निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंया उनके लिये हविः नहीं दिया जाता, इस कारण उनके शस्त्र व स्तोत्र अन्यदेवताओंके कर्ममें ही पढे जाते हैं, तथा इसीसे वे प्रस्तुत अनुष्ठान या देवताके स्मारक नहीं हो सकते । ॰ जिस प्रकार स्मार्त विवाह आदि संस्कारोमें अर्चनीय वरके अतिरिक्त आचार्य आदि अर्चनीय पुरुषोंके अर्चनके माहात्म्यसे उन संस्कारोंकी सुसम्पन्नता 'होती है, उसी प्रकार श्रौत कर्मोंमें यजनीय देवताओंके सन्निधानमे विधिवशात् जिन देवताओंका शस्त्र तथा स्तोत्र मन्त्रोंके द्वारा स्तवन होता है, उससे एक स्वतन्त्र अतिशय या अदृष्ट उत्पन्न होता है, जिससे कि—प्रस्तुत यजनीय देवताओंके यजनसे उत्पन्न होनेवाले अपूर्वका पोषण होता है, अथवा वह अपने जननीय स्वर्गादिरूप फलके उत्पन्न करनेमे पूर्ण रूपेण समर्थ होता है, उसी अपूर्वको अन्यापूर्व कहते हैं। जैसे— बीजको अङ्कुर उत्पन्न करनेमें जल, खाद तथा क्षेत्र आदिकी अपेक्षा होती है, या इन पूर्वोक्त वस्तुओंसे संयुक्त होकर ही बीज पूर्णरूपसे अङ्कुरका उत्पादक अथवा सच्चा बीज बनता है, उसी प्रकार प्रधान अपूर्वको अन्य अङ्गापूर्वों को अपने पूर्ण होनेमें अपेक्षा रहती है। इसीसे यजनीय देवताओंके अतिरिक्त अन्य स्तोतव्य देवताओंका स्तवन विहित समयमें अनावश्यक या व्यर्थ न होकर अपनी पूरी सफलताके साथमें वहाँ रहता हैं। स्तुति और अभिधान । स्तुतिके स्थलमें स्तोतव्य वस्तुमें गुणोंके सम्बन्धको दिखा- कर ही वाक्यके यत्नका अन्त हो जाता है, फिर उसका कोई कार्यान्तर नहीं देखा जाता, और स्मरण स्थलमें प्रयोजनान्तरके लिये वस्तुके गुणोंका अभिधान या कथनमात्र होता है, अर्थात् वहां वाक्य गुणोंके कथनके अनन्तर किसी इष्ट अर्थको प्रकाशित