भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

हिन्दी निरुक्त । ५७ ६ { निर् दुर् } निन्दा निर्धन दुष्टधन । दुर्ब्राह्मण=दुष्ट ब्राह्मण । ७ { नि अव } विनिग्रह { निगृह्णाति=शासन करताहै अवगृह्णाति=रोकता है । ८ उद् इन दोनों (नि० अव) का प्रातिलोम्य उद्गृह्णाति=उद्धारकरताहै । ९ सम् एकीभाव संगृह्णाति=संग्रह करताहै । १० { वि अप } प्रातिलोम्य विगृह्णाति अपगृह्णाति (विग्रह करताहै) ११ अनु { (१) सादृश्य (२) अपरभाव } { अनुरूपमस्येदम् अनुगच्छति १२ अपि संसर्ग { सर्पिषोऽपि स्यात् मधुनोऽपि स्यात् १३ उप उपजन उपजायते १४ परि सर्वतोभाव परिधावति १५ अधि { १-उपरिभाव २-ऐश्वर्य } { अधितिष्ठति अधिपतिः पहिले कहा है कि—"उपसर्ग नाम और आख्यातके साथ क्रियाके सम्बन्धके द्योतक हैं" यह ठीक नहीं है, क्योंकि—"उप- सर्गाः क्रियायोगे" (अ०-१।४।५६) इस पाणिनीय अनुशासनमे उपसर्गोंका क्रिया पदके साथ ही सम्बन्ध प्रसिद्ध है, किन्तु नामके साथ नहीं, प्रत्युत क्रियाके अंगभाव हो नामोंको भी व्यापन करते हैं । समाप्तः प्रथमः पादः ।