निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
,हिन्दी निरुक्त । ५१ जाते हैं, या पहिले ही घट हो जाता है, या शराव ही। तथा घटके बाद् शराव होता ही नहीं, एवम् यदि होता भी है तो घटके द्वारको उसको कुछ अपेक्षा नहीं किन्तु जो घटका मूल कारण मृत्तिका है,। उसीको अपेक्षा करता है, और घटकी अवस्थामें उसके भीतर वह बनता भी नहीं रहता, ठीक इसके विपरीत यह छः भाव विकार होते हैं। अर्थात् इनमें उत्तर उत्तरकी उत्पत्ति पूर्व पूर्वके द्वारा होती हैं, उत्तर भाव पूर्व भावके होनेसे पहिले नहीं होता, उत्तर भाव पूर्वभावकी अवस्थामे अपूर्णरूपसे क्रम क्रमसे बनता रहता है। इत्यादि। जैसे कारणभावसे पहिले जन्म-भाव- विकार उत्पन्न होता है और उसके द्वारा 'अस्ति' पदसे जाननेयोग्य सत्ता एवम् उसके द्वारा विपरिणाम होता है। क्योकि जो जात (जन्मा) नहीं है, वह 'अस्ति' नहीं कहा जा सकता, और जो विद्य- मान् नहीं वह 'विपरिणमते' नहीं कहा जाता है। सुतराम् छः भाव विकार, घट शराव आदि स्वतन्त्र स्वतन्त्र विकारोंके समान न होकर, परस्परकी अपेक्षा रखनेवाले शृङ्खलाबद्ध होते हैं। इसीसे ये सभी पैदाहोनेवाले प्रत्येक पदार्थमें सबके सब ही होते हैं। अर्थात् घटमें, पटमें तथा शराव आदि सकल जन्यमात्रमें सबमें आते हैं, और शृङ्खलाबद्ध। प्रयोजन यह है कि, होनेवाली प्रत्येक वस्तु कुछ आयु रखती है और उसमें ये छः परिवर्तन उक्त क्रमसे अवश्यम्भावी उन्हीके ये बोधक है—'जायते' 'अस्ति' 'विपरि- णमते' 'वर्धते' 'अपक्षीयते' तथा 'नश्यति' । अन्य भावविकार और उनका अन्तर्भाव । (नि०) अतोऽन्ये भावविकारा एतेषामेव भाव- विकारा भवन्ति—इति हस्माह। ते यथा- वचनमभ्यूहितव्याः ।
५२ अ० १ पा० १ ख० २ । इन छः भावविकारोंके अतिरिक्त और भी बहुत भावविकार हैं, और वे सब परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं, किन्तु उन सबकी उत्पत्ति पूर्वोक्त जन्म आदि छः भावोंसे ही होती है, इससे इनका उन्हींमें अन्तर्भाव होता है। इस कारण पहिले भावविकारोंकी जो गणना की है, वही स्थिर है, उससे न्यून या अधिक नहीं हो सकती । भाव-विकारोंके भेद । 'जनि' धातुका जन्म अर्थ है, यह पहिला भावविकार है, इसके अनेक भेद हैं और उनके वाचक धातु भी अनेक हैं। जैसे—'निष्प- द्यते' 'अभिव्यज्यते' 'उत्तिष्ठति' इत्यादि आख्यातपद निष्पत्ति अभिव्यक्ति तथा उत्थान आदि क्रियाओंके वाचक हैं। ये परस्पर भिन्न होकर भी 'जायते' के अर्थमें सब अन्तर्गत होजाते हैं। ऐसे ही 'अस्ति' के भेद विद्यते (विद्यमानता) भवति (भाव) इत्यादि है। 'विपरिणमते' (विपरिणाम) के भेद 'जीर्यति' (जीर्णता) 'भावान्तर मापद्यते' (भावान्तरापत्ति) इत्यादि । 'वर्धते' (वृद्धि) के 'पुष्यति' (पोषण) 'उपचीयते' (उपचय) और 'अर्थायते' (अर्थ सञ्चय) इत्यादि । 'अपक्षीयते' (अपक्षय) के 'ध्वस्यति' (ध्वंस) और 'भ्रश्यति' (भ्रंश) इत्यादि । तथा 'विनश्यति' (विनाश) के 'म्रियते' (मरण) और 'विलीयते' (विलय) इत्यादि भेद हैं। ये सब भाव विकार जिस प्रकार जिस वचनमें अवस्थित हों, प्रकरण तथा युक्तिसे मन्त्रार्थ के निश्चयके लिए वैसे ही जानने चाहिएँ । •यद्यपि सभी धातु उक्त रीतिसे भाव-विकाररूप क्रियाओंके
· हिन्दी-निरुक्त । ५३ वाचक हैं, इस कारण सबका ही यहाँपर पाठ दिखाना चाहिए था, किन्तु शास्त्रके गौरवके भयसे लक्षणमात्र दिखाया है, इसीसे सब जानने होंगे । इस शास्त्रकी रचनाशैली । इस निरुक्त शास्त्रमें यास्क मुनि जिस बातको दिखाना चाहते हैं, पहिले उसको सूक्ष्म या सामान्य रूपमें कहते हैं, मानों, वह सूत्र है, फिर उसकी वृत्तिके समान संक्षेप व्याख्या और उसकी विस्तृत व्याख्या, जो उसका वार्त्तिकसा होजाता है। इनके क्रमसे 'उद्देश' 'निर्देश' तथा 'प्रतिनिर्देश' यह तीन नाम हैं। इसी रीतिसे सब स्थानोंमें यथासम्भव विभाग जानना चाहिए । उपसर्गका लक्षण । ( अनर्थकत्व-अर्थवत्त्व ) (नि०) न निर्बद्धा उपसर्गा अर्थान्निराहुरिति शाकटायनः नामाख्यातयोस्तु कर्मोपसंयोग-द्योतका भवन्ति इति ॥ शाकटायन आचार्य्य कहते हैं कि—जिस प्रकार वर्ण-पदसे अलग होकर किसी अर्थके वाचक नहीं होते, उसी प्रकार उपसर्ग भी नाम व आख्यात पदोंके समुदायसे पृथक् पद व वाक्यके रूपमें विरचित होकर अर्थके वाचक नहीं होते, सुतराम्, अर्थोंके साक्षात् कथनमें इनकी शक्ति नहीं है, किन्तु आख्यात पदके साथमें लग कर उसके अर्थ विशेषको द्योतन (प्रकाश) करते हैं । व्युत्पत्ति । उपगृह्य आख्यातं तस्यैव अर्थ-विशेषं सृजन्ति ये, ते उपसर्गाः । जिस प्रकार दीपकके संयोगसे घरमें रखे हुए द्रव्योंको नील पीत
५४ • अ० १ पा० १ ख० २ । गुण प्रकाशित करते हैं, और उन द्रव्योंके ही होते हैं, किन्तु दीपक के नहीं होते। उसी प्रकार उपसर्गसे भी धातुके ही अर्थ प्रतीत होते हैं, वे प्रकाशन-मात्रसे उपसर्गके नहीं होते। सर्वथा उपसर्ग स्वतन्त्रतासे अनर्थक ही है। गार्ग्यके मतमें उपसर्गकी अर्थवत्ता। (नि०) उच्चावचाः पदार्था भवन्तीति गार्ग्यः। तद्यएषु पदार्थः प्राहुरिमे तं, नामाख्यातयोरर्थविकरणम् । गार्ग्य आचार्य मानते हैं, कि उपसर्ग, नाम और आख्यातसे पृथक् होकर एकं एक भी बहुत प्रकारके अर्थोंके वाचक होते हैं, क्योंकि—प्र आदि शब्दोंके अतिशय आदि आदि अर्थ देखे जाते हैं ! उपसर्गोंकी अनर्थकतामे वर्णोंका दृष्टान्त भी युक्त नहीं है, क्योंकि वे वर्णोंकी अनर्थकताको अनुभव नहीं करते, प्रत्युत उनमें सामान्यरूप अभिधान शक्ति देखते हैं। जैसे—मृत्तिकाके अवयव 'मिलित होकर सम्पूर्ण (पूरे) भाण्डके बननेमे शक्ति रखते है, उसी प्रकार पदरूपसे समुदित हुए वर्णोंकी अर्थाभिधानमें शक्ति प्रकट होती है। सामान्य शक्ति उसे कहते हैं, जो कि-मिलित पदार्थों के द्वाराही प्रकट हो। जैसे किसी भारी शिलाको अनेक मनुष्य उठा सकते हैं, एक नहीं। यदि उनमें प्रत्येक मनुष्य अशक्त हों, तो मिलित होकर भी वे नहीं उठा सकते। यहां पर मिलित पुरुषोंके द्वाराही 'शिलाका उत्थानरूप कार्य देखा जाताहै, इससे उनकी वह सामान्य शक्ति कही जासकती है। यदि वर्ण अनर्थक होते, तो उनसे बना हुआ पद भी अन- र्थक ही होता। क्योंकि अशुक्ल तन्तुओंसे शुक्ल वस्त्र तैयार नहीं
हिन्दी निरुक्त । ५५ होता । और उन अनर्थक पदोंसे रचित हुआ वाक्य भी अनर्थक ही होता । एवम् अनर्थक वाक्योंसे बना हुआ शास्त्र भी अनर्थक हो होता और इसीप्रकार अभ्युदय तथा मोक्षके लिये विद्वानोंका यह उद्यम भी अनर्थक ही होता । किन्तु यह अनिष्ट है, इसलिए वर्ण अर्थवान् हैं यह मानना होगा । प्रदीप भी अपने प्रकाशरूप अर्थसे अर्थवान्ही है और इस प्रकार- से अर्थवान् होकर भी प्रकाश्य वस्तुको प्रकाशन करता हुआ अपनी प्रकाशन शक्तिको प्रकट करता है । इसी प्रकार उपसर्ग अर्थवान् होकर भी अपनी अनेककी विद्यमान अर्थाभिधान शक्तिको स्वार्था- भिधान शक्तिके आधारभूत नाम और आख्यातको जना करके अभिव्यक्त करेंगे । इसलिए प्रदीपकेसमान "उपसर्ग अनर्थक है" यह कहना अयुक्त है । नाम और आख्यातका ही अर्थ उपसर्गके संयोग होनेपर, प्रतीत होताहै, यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि—लोकमें जो, जिसमें समर्थ है, वह उसमें अन्यकी अपेक्षा नहीं करता । जबकि—नाम और आख्यात अपनी क्रियामें किसी अर्थ-विशेषको जनानेके लिये उपसर्गके संयोगकी अपेक्षा करते हैं, तो अवश्यही क्रिया-विशेष अर्थ उपसर्गका, और क्रियासामान्य अर्थ आख्यातका उपपन्न. होताहै । पहिले यह जो कहा गयाहै कि—"नाम और आख्यातसे अलग रहकर उपसर्ग अनर्थक हैं।" सो ठीक नहीं है । क्योंकि इनका जो अनेक प्रकारका अर्थ है, उसको ये (पद-विशेष, उपसर्ग) अलग होकर भी कहते ही हैं, अर्थात् नाम और आख्यातके अर्थमें जो विकार या विशेष है, वही उपसर्गोंका अर्थ है, उसी अर्थसे ये अर्थवान् हैं, किन्तु अनर्थक नहीं ।
५६ अ० १ पा० १ ख० २ । उपसर्गोंकी अर्थवत्ता जाननेके लिए, उदाहरणार्थ प्रत्येक उपसर्गका एक एक अर्थ । (नि०) आ इत्यर्वागर्थे। प्र-परेत्येतस्य प्रातिलोम्यम् । अभीत्याभिमुख्यम् । प्रतीत्येतस्य प्रातिलो- म्यम् । अति, सु-इत्यभिपूजितार्थे । निर्, दुर्- इत्येतयोः प्रातिलोम्यम् । नि, अव-इतिविनि- ग्रहार्थीयौ । उद्-इत्येतयोः प्रातिलोम्यम् । सम्-इत्येकीभावम् । वि, अप्-इत्येतस्य प्रातिलोम्यम् । अनु-इति सादृश्यापरभावम् । अपि-इति संसर्गम् । उप-इति उपजनम् । परि-इति सर्वतोभावम् । अधि-इत्युपरिभा- वम् । ऐश्वर्यं वा । एव मुच्चावचानर्थान् प्रा- हुस्ते-उपेक्षितव्याः ॥ ५ ॥ प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ १ उपसर्ग- अर्थ- उदाहरण । १ आ अर्वाक् ( इधर ) आपर्वतात् (पर्वतसे इधर) २ { प्र प्रातिलोम्य (आङ् का प्रगतः (उधर चला गया) परा ' उल्टा) परागतः ३ अभि आभिमुख्य(सम्मुखता) अभिगतः ( सम्मुख गया ) ४ प्रति प्रातिलोम्य प्रतिगतः ( विपरीत गया ) ५ { अति अभिपूजित अतिधनः सु सुब्राह्मणः
हिन्दी निरुक्त । ५७ ६ { निर् दुर् } निन्दा निर्धन दुष्टधन । दुर्ब्राह्मण=दुष्ट ब्राह्मण । ७ { नि अव } विनिग्रह { निगृह्णाति=शासन करताहै अवगृह्णाति=रोकता है । ८ उद् इन दोनों (नि० अव) का प्रातिलोम्य उद्गृह्णाति=उद्धारकरताहै । ९ सम् एकीभाव संगृह्णाति=संग्रह करताहै । १० { वि अप } प्रातिलोम्य विगृह्णाति अपगृह्णाति (विग्रह करताहै) ११ अनु { (१) सादृश्य (२) अपरभाव } { अनुरूपमस्येदम् अनुगच्छति १२ अपि संसर्ग { सर्पिषोऽपि स्यात् मधुनोऽपि स्यात् १३ उप उपजन उपजायते १४ परि सर्वतोभाव परिधावति १५ अधि { १-उपरिभाव २-ऐश्वर्य } { अधितिष्ठति अधिपतिः पहिले कहा है कि—"उपसर्ग नाम और आख्यातके साथ क्रियाके सम्बन्धके द्योतक हैं" यह ठीक नहीं है, क्योंकि—"उप- सर्गाः क्रियायोगे" (अ०-१।४।५६) इस पाणिनीय अनुशासनमे उपसर्गोंका क्रिया पदके साथ ही सम्बन्ध प्रसिद्ध है, किन्तु नामके साथ नहीं, प्रत्युत क्रियाके अंगभाव हो नामोंको भी व्यापन करते हैं । समाप्तः प्रथमः पादः ।
५४ अ० १।पा० २। ख० १। द्वितीय पाद । विशेष बातें । ( १ ) ( सब मन्त्रोंमें दो ऋषि ) (१) इस निरुक्त शास्त्रमें प्रायः हर एक शब्दके उदाहरण मन्त्र दिये जाते हैं। उनमें ऋषिका चिन्तन आवश्यक होता है इस लिये ऋषिके सम्बन्धमें जो विशेष बात है, उसे जान लेना आवश्यक है बीचमें बतानेसे गौरव होनेके कारण आरम्भमें दिखाते हैं। ऐतरेयकरहस्य-ब्राह्मणगे ऋक् यजुः साम एवम् अथर्वं संपूर्ण ही वेदराशिका आदित्यान्तर-पुरुष भगवान् हिरण्यगर्भ ऋषि बताया है। और शौनक ऋषिने प्रत्येक मन्त्रोंके पृथक् पृथक् वशिष्ठादि ऋषि बताये हैं। इसलिये श्रुति और स्मृतिके विरोधस्थलमें श्रुति ही बलवती होती है। ऐसा न्यायके जाननेवाले कहते हैं। एवम् जैमिनी महर्षिने भी (विरोधे त्वनपेक्षं स्यात् [जै० सू० १, ३, ३]) इस सूत्रमें यही बात कही है कि श्रुति और स्मृतिका विरोध होने पर स्मृतिका त्याग हो जाता है; सुतराम् "शौनकका विशेष विधान अनर्थक ही है" यह आपत्ति उपस्थित होती है। इसके समाधानार्थ यह है कि शौनक महर्षिने जो विशेष ऋषि बताये हैं। उसका श्रुतिसे विरोध नहीं, प्रत्युत श्रुतिके अर्थको ही स्मरण किया है। क्योंकि मन्त्रोंके द्रष्टा दोनो ही क्षेत्रज्ञ हैं। एक बुद्धिके देवता रूपसे हिरण्यगर्भ क्षेत्रज्ञ है, जो सम्पूर्ण भूतोंके कर्मविपाक (अदृष्ट)के अनुसार अर्थ व शब्दको दिखलानेवाला है। और उससे दूसरा विशिष्ट कर्मका करनेवाला क्षेत्रज्ञ बुद्धिस्थ होकर देखता है। ऐसी अवस्था में वशिष्ठादिक ऋषि जो मन्त्रोंके देखनेवाले क्षेत्रज्ञ हैं, वे उसी हिरण्यगर्भके दिखाये हुए मन्त्रोंको देखते हैं। इस
हिन्दी निरुक्त । ५६ रीतिसे दोनोंका ही ऋषित्व उपपन्न होता है । अतः मन्त्रके प्रयोगकालमें उक्त दोनों ही ऋषियोंका अनुसन्धान करना अर्थका देनेवाला होता है । जबकि श्रुति और स्मृति दोनोंका सन्धान हो सकता है तो उनके विरोधकी सम्भावना करना अयुक्त है । (२) अपिच—श्रुतिपूर्वक ही स्मरण होता है किन्तु स्वतन्त्र नहीं अर्थात् ऋषियोंने जो श्रवण किया है, उसी को फिर स्मरण किया है । इस लिये स्मृतिमें जो अर्थ आया हुआ है उसको श्रुतिमूलक ही मानना चाहिये । ताण्डकमें रहस्य-ब्राह्मण भी दिखलाता है, कि— “यत्साम्ना स्तोष्यन्स्यात् तत्सामोपधावेत् । यस्यामृचि तामृचम् । यदार्षं तमृषिम्” । अर्थ—जिस ऋचाको जहां सामरूपमें पठनीय कहा है, वहां उस ऋचाको साम ही जानना , जहां ऋचाके रूपमें विनियोग है, वहां उसको ऋचा ही जानना, तथा जहां जिस मन्त्रका जो ऋषि बताया हो, वहां उसी ऋषिका मन्त्र समझकर उसका प्रयोग करना । अर्थात् मन्त्रोंका सामभाव, ऋचाभाव तथा ऋषिका सम्बन्ध परिवर्त्तन होता रहता है, किन्तु सब स्थलोंमें उनका एक ही स्वभाव नियत नहीं है । इस प्रमाणके अनुसार शौनक स्मृतिके कहे हुए ऋषि श्रुति विरुद्ध नहीं प्रत्युत वे श्रुतिमूलक हैं, इस लिये विशेष विशेष ऋषियोंका कथन युक्त तथा आवश्यक है । ( २ ) अन्य देवताके यजनमें अन्य देवताके मन्त्रका विनियोग । सब मन्त्रोंके व्याख्यान करनेके समय उनका ऋषि, छन्द, देवता
१. नैघण्टुक काण्ड (अध्याय १-३): नाम, आख्यात, उपसर्ग, निपात लक्षण व पर्याय शब्द
६० अ० १ पा० २ ख० ११ तथा विनियोग कहा जाता है, ये चारों बातें मन्त्रके निदानस्वरूप हैं, इनके जाननेसे मनुष्यको मन्त्रका व्याख्यान श्रवणसे पहिले विदित हो जाता है कि—कौन वक्ता है कौन श्रोता है, और क्या प्रसङ्ग है। अर्थात् ऋषि वक्ता, देवता श्रोता और जिस कर्ममें विनियोग हो, वही कर्म प्रसङ्ग होता है। ऐसे ज्ञानके अनन्तर मन्त्रका व्याख्यान किया हुआ अति स्पष्ट हो जाता है। इसी लिये मन्त्रके व्याख्यान—कालमें उक्त चारों वस्तु सर्वत्र बताई जाती हैं। यह मानों मन्त्रकी संक्षिप्त भूमिका ही होती है। इसी लिये भाष्यकारके उद्धृत किये हुए मन्त्रकी व्याख्या करनेसे पहिले भगवद्दुर्गाचार्य्य अपनी टीकामें उनके ऋष्यादिको सर्वत्र बता देते हैं। किन्तु कहीं कही या अनेक स्थलोंमें अन्य देवता- ओंके मन्त्र अन्यदेवताओंके यज्ञमें विनियुक्त हैं। जिसके जान- नेसे श्रोताको सन्देह हो सकता है कि—'जिस मन्त्रमें अन्य देवताकी स्तुति है, वह मन्त्र अन्य देवताके स्मरण करनेमें समर्थ नहीं हो सकता इस लिये उस मन्त्रका वहां प्रयोग करना उपयुक्त है ? यद्यपि “पुरुष-विद्याऽनित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे” [नि० अ० १ पा० १ खं० २] इस पूर्वोक्त, तथा “एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं, यत्- कर्म क्रियमाणमृग्यजुर्वाभिवदति” [ नि० अ० १ पा० ५ ख० १ ] इस आगे कहे जानेवाले निरुक्तके अनुसार सब मन्त्र अनुष्ठान अथवा देवताके अनुस्मारक मात्र होते हैं, जिससे कि-उनका वहीं पठन होना चाहिये जहां उनके देवताका यजन हो, किन्तु भिन्न देवताके यजनके समीप नहीं। तथापि यह नियम शस्त्र तथा स्तोत्र नामक मन्त्रोंमें नहीं लिया जाता, क्योंकि—ये मन्त्र प्रायः अन्य देवताओंके यज्ञकी सन्निधिमें ही उपयुक्त होते हैं। इनमें जिन देवताओकी स्तुति होती है, वे देवता हविर्भाक् नहीं होते,
या उनके लिये हविः नहीं दिया जाता, इस कारण उनके शस्त्र व स्तोत्र अन्यदेवताओंके कर्ममें ही पढे जाते हैं, तथा इसीसे वे प्रस्तुत अनुष्ठान या देवताके स्मारक नहीं हो सकते । ॰ जिस प्रकार स्मार्त विवाह आदि संस्कारोमें अर्चनीय वरके अतिरिक्त आचार्य आदि अर्चनीय पुरुषोंके अर्चनके माहात्म्यसे उन संस्कारोंकी सुसम्पन्नता 'होती है, उसी प्रकार श्रौत कर्मोंमें यजनीय देवताओंके सन्निधानमे विधिवशात् जिन देवताओंका शस्त्र तथा स्तोत्र मन्त्रोंके द्वारा स्तवन होता है, उससे एक स्वतन्त्र अतिशय या अदृष्ट उत्पन्न होता है, जिससे कि—प्रस्तुत यजनीय देवताओंके यजनसे उत्पन्न होनेवाले अपूर्वका पोषण होता है, अथवा वह अपने जननीय स्वर्गादिरूप फलके उत्पन्न करनेमे पूर्ण रूपेण समर्थ होता है, उसी अपूर्वको अन्यापूर्व कहते हैं। जैसे— बीजको अङ्कुर उत्पन्न करनेमें जल, खाद तथा क्षेत्र आदिकी अपेक्षा होती है, या इन पूर्वोक्त वस्तुओंसे संयुक्त होकर ही बीज पूर्णरूपसे अङ्कुरका उत्पादक अथवा सच्चा बीज बनता है, उसी प्रकार प्रधान अपूर्वको अन्य अङ्गापूर्वों को अपने पूर्ण होनेमें अपेक्षा रहती है। इसीसे यजनीय देवताओंके अतिरिक्त अन्य स्तोतव्य देवताओंका स्तवन विहित समयमें अनावश्यक या व्यर्थ न होकर अपनी पूरी सफलताके साथमें वहाँ रहता हैं। स्तुति और अभिधान । स्तुतिके स्थलमें स्तोतव्य वस्तुमें गुणोंके सम्बन्धको दिखा- कर ही वाक्यके यत्नका अन्त हो जाता है, फिर उसका कोई कार्यान्तर नहीं देखा जाता, और स्मरण स्थलमें प्रयोजनान्तरके लिये वस्तुके गुणोंका अभिधान या कथनमात्र होता है, अर्थात् वहां वाक्य गुणोंके कथनके अनन्तर किसी इष्ट अर्थको प्रकाशित
६२ अ० १ पा० २ सू० २१ करके निवृत्त होता है। जैसे—'देवदत्तश्चतुर्वेदाभिज्ञः' देवदत्त चतुर्वेदाभिज्ञ है, यह वाक्य देवदत्तको उद्देश्य करके उसमें चतु- र्वेदाभिज्ञता-रूप गुणके सम्बन्धको कहकर फिर कुछ नहीं करता तो यहां स्तुति ही सिद्ध होती है। तथा "यश्चतुर्वेदा- भिज्ञस्तमानय" 'जो चतुर्वेदाभिज्ञ हो, उसको ला' इस वाक्यके यत्नकी समाप्ति आनयन क्रियाके प्रैष पर होती हैं, किन्तु जिसका आनयन इष्ट है, उसकी पहिचान चतुर्वेदाभिज्ञता गुणसे ही होतो है, इस लिये उसको पहिले कहकर 'आनय' क्रियाका प्रयोग किया जाता है, इस लिये यहां उस गुणयुक्त पुरुषका स्मरणमात्र होता है, उससे उस पुरुषकी प्रशंसा नहीं होती, यही स्तुति और अभिधानका भेद है। “प्रउगं शंसति” “आज्यैः स्तुवते” इत्यादि श्रुति वाक्योंमें स्तुत्यर्थक 'शंसति' आदि क्रियाओंसे जिन मन्त्रोंका विनियोग होता है, वे मन्त्र अनुष्ठानस्मरण-रूप दृष्ट प्रयोजनके लिये नही होते, 'इसीसे उनकी प्रधानता रहती है, किन्तु गौणता नहीं, तथा वे अन्य-देवताके स्तावक होकर भी अन्य-देवताके यजनके सन्निधानमें पठनीय होते हैं, क्योकि—उनसे उस कर्मकी पुष्टि होती है। इसीसे जैमिनीय मीमांसा [अ० २ पा० १ अ० ४] में "अपि वा श्रुति-संयोगात् प्रकरणे स्तौति-शंसती क्रियोत्पत्तिं विदध्याताम्” इस सूत्रसे स्तोत्र तथा शस्त्र मन्त्रोकी प्रधानता सिद्ध की है। अर्थात् स्तौति और शंसति धातुओकी स्मरणार्थता मान ली जावे तो उनके स्तुतिरूप श्रौत अर्थका बाध हो जायगा, इस लिये अदृष्टकी कल्पना करके भी उनका प्राधान्य माना गया है। जैसे कि—इसी द्वितीय पादमें उपमार्थक 'इव'का उदाहरण “अग्निरिवमन्यो !” [ ऋ० सं० ८, ३, १६, २ ] यह मन्त्र है 'इस मन्त्रका मन्यु देवता है। और यह महेन्द्र देवताओंके
हिन्दीनिरुक्त। ६३ ग्रह यज्ञके समीप निष्केवल्यमें शस्त्र होता है, अर्थात् जहां महेन्द्र देवताका यज्ञ हो रहा है, मन्युं देवताके मन्त्रका पाठ होता है। जिस प्रकार लड़केके विवाहमें देवी भैरव आदि देवताओंके गीत गाये जाते हैं, और उनमें विवाहके किसी कार्यका स्मरण न हो कर केवल उन देवताओंकी स्तुति होती है, तथा उनकी स्तुतिसे ही प्रस्तुत विवाहादि संस्कारोंमें उपकार होता है, इसी प्रकार यहांपर मन्यु देवताकी स्तुतिसे महेन्द्र देवताके यज्ञमें उपकार होता है, किन्तु वहांके अनुष्ठान व महेन्द्र देवताका उनके मन्त्रोंमें स्मरण नहीं होता, यही अन्य देवताओंके शस्त्र व स्तोत्र मन्त्रोंके पाठकी अन्य देवताओंके यज्ञमें सङ्गति है। यही प्रकार अन्यत्र अन्यत्र भी ध्यानमें रखना चाहिये। शस्त्र—अप्रगीतमन्त्रसाध्या स्तुतिः स्तोत्रम्। विना गाये हुए मन्त्र से स्तुति, शस्त्र है। स्तोत्र--प्रगीतमन्त्रसाध्य स्तुतिः स्तोत्रम्। गाये हुए मन्त्रसे स्तुति, स्तोत्र कहलाती है। पूर्ण तथा अपूर्ण उदाहरण— मन्त्र। भाष्यकार निरुक्तमें उदाहरण मन्त्रोंको कहीं पूर्ण तथा कहीं अपूर्ण रूपमें पढ़ते हैं, इसका प्रयोजन यह है कि—जो सम्पूर्ण पढ़े जाते हैं, और निर्वचन किये जाते है, वे व्याख्या-धर्मके उपदेशके लिये हैं, अर्थात् उनसे छात्रोंको मन्त्रकी व्याख्याका प्रकार ज्ञात होगा, व्याख्या-प्रकारको जान कर, वे अन्य मन्त्रोंकी व्याख्या कर सकेंगे। यदि सभी मन्त्र पूर्ण पढ़े जावें और निर्वचन किये जावें, तो शास्त्र अतिविस्तृत होजावें। अथवा सभी मन्त्रोंके खण्ड पढ़े
६४ अ० १ पा० २ ख० १ ॥ जांय और निवचन किये जांय, तो व्याख्या-धर्म प्रदर्शित नहीं हो, इस कारण व्याख्या-धर्मके उपदेशार्थ कोई सम्पूर्ण पढ़े जाते हैं तथा निर्वचन किये जाते हैं, और शास्त्रके अति गौरवके भयसे कोई असंपूर्ण ही पढ़े जाते हैं । प्रत्येक मन्त्रमें ही जिस प्रकार सकल, आधा अथवा चौथाई पढ़नेसे प्रयोजन जाना जा सकता है, वह संक्षेपसे यह प्रकार है, कि— “जिस जिस मन्त्रमें जिस जिस एकार्थ, अनेकार्थ, तथा अनवगतसंस्कार पदको निर्वचन करता है, अथवा किसी शब्दान्तर का अध्याहार करता है, यद्वा किसी विशेष अर्थको दिखाता है, तथा कोई विपरिणाम करता है, या किसो सन्दिग्ध अर्थका निर्णय करता है, ऐसे प्रयोजनोंके लिये सकल मन्त्रका अध्ययन करता है, एवम् जिस मन्त्रमें आधे या चोथाई भागहीमे वैसा पद है, जिसका कि—आचार्यको निर्वचन करना अभीष्ट है, तो उतना ही पढ़ देता है, यह उक्त प्रकारसे निपुणताके साथ सर्वत्र अन्वेषण करना चाहिए । स्तुति वाक्य और स्मारक वाक्य । स्तुतिके लिये जिन वाक्योंका प्रयोग होता है, वे स्तुति-वाक्य कहलाते हैं, तथा स्मरणमात्रके लिये उपयोगी होनेवाले वाक्य स्मृतिवाक्य या स्मारक होते हैं । अर्थात् जिस वस्तुकी स्तुति करना हो, उसमें गुणोंका बखान करना, स्तुति वाक्यका प्रयोजन है, एवम् गुणोंके द्वारा अनुस्मरणीय वस्तुके स्वरूपका प्रकाश करना, स्मारक वाक्यका प्रयोजन होता है । या यो समझिए कि—स्तुति-वाक्य में विशेष्यके द्वारा बिशेषणोंका और स्मारक-वाक्यमें विशेषणोंके द्वारा विशेष्यका ज्ञान होता है । जैसे—"देवदत्तश्चतुर्वेदाऽभिज्ञः" ‘देवदत्त चारों वेदोंका जाननेवाला है’ यहां पहिले देवदत्तका ज्ञान
हिन्दी निरुक्त । ६५ होता है, और पीछे उसके गुणोंका, एवम् "यश्चतुर्वेदाभिज्ञस्तमानय" जो चारों वेदोंका जाननेवाला है, उसे ला, यहां पर पहिले विशेषण- का और पीछे विशेष्यका ज्ञान होता है। यही दो प्रकार मन्त्रोंके हैं, उनमें जो स्तुत्यर्थ होते हैं, वे शस्त्र तथा स्तोत्र नामसे बोले जाते हैं, और जो केवल अनुष्ठान या देवताका स्मरणमात्र कराते हैं, वे अन्य अन्य मन्त्र हैं। इसी लिये स्तोत्र व शस्त्र नामवाले मन्त्र स्तोतव्य देवताकी स्तुतिमात्र करते हैं, किन्तु किसी प्रस्तुत वस्तु- की स्मृति नहीं कराते । शस्त्र व स्तोत्र । “प्रउगं शंसति” “निष्केवल्यं शंसति” इत्यादि वाक्योंसे 'शंसति' क्रियाके द्वारा जिनका विनियोग होता है, वे शस्त्र कहाते हैं, और “आज्यैःस्तुवते” “पृष्ठैः स्तुवते” इत्यादि वाक्योंसे स्तुवते या स्तौति क्रियाके द्वारा जिन मन्त्रोंका विनियोग होता है, वे स्तोत्र कहाते हैं। एवम् स्तोत्र मन्त्र गाये जाते हैं और शस्त्र गाये नहीं जाने। यही इनका परस्पर भेद है, किन्तु देवताकी स्तुतिमें दोनोंका प्रयोजन समान है। इनकी सार्थकता देवताकी स्तुतिमें ही होती है, गुणोंके अनुवाद-मात्रसे नहीं, इसी कारण स्तोत्र व शस्त्ररूप कर्मकी मुख्यताः ही है गौणता नहीं होती । द्वितीय पाद । ( खं-१ ) अथ निपाता उच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्ति । अप्युपमार्थे । अपि कर्मोपसंग्रहार्थे । अपि पद- पूरणाः । तेषामेते चत्वार उपमार्थे भवन्ति । 'इव'-इति भाषायांच । अन्वध्यायंच । “अग्नि-
६६ अ० १ पा० २ ख० १ । रिव, इन्द्र इव"-इति । 'न'-इति प्रतिषेधार्थीयो भाषायाम् । उभयमन्वध्यायम् । "नेन्द्रं देव ममंसत"-इति प्रतिषेधार्थीयः । पुरस्तादुपचारस्त- स्य, य-प्रतिषेधति । "दुर्मदासो न सुरायाम्"- इत्युपमार्थीयः । उपरिष्टादुपचारस्तस्य, येनोप- मिमोते ॥ १ ॥ अर्थ—अथ निपात । अनेक प्रकारके अर्थोंमें गिरनेवाले निपात होते हैं। कोई उपमा अर्थमें। कोई अर्थोपसंग्रह अर्थमे । और कोई पद-पूरणके लिये होते है। उनमें ये चार [ इव, न, चित्, नु ] उपमा अर्थमे होते है। 'इव' भाषा (लोक) और वेदमैं । (उदाहरण) "अग्निरिव" [ ऋ० सं० ८, ३, १६, २ ] अग्निके समान । "इन्द्रइव" [ ऋ० मं० ८, ८, ३१, २ ] इन्द्रके समान । 'न'-यह लोकमे निषेध अर्थमें और वेदमे निषेध और उपमा दोनों अर्थोंमे होता हैं। (उदाहरण) "नेन्द्र देवममंसत" [ ८, ३, २६, १ ] आदित्य रश्मियोने इन्द्रको अपना देव या प्रकाशक नहीं माना । यहां निषेध अर्थमे है। जब निषेध अर्थमें होता है, तब उसका उच्चा- रण आदिमें आता है। "दुर्मदासो न सुरायाम्" [ऋ० मं० ५, ७, १६, १ ] मदिराको पान किये हुये पुरुषोंके समान सोम दुर्मद है । यहां 'न' उपमा अर्थ म है। जिससे कि-नकार पीछे या अन्तमें दिया है, इससे उपमार्थक है। ( ख०-२ ) 'चित्'-इत्येषोऽनेकर्मा । "आचार्य्यश्चिदिदं ब्रूयात्"-इति पूजायाम् । 'आचार्य' आचारं ग्राहयति, आचिनोति अर्थान्, आचिनोति बुद्धि-
' हिन्दी निरुक्त । ६७ मिति वा । “दधिचित्” इत्युपमार्थे । “कुल्माषां- श्चित् आहर”—इत्यवकुत्सिते । कुल्माषाः = कुलेषु सीदन्ति । 'नु' इत्येषोऽनेककर्मा । “इदं नु करि- ष्यति”—इति हेत्वपदेशे । 'कथं नु करिष्यति" इत्यनुपृष्टे । “ननु एतदकार्षीत्” इति च । अथापि उपमार्थे भवति ॥ २ ॥ अर्थ—'चित्' यह अनेकार्थ है । (उदाहरण) “आचार्य्यश्चिदिदं ब्रूयात्” आचार्य ही ऐसा कह सकता है, और कौन कहेगा ? यह पूजा अर्थमें है । आचार्य,—जो आचार सिखावे, या अर्थोंको संग्रह करे या बुद्धिको संग्रह करे । “दधि चित्” दधिके समान । यह उपमा अर्थमें है । “कुल्माषांश्चित् आहर,” कुल्माषोको तो तू ले आ, और क्या लावेगा ? यह निन्दा अर्थमें है । कुल्माष—जो कुलोंमें रहे । 'नु' यह अनेकार्थ है । “इदं नु करिष्यति” कैसे करेगा, यह हेतुके न माननेमें है । कथं नु करि- ष्यति” कैसे करेगा ? यह दुबारा प्रश्नमें है, और “ननु एतत् अकार्षीत्” अवश्य इसने किया है, यह भी दुबारा प्रश्न ही में है। और उपमा अर्थ में भी है ॥ २ ॥ “वृक्षस्य नु ते पुरुहूतवयाः” । वृक्षस्येव ते पुरुहूत शाखाः । 'वयाः' शाखाः वेतेः । वातायना भवन्ति । “शाखाः” खशयाः । शक्नोतेर्वा । अथ यस्यांगमादर्थ पृथक्त्वमह विजायते न त्वौद्देशिकमिव विग्रहेण पृथक्त्वात् स कर्मोपसंग्रहः । 'च'-इति । समुच्चयार्थः
६८ अ० १ पा० २ ख० ३ । उभाभ्यां संयुज्यते “अहं च त्वं च वृत्रहन्” इति । एतस्मिन्नेवार्थे “देवेभ्यश्च पितृभ्यश्चा”—इत्याकारः । ‘वा’—इति विचारणार्थे । “हन्ताहं पृथिवीमिमां निदधानीहवेह वा” इति । अथापि समुच्चयार्थे भवति । “वायुर्वा त्वा मनुर्वा त्वा”—इति ॥ ३ ॥ अर्थ—(उदाहरण)—“वृक्षस्य नु ते पुरुहूतवयाः” (ऋ० मं० ४, ६, १७, ३) हे पुरुहूत ! इन्द्र ! तेरे न आनेसे हमारे यज्ञके मार्ग वृक्षकी शाखाओंके समान खाली हैं । वया नाम शाखा का है। ‘वी’ धातुसे होताहै। (क्योंकि-) वे वायुके स्थान हैं। शाखा = जो आ- काश मे शयन करें । अथवा ‘शक्लृ’ शक्तौ धातुसे है ॥ इति उप- मार्था निपाताः ॥ अथ कर्मोपसंग्रहार्थक निपात । वाक्यमे उच्चारण किये हुयेके समान समासमें जिसके अध्याहारसे अर्थका भेद जाना जावे वह कर्मोपसंग्रह निपात होता है। जैसे-‘च’ । यही ‘च’ कभी कभी समुच्चय अर्थमें अलग अलग दो अर्थोंके साथ संयुक्त हुआ बोला जाता है। जैसे—“अहं च त्वंच वृत्रहन् ! [ ऋ० सं० ६, ४, ४१, ५] हे वृत्रहन् ! इन्द्र ! मैं और तू । इसी समुच्चय अर्थमें [उदाहरण] “देवेभ्यश्च पितृभ्य आ” [ ऋ० सं० ७, ६, २२, १ ] देवोके लिये और पितरोंके लिये । यहां ‘आ’ निपात, आता है। ‘वा’ यह संशय अर्थमें है। [जैसे-] हन्ताहं पृथिवीमिमां निद- धानीहवेह वा” [ ऋ० सं० ८, ६, २७, ३] इसी समय मैं इस पृथिवीको यहां रखूं या यहां ! इसके अतिरिक्त समुच्चय अर्थमें भी है। [जैसे] “वायुर्वा त्वा मनुर्वा त्वा” [य-सं० ६, ७] हे अश्व ! वायुं तुझे और तुझे मनु ॥ ३ ॥
हिन्दी निरुक्त। ६६
'अह' इति च, 'ह' इति च, विनिग्रहार्थीयौ । पूर्वेण संप्रयुज्येते । 'अयमहेदं करोतु,' 'अयसिदम्' । 'इदं ह करिष्यति, इदं न करिष्यति, इति । अथापि 'उकार' एतस्मिन्नेवार्थे। उत्तरेण । 'मृषा इमे वदन्ति, 'सत्यमु ते वदन्ति, इति । अथापि पद-पूरणः । 'इदमु' 'तदु' । 'हि' इत्येषः अनेक-कर्मा । 'इदं हि करिष्यति'—इति हेत्वपदेशे । 'कथं हि करिष्यति' इति अनुपृष्टे । 'कथं हि व्याकरिष्यति' इति असूयायाम् । 'किल' इति विद्या-प्रकर्षे । 'एवं किल' इति । अथापि 'न' 'ननु' इत्येताभ्यां संप्रयुज्यते । अनुपृष्टे—'न किल एवम्' । 'ननु किल एवम्' 'मा' इति प्रतिषेधे । 'मा कार्षीः ।' 'मा- हार्षीः'—इति च । 'खलुक्त्वा' । 'खलुकृतम्' । अथापि पदपूरणे । 'एवं खलु तद् बभूव' इति । 'शश्वत्' इति विचिकित्सार्थीयो भाषायाम् । 'शश्वदेवम्' इति अनुपृष्टे । 'एवं शश्वत्, इति अस्वयं पृष्टे । 'नूनम्' इति विचिकित्सार्थीयो भाषायाम् । उभयमन्वध्यायम् । विचिकित्सार्थी यश्च पदपूरणश्च । 'अगस्त्य इन्द्राय हविर्निरूप्य
७० अ० १ पा० २ ख० ४ । मरुद्भ्यः संप्रदित्सांचक्रे-कार स इन्द्र एत्य परिदेवयाञ्चक्रे ॥ ४ ॥ अर्थ—'अह' और 'ह' विनिग्रह अर्थ में हैं [स्वभाव] [प्रस्तुत दो वाक्योंमें] पूर्व [वाक्यगत अर्थ] के साथ संयुक्त होकर बोले जाते हैं। [जैसे] 'अयमह इदं करोतु' = यह १ यह २ करे । 'अयमिदम्' = यह ३ यह ४ करे। 'इदं ह करिष्यति,' 'इदं न करिष्यति' । [यज्ञ- दत्त ] यह करेगा, यह न करेगा [ओदन न पकावेगा] । और उकार भी इसी [विनिग्रह] अर्थ में हैं। [स्वभाव] दूसरे वाक्य- गत अर्थके साथ संयुक्त होकर बोला जाता है। [जैसे-] 'मृषा इमे वदन्ति' = ये झूठ बोलते है। 'सत्यमु ते वदन्ति' = वे सच बोलते हैं। और पद-पूरण अर्थमें भी है। 'इदमु' [ऋ० सं० ३, ८, २, १] = यह। 'तदु' [ऋ० सं० १, ५, २, १] = वह। 'हि' यह अनेकार्थ है। [जैसे] 'इदं हि करिष्यति' = 'यह करेगा ? । यह हेतुके अस्वीकारमें। 'कथ हि करिष्यति' = कैसे करेगा ? । यह दुबारा प्रश्नमे । 'कथं हि व्याक- रिष्यति' = कैसे व्याख्या करेगा ? । यह निन्दामें। 'किल' यह विज्ञानके आधिक्यमें । [जैसे—कोई दूसरेसे सुनकर उसे बहुत निश्चय कर दूसरेसे कहता है-] "एवं किल" = ऐसे ही [यह युद्ध हुआ]। और 'न' 'ननु' इन दोनोंके साथ संयुक्त होकर भी बोला जाता है। दुबारा प्रश्नमें। [किसी बातको दूसरेसे सुनकर, कि—'यह ऐसा नहीं', फिर दूसरेसे पूछता है, और उसपर भी श्रद्धा न करके फिर प्रथम पुरुषसे ही पूछता है।-] 'न किल एवम्' = ऐसा नहीं है ? 'ननु किल एवम्' = ऐसा नहीं है। 'मा' यह प्रतिषेध अर्थमें है। [जैसे-] 'मा कार्षीः' = मत ० १—यज्ञदत्त। २—गौओको पिलावे। ३—देवदत्त। ४—भोजन करे।