भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 61

६० अ० १ पा० २ ख० ११ तथा विनियोग कहा जाता है, ये चारों बातें मन्त्रके निदानस्वरूप हैं, इनके जाननेसे मनुष्यको मन्त्रका व्याख्यान श्रवणसे पहिले विदित हो जाता है कि—कौन वक्ता है कौन श्रोता है, और क्या प्रसङ्ग है। अर्थात् ऋषि वक्ता, देवता श्रोता और जिस कर्ममें विनियोग हो, वही कर्म प्रसङ्ग होता है। ऐसे ज्ञानके अनन्तर मन्त्रका व्याख्यान किया हुआ अति स्पष्ट हो जाता है। इसी लिये मन्त्रके व्याख्यान—कालमें उक्त चारों वस्तु सर्वत्र बताई जाती हैं। यह मानों मन्त्रकी संक्षिप्त भूमिका ही होती है। इसी लिये भाष्यकारके उद्धृत किये हुए मन्त्रकी व्याख्या करनेसे पहिले भगवद्दुर्गाचार्य्य अपनी टीकामें उनके ऋष्यादिको सर्वत्र बता देते हैं। किन्तु कहीं कही या अनेक स्थलोंमें अन्य देवता- ओंके मन्त्र अन्यदेवताओंके यज्ञमें विनियुक्त हैं। जिसके जान- नेसे श्रोताको सन्देह हो सकता है कि—'जिस मन्त्रमें अन्य देवताकी स्तुति है, वह मन्त्र अन्य देवताके स्मरण करनेमें समर्थ नहीं हो सकता इस लिये उस मन्त्रका वहां प्रयोग करना उपयुक्त है ? यद्यपि “पुरुष-विद्याऽनित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे” [नि० अ० १ पा० १ खं० २] इस पूर्वोक्त, तथा “एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं, यत्- कर्म क्रियमाणमृग्यजुर्वाभिवदति” [ नि० अ० १ पा० ५ ख० १ ] इस आगे कहे जानेवाले निरुक्तके अनुसार सब मन्त्र अनुष्ठान अथवा देवताके अनुस्मारक मात्र होते हैं, जिससे कि-उनका वहीं पठन होना चाहिये जहां उनके देवताका यजन हो, किन्तु भिन्न देवताके यजनके समीप नहीं। तथापि यह नियम शस्त्र तथा स्तोत्र नामक मन्त्रोंमें नहीं लिया जाता, क्योंकि—ये मन्त्र प्रायः अन्य देवताओंके यज्ञकी सन्निधिमें ही उपयुक्त होते हैं। इनमें जिन देवताओकी स्तुति होती है, वे देवता हविर्भाक् नहीं होते,