निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ५६ रीतिसे दोनोंका ही ऋषित्व उपपन्न होता है । अतः मन्त्रके प्रयोगकालमें उक्त दोनों ही ऋषियोंका अनुसन्धान करना अर्थका देनेवाला होता है । जबकि श्रुति और स्मृति दोनोंका सन्धान हो सकता है तो उनके विरोधकी सम्भावना करना अयुक्त है । (२) अपिच—श्रुतिपूर्वक ही स्मरण होता है किन्तु स्वतन्त्र नहीं अर्थात् ऋषियोंने जो श्रवण किया है, उसी को फिर स्मरण किया है । इस लिये स्मृतिमें जो अर्थ आया हुआ है उसको श्रुतिमूलक ही मानना चाहिये । ताण्डकमें रहस्य-ब्राह्मण भी दिखलाता है, कि— “यत्साम्ना स्तोष्यन्स्यात् तत्सामोपधावेत् । यस्यामृचि तामृचम् । यदार्षं तमृषिम्” । अर्थ—जिस ऋचाको जहां सामरूपमें पठनीय कहा है, वहां उस ऋचाको साम ही जानना , जहां ऋचाके रूपमें विनियोग है, वहां उसको ऋचा ही जानना, तथा जहां जिस मन्त्रका जो ऋषि बताया हो, वहां उसी ऋषिका मन्त्र समझकर उसका प्रयोग करना । अर्थात् मन्त्रोंका सामभाव, ऋचाभाव तथा ऋषिका सम्बन्ध परिवर्त्तन होता रहता है, किन्तु सब स्थलोंमें उनका एक ही स्वभाव नियत नहीं है । इस प्रमाणके अनुसार शौनक स्मृतिके कहे हुए ऋषि श्रुति विरुद्ध नहीं प्रत्युत वे श्रुतिमूलक हैं, इस लिये विशेष विशेष ऋषियोंका कथन युक्त तथा आवश्यक है । ( २ ) अन्य देवताके यजनमें अन्य देवताके मन्त्रका विनियोग । सब मन्त्रोंके व्याख्यान करनेके समय उनका ऋषि, छन्द, देवता