भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

५४ अ० १।पा० २। ख० १। द्वितीय पाद । विशेष बातें । ( १ ) ( सब मन्त्रोंमें दो ऋषि ) (१) इस निरुक्त शास्त्रमें प्रायः हर एक शब्दके उदाहरण मन्त्र दिये जाते हैं। उनमें ऋषिका चिन्तन आवश्यक होता है इस लिये ऋषिके सम्बन्धमें जो विशेष बात है, उसे जान लेना आवश्यक है बीचमें बतानेसे गौरव होनेके कारण आरम्भमें दिखाते हैं। ऐतरेयकरहस्य-ब्राह्मणगे ऋक् यजुः साम एवम् अथर्वं संपूर्ण ही वेदराशिका आदित्यान्तर-पुरुष भगवान् हिरण्यगर्भ ऋषि बताया है। और शौनक ऋषिने प्रत्येक मन्त्रोंके पृथक् पृथक् वशिष्ठादि ऋषि बताये हैं। इसलिये श्रुति और स्मृतिके विरोधस्थलमें श्रुति ही बलवती होती है। ऐसा न्यायके जाननेवाले कहते हैं। एवम् जैमिनी महर्षिने भी (विरोधे त्वनपेक्षं स्यात् [जै० सू० १, ३, ३]) इस सूत्रमें यही बात कही है कि श्रुति और स्मृतिका विरोध होने पर स्मृतिका त्याग हो जाता है; सुतराम् "शौनकका विशेष विधान अनर्थक ही है" यह आपत्ति उपस्थित होती है। इसके समाधानार्थ यह है कि शौनक महर्षिने जो विशेष ऋषि बताये हैं। उसका श्रुतिसे विरोध नहीं, प्रत्युत श्रुतिके अर्थको ही स्मरण किया है। क्योंकि मन्त्रोंके द्रष्टा दोनो ही क्षेत्रज्ञ हैं। एक बुद्धिके देवता रूपसे हिरण्यगर्भ क्षेत्रज्ञ है, जो सम्पूर्ण भूतोंके कर्मविपाक (अदृष्ट)के अनुसार अर्थ व शब्दको दिखलानेवाला है। और उससे दूसरा विशिष्ट कर्मका करनेवाला क्षेत्रज्ञ बुद्धिस्थ होकर देखता है। ऐसी अवस्था में वशिष्ठादिक ऋषि जो मन्त्रोंके देखनेवाले क्षेत्रज्ञ हैं, वे उसी हिरण्यगर्भके दिखाये हुए मन्त्रोंको देखते हैं। इस