावकी सिद्धिको देखते हैं, तो क्यों नहीं अन्तकी क्रिया ही आख्यातका वाच्य समझा जाय ? यद्यपि जिस पदविहरणसे देवदत्त गङ्गाके तटपर पहुंचता है, ठीक उसी पदविहरण (पैड) पर भावकी सिद्धि प्रतीत होती है, तथापि जिस क्रियासे गङ्गाके तटपर पहुंचता है, यदि उससे पहलेकी क्रियाएं न हों तो उसीका होना असम्भव हैं, इसीलिए गृहके त्याग और गङ्गाकी प्राप्ति तक जितनी क्रिया है, सभीमें गमन की व्याप्ति माननी होगी। इसके अतिरिक्त गृह और गङ्गाके मध्य देशमें खान, पान आदि क्रियाओके समय भी 'किङ्करोति' का उत्तर 'गङ्गां व्रजति' यही मिलता है जब कि अन्त्यक्रियाका जन्म भी नहीं है, तो किस प्रकारसे अन्त्य क्रियाको ही आख्यातका वाच्य कह सकते है । तात्पर्य यह है कि-आरम्भ से जितनी क्रियाए होती हैं, उनसे कुछ २ भाव सिद्ध होता रहता है, किन्तु उसकी पूर्त्ति अन्त्य-क्रिया ही में होती है, इससे वह अन्त्यक्रियासे ही सिद्ध हुआ प्रतीत होता है किन्तु वास्तव में उन सभी क्रियाओम्मे जो आरम्भसे अन्ततक होती है, भावकी सिद्धि होती है। यद्यपि वृक्षका पूर्ण स्वरूप फलपाक पर ही प्रतीत होता है किन्तु अङ्कुरसे आदि लेकर उसकी जितनी अवस्था हो चुकी है सभीकी कारणता माननी होगी। वही प्रकार इस प्रकरण मे है। प्रसिद्धिसे भावकी अनेक क्रियाश्रितता । मार्ग के मध्यमें जाते हुए किसी मनुष्यको देखो कि-वह गमन के कुछ भागको कर चुका है, कुछ कर रहा है, और कुछको करेगा, किन्तु कहनेवाले उन भूत भविष्यत् तथा वर्तमान क्रियाओं को एक

, हिन्दी निबन्ध । ४१ ऐसी स्थितिमें नाम, आख्यात, निपात और उपसर्ग चारों ही एकसाथ वर्तमान रहते हैं इसलिए उनकी गणना जो हमारे मतमें है युक्ति-सम्पन्न है । इस मतमें शब्द नित्य है इससे उसकी उत्पत्ति नहीं होती, अभि- व्यक्ति (प्रकटता) होती है, जैसे—नवीन मृन्मय पात्रमें जलके योग से गन्ध और निर्वात देशमें व्यजनके हिलानेसे वायु प्रकट होता है, किन्तु उत्पन्न नहीं, ऐसे ही वायुके ताल्वाद्यभिघातसे शब्द व्यक्त होता है उत्पन्न नहीं । सुतराम्, पदकी चतुष्ट्व संख्याकी उपपत्ति इस मतमें अच्छी रीतिसे होजाती है । । गोविषाणके दृष्टान्तसे परस्पर पदोंके गौणमुख्यभावका आक्षेप भी ठीक नहीं है, क्योकि एककालम उत्पन्न होनेवाले मन्त्रिपुत्र और राजपुत्रका गौणमुख्यभाव देखा जाता है अतः नामकी आख्यातमें गौणता और उसकी उसमें मुख्यता युक्ति संगत है । शास्त्रकृत योग, जो धातु उपसर्ग तथा आगम, आदेश आदिका परस्पर सम्बन्ध है वह पहिले अयुक्त ठहराया गया है, सोभी ठीक नहीं हैं क्योंकि इस सिद्धान्तके अनुसार पुरुषके अन्तःकरणमें शब्द और उसका अभिधेय (वाच्य) तथा सम्बन्ध ये तीनों बुद्धि रूपसे स्थित रहते है, उन्हीं बुद्धिमय शब्दोंमें व्याकरणके बताये हुए सब विकार होते है, और वास्तविक शब्दोंमें आरोप किये जाते हैं, जब पुरुष किसी अर्थको दूसरेके लिए प्रकाशित करना चाहता है, उस समय उस अर्थके वाचक शब्दको अभिव्यक्तिके लिए अपने आत्माके गुणभूत प्रयत्नसे नाभिदेशसे वायुको प्रेरित करता है, वह वायु उठकर वक्षःस्थल आदि देशमें टकराता हुआ मुखके द्वारसे बाहर आता है, भीतरसे बाहर आनेके ६

४२ अ० १ पा० १ सू० २ । समय प्रकाशनीय शब्दके अक्षरोंके क्रमसे वहीं वहीं जाकर लगता है। जहांसे इसके अक्षर प्रकट होते हों, इसी रीतिसे वायुके साथ वक्ताका अभीष्ट शब्द उसके मुखसे बाहर निकल कर श्रोताके श्रोत्रेन्द्रियमें प्रवेश कर उसके आत्मामें भावनारूपसे जो वैसा शब्द स्थित है, उसको स्मृतिपथमें ले आकर उसका अर्थ श्रोता को प्रतीत होते ही अन्तर्धान हो जाता है, यदि शब्दकी पूर्णरूप में स्थिति न होती तो “घट मानय” आदि वाक्यकं श्रवणसे जो श्रोता घट ले आता है, वैसा क्यों होता ? ऐसा होनेसे ही शब्दों की गणना उनके परस्पर गौण मुख्य व्यवहार तथा धातुओंसे उपसर्गों वा प्रत्ययोंके योग और उनको आगम आदेश आदि विकार होते हैं, बुद्धिके द्वारा उन उन शब्दोंमें मानना सिद्ध होता है। शब्दके अनित्यत्वपक्षमें समाधान । अनित्यत्व पक्षमें भी पुरुषके प्रयत्नसे उत्पन्न होकर दूसरे को अर्थज्ञान कराके शब्दकी व्यक्तियोंका ही ध्वंस (नाश) होता है, किन्तु उनकी आकृति विद्यमान रहती हैं, वे अपनी अभिधान शक्तिसे बुद्धिके द्वारा अवस्थित होकर अपने अर्थोंको प्रकाशित करती हुईं स्थित ही रहती हैं। उनमें साक्षात् पदों की संख्या रहती है और वही संख्या विनाशिनी व्यक्तियोंमें लक्षणसे मान ली जाती है। इस लिए शब्दके व्याप्तिमान् होने से पद चतुष्ट्वादि सब समीचीन हैं। और वस्तुओंसे शब्दका प्रयोजन नहीं होता। (नि०) अणीयस्त्वाच्च शब्देन संञ्जाकरणं व्यवहारार्थं लोके । शब्दके समान चिन्ह, या इशारे भी अर्थके जनानेमें काम

हिन्दी निरुक्त । ४३ दे सकते हैं, किन्तु शब्द एक ऐसा सूक्ष्म साधन है, जिसके द्वारा थोड़ी देरमें बहुत कुछ समझाया जा सकता है, किन्तु चिन्हों या अभिनयोंमें बड़ा क्लेश तथा गौरव है, इस लिये शब्दके द्वारा वेद शास्त्रके अध्ययन गौरवका आक्षेप निर्मूल है, शब्दके द्वारा जितना और जो कुछ जाना जा सक्ता है और किसी उपाय से भी नहीं, इससे अन्य अन्य उपायोंका भी इसके साथ खण्डन हो गया। वेद और शास्त्रोंके अध्ययनसे ही अभ्युदय (आत्मोन्नति) हो सकता है, उसीके लिये शास्त्रके आरम्भमें यत्न किया जाता है। इन्हीं शब्दोंसे देवताओंके साथ व्यवहार। (नि०) तेषां मनुष्यवद्देवताभिधानम् । यही पद जो नाम आदि भेदसे चार प्रकारके हैं, मनुष्योंके समान देवताओके भी अभिधानमें समर्थ हैं, अर्थात् वेदमें देव- ताओंके अर्थ जो हविः दी जाती है, या उनसे कुछ प्रार्थना की जाती है, तो इन्हीं शब्दोंके द्वारा होती है। मन्त्रोंका प्रयोजन । (नि०) पुरुषविद्यानित्यत्वात्कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे । वेदमें मन्त्रोंका समाम्नान इसलिये किया गया कि—यदि मनुष्य स्वतन्त्रतासे इन शब्दोंके द्वारा यज्ञमें हविके दान आदि करनेको देवताओंसे व्यवहार करेंगे तो अपने अशिक्षितत्व मन्दशिक्षितत्व तथा विस्मरणशीलत्व दोषसे नाम आख्यात आदिकोंका यथावत् प्रयोग न करेंगे और देवताओंके अपराधी बनेंगे, क्योंकि देवता सब अर्थों- को प्रत्यक्ष देखते हैं, वे थोड़े अयुक्त अभिधानको भी सहन न करेंगे, इसकारण उनके यज्ञको त्याग देनेसे कर्म निष्फल होजायगा,

४५ अ० १ पा० १ खं० २ । और मन्त्रोंमें येही नाम आदि पद विशिष्ट परिपाटीसे पढ़े हुये हैं, उनके द्वारा कर्म करनेसे भूलनेकी त्रुटि नहीं होगी, इसी कर्म-सम्पत्ति- के लिए वेदमें मन्त्र संमाम्नात हुए हैं। नामादिकोंके व्याख्यानका प्रयोजन । सार यह है कि—इन्हीं चारों पदोंसे मन्त्र व्याप्त हैं, अर्थात् पद चतुष्टयही परिपाटी विशेषसे पढे हुवे मन्त्र कहाते हैं, इससे इनके ज्ञान द्वारा मन्त्रार्थका ज्ञान होसकता है। इसीलिए हमने इनका लक्षण उदाहरण द्वारा बोध कराना आरम्भ किया है। लक्षणकी आवश्यकता । यदि लक्षणका अनादर कर शब्दोंकी गणना कीजावे तो उनके अनन्त होनेसे वह हो न सकेगी और न ग्रन्थही पूर्ण होसकता है, तथा अध्येताकी शक्ति भी क्षय होजायगी, विद्वानोंने पदार्थोंके लक्षण द्वाराही उनका अन्त प्राप्त कियाहै। अतः हम भी उक्त प्रयो- जनके लिए लक्षणका अवलम्बन करते हैं। भावके सामान्य व विशेषरूपके दिखानेके अनन्तर पदकी अनि- त्यतासे उठे हुए प्रश्न तथा अन्य २ जो कुछ दिखाया गयाहै, वह प्रसङ्गवशसे कहागयाहै, अब फिर भावके सम्बन्धमें ही जो रहगया है उसे दिखाते हैं। भावके दो रूप हैं एक कार्य और दूसरा कारण । अब तक भावके सम्बन्धको लेकर जो दिखाया गयाहै, वह कार्य भावका है, अर्थात् क्रियासे बननेवाला वस्तु भावहै, अथवा क्रियाही भावहै। अब कारणस्वरूप भावका निरूपण किया जाताहै । प्रलयकालमें जब पुरुषोंके सुख-दुःखके उपभोगका प्रवाह बन्ध होजाता है, तब क्रिया और द्रव्य अपने २ विशेषोंको त्यागकर, कार्यात्मतासे अतीत (पार) होकर एक अविशिष्टरूपसे स्थित होजाते हैं, जिसको हम सत्तामात्रसे सम्बन्ध रखनेवाला आत्म-भाव

कह सकते हैं। अर्थात् अत्यन्त अविनाशधर्मवाला आत्मांही भाव पदार्थ है। इस कारण भूतभावका प्रसङ्ग यहां पर इसलिए आया कि— जगत्के स्थितिकालमें इसी भावके विकार द्रव्य, गुण, तथा कर्म- के रूपमें होकर नाम, आख्यात उपसर्ग और निपात इन चतु- र्विध पदोंसे बोले जाते हैं; और स्वयम् वह भी (भाव) सब विशेषोंसे रहित तथा होने मात्र (सत्तामात्र) क्रियासे सम्बन्ध रखता हुआ उपपद रहित 'भवति' एवम् 'भावः' इन दोनोंसे बोला जाताहैं ! अर्थात् कारण भावके वाचक ये दो पद हैं, और कार्य भावके 'पचति-पठति-गौः-अश्वः' इत्यादि सम्पूर्ण पद। इस प्रकार 'भवति' और 'भावः' इन दोनोंकी वृत्तिके विवेचनार्थ ही उक्त भाव- का प्रसङ्ग लाया गया है। पूर्वपक्ष। सांख्याचार्य कहते हैं कि—जो तुमने कारणभूत भाव बताया है, वह हमारा प्रधान या मूल प्रकृति है, किन्तु आत्मा नहीं ? खण्डन। प्रधान या प्रकृति भी उस भावका विकार ही है, किन्तु भाव नहीं, क्योंकि वह प्रधान-भाव नामसे बोला जाताहै, जिस वस्तुके बतानेके लिए 'भाव' पदके साथ विशेषण जोड़ा जायगा, वह भाव नहीं, भावका विकार ही रहेगा। कोई सांख्य कहते हैं कि—वह भाव पुरुष है, किन्तु पुरुष इस लिए नहीं कहा जा सकता कि—उनके मतमें उसमें कोई शक्ति स्वीकार नहीं की जाती अर्थात् वह 'प्रकृति-विकृति'-भाव-शून्य है। और हमारे भावमें शक्ति है, जिसके कारण उससे सब जगत उत्पन्न होता है। इसी रीतिके अनुसार ईश्वर तथा परमाणु आदि वस्तुओंको

४६ अ० १ पा० १ ख० २ । भाव बताने वाले भी अपना पक्ष हार गये, क्योंकि—उनके अभिमत पदार्थ 'ईश्वर-भाव' तथा परमाणु-भाव' आदि शब्दोंसे बोले जातेहैं। कोई उस भावको शून्यरूप बताते हैं, किन्तु उनका कहना भी ठीक नहीं, जिससे कि, शून्य शब्दमें भी भाव शब्दका सम्बन्ध आजाता है। प्रयोजन यह है कि, अर्थके बिना कोई शब्द बोला नहीं जाता, शब्द अपने अर्थके साथ सम्बद्ध रहता है, जैसे कि— 'कुछ वह है ? जो शून्य है'। क्यों कि लोकमें भी ऐसा प्रसिद्ध है—'गृहं-शून्यम्' 'ग्रामः शून्यः' 'शून्यशब्द-महत्वे' । इससे यह नहीं कहा जा सकता कि 'शून्य' शब्द अभाव ही को बताता है, किन्तु उसको किसी भावकी अपेक्षा रहती है। फलित यह निकला कि—सब उपपदोंसे रहित जो भवति पद है, उससे जिस भावकी प्रतीति होती है, उसके रूपसे जगत् नित्य है, और अन्य भाव विकार, जो परमाणु आदि हैं, उन सबके रूपमें जगत् अनित्य है। जिस भावमें सत्तामात्रके सम्बन्धसे सभी भाव विकार सदा दूर रहते हैं, उस भावको वेही पुरुष जान सकते हैं, जिन्होंने वेदान्त का रहस्य जान लिया है, एवम् पर अवरके जाननेवाले, आत्मा व वेदके अभिज्ञ, एवं तपः सम्पत्ति आदि अनेक उत्तम गुणोंसे अलङ्कृत तथा आत्मतत्वकी कामनावाले हैं, किन्तु प्रधान आदिके वादमें अभिरत रहनेवाले पुरुषोको ऐसाज्ञान होना असम्भवहै। यह इस सामान्य व विशेष रूपसे शब्दोंके निर्वचन प्रंसगमे कृदन्त भू धातुके वाच्यार्थ बताने को ब्राह्मणोंने वेद रहस्य दिखाया है। वार्ष्यायणि के मतमें भाव विकारोंके भेद। (नि०) “षड्भावविकाराभवन्ति इति वार्ष्यायणिः जायतेऽस्ति विपरिणमते वर्द्धतेऽपक्षीयते विनश्यतीति।”

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“जायते-इतिपूर्वभावस्यादि माचष्टे, नापर भावमाचष्टे. न प्रतिषेधति॑ ।” वार्ष्यायणि आचार्य कहते हैं कि-जैसे-मनुष्य शरीरकी अवस्था बाल्य यौवन तथा वार्द्धक (बुढ़ापा) रुपसे अनेक भागोंमें बटी हुई है, उसी प्रकार भावकी विकारावस्था भी छः भागोंमें बटी हुई है। जब भाव किसी रुपमें विकृत होता है तो उसके हर एक विकारमें जन्म, सत्व, विपरिणाम, वृद्धि, अपक्षय, एवम् विनाश,-ये छः अवस्था होती हैं। इसके उदाहरणार्थ वे सभी वस्तु ली जा सकती हैं; जो जगत्‌में स्थावर तथा जङ्गम किसी 'रुपमें भी उत्पन्न होकर नष्ट होजाती हैं। इन सभी अवस्थाओंका यह स्वभाव है कि-वे अपनेसे पहिले भावकी अवस्थामें अल्प अल्प मात्रामें बनने लगती हैं, और उसके समयके बीतजाने पर अपना पूरा प्रकाश करती हैं। ध्यानसे देखने पर विदित होगा कि घटके बननेके समय उसकी जन्मावस्था होती है, उस समय उसको 'जायते' या 'जन्मता है' ऐसे क्रियापदसे व्यवहार किया जाता है, किन्तु बन चुकनेसे पूर्व उसे 'घट है' इस वाक्यसे नहीं बोलते, यद्यपि कुछ या घट है नहीं, तो उस अवस्थामें 'घट जन्मता है' ऐसा भी किस आधार पर बोल सकते हैं, इस लिए यह मानना होगा कि-उसकी कोई अव्यक्त या अधूरी अवस्था है, वह पूर्ण न होने तक वैसे वाक्य से व्यवहार नहीं किया जायगा, और न उसका निषेध ही कर सकते हैं। इस प्रकार प्रथम भाव विकार और उसके समय दूसरे सत्तारूप भाव-विकारकी वर्तमानता को सूक्ष्म दृष्टिसे देखना चाहिए। दूसरा भाव विकार और उसमें तीसरे भावका आरम्भ। (नि०) अस्तीत्युत्पन्नस्य सत्त्वस्यावधारणम् । जब पहिला भाव विकार या अवस्था पूरी होलेती है, जिसको

४८ अ० १ पा० १ ख० २ । 'जायते' पदसे बोधन किया जाता है; उसके पश्चात् उत्पन्न हुएका सत्तारूप भावविकार आजाता है, उस अवस्था में 'घटः- अस्ति' 'पटः अस्ति' ऐसे व्यवहार होने लगते हैं। अर्थात् उसकी विद्य- मानता अब उक्त पदसे सुप्रकट रूपमें कही जाती है। तथा उसके साथ तीसरा परिणाम भाव विकार क्रमसे बन रहा है। सब पूर्व या अपर भाव अपने कारणमें एक क्षण या सूक्ष्म काल तक बनते रहते हैं, दूसरे क्षणमें अपने पूर्णरूपमें प्रकट होकर रहते हैं और उसके अनन्तर तृतीय क्षणमें लय होजाते हैं। अपर या उत्तर भाव विकार पूर्वभावके स्थिति क्षणमें गर्भमें रहता है, तथा उसके तृतीय क्षणमें आत्मलाभ करलेता है, जो इस अपर भाव- का द्वितीय क्षण कहा जासकता है। यही प्रकार अन्यत्र २ विचारमें रखना होगा। तीसरा भावविकार और उसमें चतुर्थ भावविकारका आरम्भ। (नि०) विपरिणमते इत्यप्रच्यवमानस्य तत्त्वाद्विकारम्। दूसरे भावका तीसरा क्षणहै और प्रथम भावका चतुर्थ। इस समय दूसरा सत्ता भाव जो अस्तिका बोध्यहै, लय होचुका तथा तीसरा परिणाम भाव पूर्णरूपमें प्रकट और 'विपरिणमते' इस आख्यात पदसे कहने योग्यहै। अर्थात् कोई भी वस्तु या शरीर जब एक अवस्थाकी पूरी सत्ता प्राप्त करलेता है, तो उसे अब और बढ़ना चाहिये, किन्तु वह वृद्धि तबतक नहीं होसकती, जबतक कि जो वस्तु अपनी विद्यमान अवस्थाको छोड़ना स्वीकार न करे। मानलो कि—एक बालकका शरीर बढ़ना चाहताहै किन्तु अपनी उस अवस्थाको छोड़ना भी नहीं चाहता, तो यह सर्वथा असम्भव है, जब वह उस अवस्थाको छोड़ेगा, तभी बढ़ेगा, इससे वृद्धिके लिए जो अपनी विद्यमान अवस्थाको छोड़ना है, वही विपरिणाम

• हिन्दी निरुक्त । ४६ . नामवाला तीसरा भावविकार है, इसीके गर्भमें वृद्धिनाम चतुर्थ भावविकार क्रमसे अपनी पूर्तिकी ओर चल रहा है। अर्थात् यह विपरिणाम भाव क्या है ? वृद्धिका अव्यक्तरूप ही है। ⸱ चतुर्थ भावविकार और उसमें पञ्चम भावविकारका आरम्भ। (नि०) वर्द्धते—इति स्वाङ्गाभ्युच्चयं सांयोगिकानां वर्द्धते विजयेनेतिवा, वर्द्धते शरीरेण,-इति वा। अङ्गोंका बढ़ना अथवा बाह्य पदार्थ धनकीर्त्ति आदिका बढ़ना 'वृद्धि' नाम भाव विकार होता है। जिसका उदाहरण अङ्ग वृद्धिमें 'वर्द्धते शरीरेण' शरीरसे बढ़ता है, और बाह्य वृद्धिमें 'वर्द्धते विजयेन' विजयसे बढ़ता हैं—हो सकता है। चतुर्थ भावका दूसरा क्षण है, और तीसरेका विपरिणाम भाव का तीसरा क्षण है, वह लय हो गया, तथा वृद्धिभावकी स्थिति है, इसको 'वर्द्धते' इस आख्यातसे कहा जाता है। इस वृद्धिरूप भाव विकारके स्थिति कालमे पांचवा भाव गर्भमें है, उसके क्षण के पूरे होने तक यह ( अपक्षय ) भाव आत्मलाभमें समर्थ हो जायगा। भाव यह है कि- वृद्धिके साथ अपक्षयके सूत्र भी फैलते जाते हैं, इसीसे वृद्धिका कालगत होते ही अपक्षय (क्षीणता) पूर्णरूपमें प्रकट हो जाता है। पञ्चम भावविकार और उसमें षष्ठभाव विकारका आरम्भ। ( नि० ) अपक्षीयते-इत्येतेनैव व्याख्यातः प्रतिलोमम् । अपक्षयनाम पांचवां भावविकार, ठीक वृद्धिका उलटा रूप है, जिस प्रकार अंगोंके फैलनेसे शरीरकी वृद्धि होती है, वैसे ही अंगोंके ह्रासके साथ शरीरमें अपक्षय नाम भाव विकार होता है। यह अपक्षय विकार क्या है ? विनाशरूप अपर भावका पूर्वरूप. मात्र है। इसी बातको दूसरे रूपमें यों कहा जाता है कि-इस

५४ अ० १ पा० १ खं० २। अपक्षय भाव विकारके स्थिति कालमें विनाशभाव क्रम क्रमसे बनता जाता है, किन्तु अपूर्णताके कारण वह किसी शब्दसे निर्देश नहीं किया जाता। इस पंचम भाव विकारको 'अपक्षीयते' इस आख्यात पदसे बोधन करते हैं। यह पद अपर भाव जो इससे पीछे प्रकट होनेवाला है, उसे न कहता है और न निषेध ही करता है, किन्तु इसकी अर्थ बोधन शक्ति अपक्षयके बोधन करने तक परिमित है। ६ ठा, अपर भाव। (नि०) विनश्यति-इत्यपरभावस्यादिमाचष्टे न पूर्वभावमाचष्टे न प्रतिषेधति। जिस प्रकार जन्म नाम प्रथमभाव विकार उससे पूर्व अन्यभाव विकारके न होनेसे केवल पूर्वभाव विकार कहा जाता है, ऐसे ही विनाशभाव विकारके अनन्तर कोई भावविकार होनेवाला नहीं है, इसीसे यह केवल अपर भावविकार ही है। मध्यके चार सत्ता आदि भावविकार होते हैं, अपनेसे पूर्वके अपर भाव, और परके पूर्वभाव हैं। जब अंगोंका ह्रास या अपक्षयभाव—विकार अपनी मर्यादाको पूरी कर लेता है, तो नाश ही अवशेष रहता है। इस लिये उसके पश्चात् इसीका स्थिति काल है। यह भावविकार 'विन- श्यति' आख्यात पदसे बोला जाता है। हिन्दीमें उस विकारा- वस्थांको 'नाश होता है, इस क्रियासे प्रकाश करते हैं! विशेष तथा स्पष्टी-करण। यद्यपि जिस प्रकार मृत्तिका में घट शराव आदि सभी विकार रहते हैं, उसी प्रकार कारणात्मक भावमें सभी भाव विकार रहते हैं, किन्तु मृत्तिका में घट शराव आदि विकार एकवार ही सब ही